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poem

छिपकली का बलात्कार (कविता)

क्या सच होने वाला है जो मैंने अभी है देखा सपना था पर क्यों डरा रहा जैसे हो हकीकत जैसा छिपकली जो कूदती है इधर से उधर कल यही तो बोल रही थी मैं मम्मा…


क्या धर्म पहचान है (कविता)

ना मैं हिंदू ना मैं मुस्लिम मैं हूं एक इंसान। ला मैं तेरी गीता पढ़ लूं तूं पढ़ ले मेरी कुरान।   एक ही अरमान मन में मेरे एक ही थाली में खाए हर इंसान…


चाय वाले (अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस पर विशेष)

एक तरफ चाय का प्याला, दूसरी तरफ चाय वाले। कोई बन गया प्रधानमंत्री, बागानों में चाय वाले।   करते लोग चाय पे चर्चा, मुंह तकते चाय वाले। दो वक़्त की रोटी की उम्मीद, खाली पेट…


समझौतों की कोई जु़बान नहीं होती (कविता)

तल्‍लीन चेहरों का सच कभी पढ़कर देखना कितने ही घुमावदार रास्‍तों पर होता हुआ यह सरपट दौड़ता है मन हैरान रह जाती हूँ कई बार इस रफ्त़ार से अच्‍छा लगता है शांत दिखना पर कितना…