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कविता

मृत्यु…क्या यही अंतिम पड़ाव है

मृत्यु… क्या यही अंतिम पड़ाव है पीड़ा का क्या यही होती है वो अंतिम…चरणीय पीड़ा जहाँ जीवन का अस्तित्व शून्य में हो जाता है विलीन   जिसके बारे में कहा सुना गया है कई ग्रन्थों,…


जब-जब मैं लिखती हूँ कविताएं

जब-जब मैं लिखती हूँ कविताएं मैं…मैं हो जाती हूँ। मुझमें बाकी नहीं रहती वो सुबह की अधखुली नींद और…जबरदस्ती का सँवरना फॉर्मल दिखने के नाम पर अपने ही आप को छुपा देने की कवायदें घड़ी…


पुस्तक मेला- संजय भास्कर की कविता

जा तो नहीं सका हूँ अभी तक किसी भी पुस्तक मेले में पर जब भी पुस्तक मेला लगता है तो सोचा जरूर करता हूँ इतना सारा ज्ञान का भंडार एक साथ जब लोग देखते होंगे…


वो बदल गए (कविता)

दूर गर जाना था बातों में रुलाना था गम को मदहोशी जाम पिलाना था   कहीं और दिल लगा बैठे थे तो खिलौना हमें ही बनाना था   वो बदल गए   मोहतरमा मासूम हैं…