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आर्टिकल 15- कभी हम हरिजन बने कभी बहुजन, लेकिन हम कभी “जन” नहीं बन सके

आर्टिकल 15- कभी हम हरिजन बने कभी बहुजन, लेकिन हम कभी “जन” नहीं बन सके।
इस लाइन का अर्थ अगर सरल शब्दों में परिभाषित किया जाए तो कुछ इस तरह होगा, इंसान हर वक्त किसी भी परिस्थिति में बड़े बखूबी से अपने आप को जाति और धर्म में ढालने की कोशिश करता है, लेकिन उसके हज़ारों प्रयासों के बाद भी वह न ही सदाचार बन पाता है और न ही भाईचारा निभा पाता है।
फिल्म रेटिंग में 3, 3/4 और 4 के आस-पास रिव्यू पाने वाला अनुभव सिन्हा द्वारा निर्मित ‘आर्टिकल 15’  फिल्म उस भारतीय जाति जटिलता को उजागर करता है, जिस पर लाखों लेख लिखे जा चुके हैं । फिल्म उस जाति की क्रूरता को उजागर करता है, जिसके चलते आए दिन  भेदभाव के शिकार व्यक्ति अपनी जान गवां रहे हैं। हज़ारों इस पीड़ा के दंश को किसी तरीके से झेल रहे हैं। फिल्म किसी की राय में भारतीय जाति व्यवस्था की सच्चाई को सामने लाता है, तो किसी को लगता है कि इस फिल्म ने जातिभेद का मुकाबला किया है। असल में देखा जाए तो यह फिल्म देश के उस ग्रामीण इलाकों में सामाजिक असमानता के शिकार लोगों की आवाज है, जिनका दम घुट रहा है। जिस तेजी से क्षेत्रीय और ग्रामीण इलाकों में जातिवाद पनप रहा है और पनप चुका है उसका चरित्र सब के सामने रखता है।
2 घंटे 10 मिनट की अवधि वाली फिल्म आर्टिकल 15 अपनी कसी हुई कहानी के साथ उस पहलू को धरातल पर उतारने का प्रयत्न कर रहा जो मौजूदा समय में जाति को लेकर समीकरण बनाया जाता रहा है। इस फिल्म में ख़ासियत यह है कि अचानक से आकर कोई चमत्कारी (पुलिस) हीरो समाज में फैले जाति-विसंगतियों को चुटकी में दूर नहीं कर देता। फिल्म में पुलिस के उस भूमिका को भी दिखाया जो असल में है। पुलिस छवि भी जाति और धर्म के मार में उलझ सा गया है।  उस दंबग और सिंघम जैसी पुलिस छवि नहीं जो मुजरिम को चुटकी में सज़ा दे देता है। अयान रंजन (आयुष्मान खुराना) जो खुद इस जात-पात के चक्कर में अपने ही पुलिस विभाग में बखूबी से देखता है। फिल्म में उस सभी यथार्थवादी चरित्र जो जाति जैसी गंभीर समस्या का सामना कर रहा है उसे बखूबी तरीके से दिखाया जाता है।
फिल्म बड़ी खूबसूरती से देश के अलग-अलग हिस्सों में बिखरी जातीय घृणा, जातीय राजनीति की तस्वीरों को पटकथा में पिरोता है और दर्शकों के सामने रखता है। ऊना के दलित युवाओं की पिटाई, उन्नाव में नाबलिग दलित लड़कियों का बलात्कार, सीवर में आये दिन दम तोड़ते सफाईकर्मी, भीम आर्मी, और साथ में ऐसे उनके तथ्यों को लेकर कहानी बनता है जो भविष्य के पटल पर यथार्थ के रूप में उतरता है। फिल्म में खुद अयान रंजन (आयुष्मान खुराना) भूल जाता है कि उसका धर्म क्या है। उसके सहयोगी याद दिलाते है की सर आप ब्राह्मण समुदाय से आते हैं।
बहरहाल, फिल्म बड़ी सफाई से एक बड़ी समस्या को समाज के सामने रखता है और बताता है कि हमारा संविधान, समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व की खूबसूरत अवधारणा की बात करता तो है, लेकिन वही समाज कुछ ऐसे नियम-कानूनों पर अमल करता है जो संविधान की इन धारणाओं के सर्वथा विपरीत खड़ा हैं और उसका दायरा और बढ़ता चला जा रहा है। फिल्म आर्टिकल 15 वो तरीका तो नहीं बताता कि इस जाति भेदभाव के समीकरण को कैसे धूमिल किया जाए लेकिन मौजूदा समय में ऐसे लोगों के ऊपर लठ ज़रूर मारता हैं। इस वार से जाति भेदभाव की इमारत ध्वस्त भले न हो, लेकिन इसमें दरार ज़रूर होता दिख रहा है।

About the Author

साहित्य मौर्या
लेखक जामिया मिल्लिया इस्लामिया में पत्रकारिता के छात्र हैं।

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