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कविता

डर लगता है

इंसान को इंसान से डर लगता है आखिर ना जाने क्यों उसे दुनिया जहां से डर लगता है   चाहता तो है वो खुलकर ही करना बयां कड़वे सत्य को प्रत्येक अपनों से सदा पर…

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मुझे पता है बिखराव के ये मौसम फिर से आयेंगे

हालात, वक़्त, यादों का ढेर, दुःख, उदासी से पुते हुए पन्ने और वो। इक शाम आई और चली गई रात से डरकर। “मैं कौन हूँ” सोचते हुए अरसा बीत गया और जब जवाब आने को…


तेरा प्यार मिल जाये

मेरे टूटे हुये दिल को भी, यार करार मिल जाये। एक हमसफर गर आप सा, वफादार मिल जाये।। भुला दूँगा मैं दुनिया भर के सब गम जानेमन, मुझ को भी गर सच्चा, तेरा प्यार मिल…


वायु! क्या दोष मेरा है

एक धुंधली सी तस्वीर थी मेरी आंखों के सामने सारा जहां देख लिया मैंने अब निराश होकर आई हूं मैं सर्दी में शीतलहर गर्मी में लू कहलाती हूं मैं ऐ मनुष्य! क्या सच तुम्हें बताती…