गद्य निकले हैं कई, निकले न जाने पद्य कितने
नोक से हैं शब्द निकले व्योम में नक्षत्र जितने
ऊर्जा उपजी विचारों से उतर इसमें समाई
तब अंधेरों में क़लम बिखरा सकी उज्जवल रुनाई
मृदुल मन के भाव के हर रंग में ढलती रहेगी
लेखनी चलती रहेगी, लेखनी चलती रहेगी!
तुम न इसको क्षीण समझो, है क़लम तलवार कोई
हो गयी है ये पुरानी पर न इसने धार खोयी
काट डाले शीष इसने धूर्त और अपराधियों के
मोड़ डाले रुख़ उमड़ती धूल वाली आँधियों के
दोगली हर शक्ल पर ये श्याम रंग मलती रहेगी
लेखनी चलती रहेगी, लेखनी चलती रहेगी!
दम नहीं है ये किसी में, वेग इसका रोक पाए
सब लिखेगी ये क़लम जिस आसमां तक सोच जाए
तेज़ इसकी निर्भया जिह्वा हमेशा सत्य कहती
भाव की सौ लाख नदियाँ इस तरल स्याही में बहतीं
चोट खायी आत्मा के प्राण में पलती रहेगी
लेखनी चलती रहेगी, लेखनी चलती रहेगी!
दे रहा आराम रिसते घाव को हर शब्द इसका
पीर जो भी लिख रहा है गा रहा है कंठ उसका
देख लो कैसे मधुरता में बदलती वेदना है
पूर्व सिलने के मगर पहले वसन को भेदना है
ये क़लम चुपचाप हर इक घाव को सिलती रहेगी
लेखनी चलती रहेगी, लेखनी चलती रहेगी!

चोट खायी आत्मा के प्राण में पलती रहेगी
लेखनी चलती रहेगी, लेखनी चलती रहेगी!…
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चोट खायी आत्मा के प्राण में पलती रहेगी
लेखनी चलती रहेगी, लेखनी चलती रहेगी!
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बहुत खूबसूरत गीत दीदी