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क्या धर्म पहचान है (कविता)

तस्वीरः गूगल साभार

ना मैं हिंदू ना मैं मुस्लिम

मैं हूं एक इंसान।

ला मैं तेरी गीता पढ़ लूं

तूं पढ़ ले मेरी कुरान।

 

एक ही अरमान मन में मेरे

एक ही थाली में खाए हर इंसान

ना चाहूं मैं हिंदू बनना

चाहूं न बनना मुसलमान

ना मैं पंडित ना मैं मौलवी

ना मैं हूं विद्वान

 

जो करे प्रेम इबादत

वो ही है श्रेष्ठ महान।

मानव को जो मानव समझे

वो ही है इंसान।

 

ला मैं तेरी गीता पढ़ लूं

तू भी पढ़ ले कुरान।

ना मैं हिंदू ना मैं मुस्लिम

मैं हूं एक इंसान, जिसे

सबमें दिखता है भगवान।

-दीपू 

(दीपू स्कूल के छात्र हैं और एनसीसी से जुड़े हुए हैं)

Disclaimer: इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं। किसी भी विवाद के लिए फोरम4 उत्तरदायी नहीं होगा।

2 Comments on "क्या धर्म पहचान है (कविता)"

  1. Hey that me, Deepu.
    And it’s my poen.

  2. सौरब कनोजिया | July 14, 2019 at 9:18 PM | Reply

    प्रेम के आस्वादन से परिपूर्ण जो धर्म जैसे सीमाओं का खंडन करता है। शाब्बाश दीपू आप की कविता जल की तरह पवित्र और शीतल है।

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