…आने वाले दिनों में (कविता)
– संजय भास्कर आने वाले दिनों में जब हम सब कविता लिखते पढ़ते बूढ़े हो जायेंगे उस समय लिखने के लिए शायद जरूरत न पड़े पर पढ़ने के लिए एक मोटे चश्मे की जरूरत पड़ेगी…
– संजय भास्कर आने वाले दिनों में जब हम सब कविता लिखते पढ़ते बूढ़े हो जायेंगे उस समय लिखने के लिए शायद जरूरत न पड़े पर पढ़ने के लिए एक मोटे चश्मे की जरूरत पड़ेगी…
-निलेश शर्मा मैं हर उस जगह पर होना चाहता हूं जहाँ मुझे होना चाहिए, जैसे उस घड़ी की तरफ जो भागता रहता है सबकी कलाईयों में बंधकर, उन बातों में जब वो दोनों लड़कियां कान…
-डॉ. संजय यादव “चारागर” यूँ तो निर्जीव हैं, मौन हैं ज़माने की नज़रों में शून्य हैं, गौण हैं पर हमारी इसी शून्यता के गर्भ में दफ़न हैं राज के गहरे समन्दर कई और ओढ़कर सो रहे हैं हमारी ख़ामोशी के कफ़न को चीख़ों के तूफ़ान कई हाँ, बिस्तर की सलवटें हैं हम बदल-बदल कर करवटें गुज़ारी जो तुमने उन रातों की मूकगवाह हैं हम हाँ, बिस्तर की सलवटे हैं हम कभी पिया की यादें तो कभी अपनों की उलझने कभी आने वाले कल की बेचैनियाँ तो कभी ज़िंदगी की दुश्वारियाँ ना जाने किस-किस को पनाह दी है हमने सभी का मर्ज़ अपने सर पर लेकर हाकिम को ही दवा दी है हमने गिन-गिन तारे गुज़ारी आँखों में जो तुमने उन रातों की मूकगवाह हैं हम…
-प्रिया सिन्हा आज अभी हर-पल, हर-क्षण बस यही सोच रही हूँ मैं, कि सबके सामने अपने प्यार का इजहार कर दूं; चीख-चीख कर सब लोगों को बताऊं और खुद ही, सबके सामने अपने प्यार का…