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किसानों की कर्ज माफी कृषि समस्या को सुलझाने में कितना सही? क्या है स्थायी समाधान

तस्वीरः गूगल साभार

जब-जब देश में किसानों की क़र्ज़ माफ़ी का ज़िक्र होता है तब-तब हमें समझ जाना चाहिए कि यह चुनावी सीजन है। इसके पहले तो राजनेताओ को किसानों की सुध आती ही नहीं है। अभी देश में यही मौसम चल रहा है। पांच राज्यों के चुनाव परिणाम देखने को मिले। मध्य प्रदेश में सरकार बनते ही मंत्री जी ने जीत दिलाने के बदले में वादेनुसार क़र्ज़ माफ़ी का एलान कर दिया, हालांकि मिलते-मिलते उसमे भी कई साल लग जाएंगे अगर मिला तो। किसी भी राज्य की बात करें या केंद्र में आने वाली सरकार की, हर किसी का चुनावी एजेंडा किसानों की क़र्ज़ माफ़ी होता ही है और मज़ेदार बात यह है कि फिर भी किसानों की स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है।

कर्ज माफी से किसानों या नेताओं का फायदा?

सबसे पहले तो ये जान लेते हैं कि आखिर ये राजनीतिक पार्टियां इस मसले पर इतना शोर मचा कर क्यों गरीब जनता की मसीहा बनने की कोशिश करती हैं? क्या वाकई इनकी मंशा किसानों की हालत में सुधार करने की है? अगर हां, तो अब तक हुई कर्ज माफी से अन्नदाता की किस्मत बदल पाई है? नहीं न। तभी तो आज तक क़र्ज़ माफ़ी का राग अलापा जा रहा है। जिस भारतवर्ष में आज भी किसानों की मेहनत की खुशबू आती है, हम विश्वपटल पर जिसके बलबूते कृषि प्रधान देश की दुहाई देते फिरते हैं वो आज तक क़र्ज़ माफ़ी की रहम की भीख मांगता ठोकरें खा रहा है, कर्ज़े तले अपनी आत्महत्या को मजबूर है, अपने अस्तित्व की बाट जोह रहा है और स्वार्थी राजनेताओं को भी वोट पाने का यह आसान मंत्र लगता है। क्या हमारे राजनेता अपने व्यक्तिगत ख़ज़ाने से एक पैसा भी देने को राज़ी होंगे जिसमें कि ज्यादातर लूट का ही एकत्रीकरण है। वैसे तो ये धरतीपुत्र किसी क़र्ज़ माफ़ी के मोहताज़ नहीं होने चाहिए पर यह विडंबनाओं का देश है। यहां यह भी बता देना ज़रूरी है कि किसानों की हालत इतनी बदतर होने और कम मुनाफे के बावजूद भी देश की अर्थव्यवस्था में 17-18 % और देश के निर्यात में 16 % योगदान कृषि का है।

कर्ज माफी अल्पकालिक समाधानः नीति आयोग

भारत में लगभग आधी जनता कृषि और उससे जुड़े कार्यों से सम्बंधित है जो वोटों के लिहाज़ से एक अच्छी संख्या है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में कम मुनाफा और कई बार तो नुकसान के भी चलते लोगों का इस कार्य से मोहभंग हुआ है। असल में किसानों की स्थिति के लिए कई कारक जिम्मेवार हैं जैसे मौसम का मिज़ाज़, सरकार की नीतियां, आयात-निर्यात, लागत का खर्चा, बीज एवं खाद की गुणवत्ता, बाजार, सिंचाई की समुचित व्यवस्था, कटाई के बाद फसल के रखरखाव की समुचित व्यवस्था, बीमा योजना आदि कृषकों का भाग्य तय करते हैं।

कर्जमाफी किसानों की समस्याओं का स्थायी व दूरगामी समाधान नहीं है वल्कि इससे अर्थव्यवस्था पर और बुरा असर पङता है। नीति आयोग ने भी इस समाधान को नकारते हुए आधारभूत संरचना के विकास की बात कही है। साथ ही यह राज्यों के राजस्व पर भी निर्भर करता है कि वे इसमें सक्षम हैं कि नहीं क्योंकि यह मुद्दा राज्य सरकार के अंतर्गत आता है। उदहारण के लिए मध्य प्रदेश में क़र्ज़ माफ़ी से 34 से 38 हज़ार करोड़ एवं राजस्थान में लगभग 18 हज़ार करोड़ का अतिरिक्त दबाब राजस्व विभाग पर बनेगा। भारत में ज्यादातर किसान छोटे और मझोले होते हैं जब कि क़र्ज़ माफ़ी का फायदा ज्यादातर बड़े किसानों को होता है। हालांकि गरीब राज्यों में यह किया भी जा सकता है क्योंकि वहां 10 -15 % किसान ही कर्ज़ा लेते हैं। नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार के अनुसार अगर जरूरी हो तो यह कदम उठाया जा सकता है पर यह केवल अल्पकालिक समाधान है।

क्या हो सकता है स्थायी समाधान

अब सवाल यह बनता है कि अगर क़र्ज़ माफ़ी स्थायी समाधान नहीं है तो आखिर समस्या का समाधान क्या है? सबसे पहले तो सरकार ने स्वामीनाथन रिपोर्ट को स्वीकार करने का फैसला लिया है। दूसरा 2022 तक अन्नदाताओं की आय को दोगुना करने हेतु नीति आयोग ने स्ट्रेटजी फॉर न्यू इंडिया @75 नामक डॉक्यूमेंट तैयार किया है, जिसमें खेती की उत्पादकता और क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया गया है। साथ ही बाज़ारों तक किसानों की पहुंच भी बढ़ानी होगी। ई-राष्ट्रीय कृषि बाजार, पशुधन विपणन, किसानों को कृषक उद्यमी बनाना,एकीकृत राष्ट्रीय बाजार का गठन, मुक्त निर्यात व्यवस्था, जीरो बजट प्राकृतिक खेती, न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोत्तरी, सुसंगत और स्थिर कृषि निर्यात नीति, नीति 5-10 साल की सोच के साथ तय करना, साथ ही समय-समय पर इसकी समीक्षा करते रहना, सिंचाई सुविधा और विपणन सुधार, फसल बीमा उत्पादों में सुधार आदि नीति आयोग के ऐसे प्रमुख सुझाव हैं, जिन पर अमल किया गया तो किसानों की दशा में सुधार हो सकता है। 2022 तक यूरिया के उपादान में आत्म निर्भर बनने का लक्ष्य भी हैं।

इसके अलावा फ़ूड प्रोसेस और कोल्ड स्टोरेज से किसान भाइयों को सीधे जोड़ने की कोशिश, फसल का उचित रख रखाव, मूल्यों में स्थिरता, उपज की खरीद की व्यवस्था, बीज एवं खाद के सही मूल्य, किसी तरह के बिचौलिये का न होना आदि भी सरकार की प्राथमिकताओं का हिस्सा होना चाहिए। इन सारी योजनाओं को मजबूत इच्छा शक्ति के साथ हकीकत में लाना और साथ ही इनके बारे में जागरूकता फैलाना ही दीर्घकालिक एवं स्थायी परिणाम दे सकते हैं।

-नेहा पांडेय

Disclaimer: इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं। किसी भी विवाद के लिए फोरम4 उत्तरदायी नहीं होगा।

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