जब-जब मैं लिखती हूँ कविताएं
जब-जब मैं लिखती हूँ कविताएं मैं…मैं हो जाती हूँ। मुझमें बाकी नहीं रहती वो सुबह की अधखुली नींद और…जबरदस्ती का सँवरना फॉर्मल दिखने के नाम पर अपने ही आप को छुपा देने की कवायदें घड़ी…
जब-जब मैं लिखती हूँ कविताएं मैं…मैं हो जाती हूँ। मुझमें बाकी नहीं रहती वो सुबह की अधखुली नींद और…जबरदस्ती का सँवरना फॉर्मल दिखने के नाम पर अपने ही आप को छुपा देने की कवायदें घड़ी…
दूर गर जाना था बातों में रुलाना था गम को मदहोशी जाम पिलाना था कहीं और दिल लगा बैठे थे तो खिलौना हमें ही बनाना था वो बदल गए मोहतरमा मासूम हैं…
क्या सच होने वाला है जो मैंने अभी है देखा सपना था पर क्यों डरा रहा जैसे हो हकीकत जैसा छिपकली जो कूदती है इधर से उधर कल यही तो बोल रही थी मैं मम्मा…
ना मैं हिंदू ना मैं मुस्लिम मैं हूं एक इंसान। ला मैं तेरी गीता पढ़ लूं तूं पढ़ ले मेरी कुरान। एक ही अरमान मन में मेरे एक ही थाली में खाए हर इंसान…