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कविता

इक सच्ची मुस्कान चाहिये

संबंधों की मरुथली को नेह भरी बरसात चाहिये दुख शूल बनकर चुभे कभी न अपनापन सौगात चाहिये ।   पीर परायी आँसू मेरे कुछ ऐसे अहसास चाहिये । महके सौरभ रेत कणों में हरी भरी…

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सर पर छत है पर पानी टपकता है

सर पर छत  है , पर पानी टपकता है।   खुशियों का अंबार है , पर आदमी फफकता है।   चारों तरफ नीतिज्ञ  हैं, पर वह बहकता है।   बेईमानी से भरा  है, पर वो…


मैं अधूरे प्यार से पूरी हुई हूँ

मैं रही राधा..रही मीरा, रही सीता रुक्मणी भी, उर्मिला भी मैं, अहिल्या भी रही हूँ युग रहा कोई, कहानी जो रही हो मैं अधूरे प्यार से पूरी हुई हूँ!   मैं उपेक्षित उर्मिला सी हूँ…


व्यस्तताओं के जाल में

अक्सर हो जाती हैं इकट्ठी ढेर सारी व्यस्तताएँ और आदमी फंस जाता है इन व्यस्तताओं के जाल में पर आदमी सोचता जरूर है कि छोड़ आएं व्यस्तताएं कोसों दूर अपने से पर जब हम निकलते…