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कविता

…इश्‍क़ की किताबों में (कविता)

किसी सफ़े पे थी खिलखिलाती याद उसकी किसी सफ़े पे था उसकी मुस्‍कराहटों का पहरा इश्‍क़ की किताबों में करवटें बदलती रूहों का जागना उंगलियों के पोरों की छुँअन से फिर कहना उनका हौले-हौले से…


कुछ कहा भी होता चुप होने से पहले

कुछ याद किए होते सब भूलने से पहले कुछ कहा भी होता, चुप होने से पहले   शायद मुझमें ही कुछ कमी थी जो याद ना आए तुम्हें कुछ तो वफ़ा किया होता, बे मुरव्वत…


तो माला प्यार की तोड़ देना, वक्त की मांग है

जब प्रयास विनम्रता के सारे असफल हो जाएं द्वार देवताओं के प्रार्थनाएं सारी अनसुनी हो जाएं तो बंधन मनुहार के तोड़ देना, वक़्त की मांग है निभाते रहे हम ही रीत सदा प्रीत की हारकर…


तुम्हारे बिना मैं दीप जलाऊं ये मुझे मंजूर नहीं

कटती है तो कट जाए जिंदगी अंधेरे में किसी से मांग कर चिराग़ जलाऊं ये मुझे मंजूर नहीं अँधेरों में उजाले हैं, या उजालों में अंधेरा है किसी का आशियां जलाऊं ये मुझे मंजूर नहीं…