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कविताः पंछी पपीहा की व्यथा

वृक्ष धरा के हैं आभूषण, करते हैं नित दूर प्रदूषण

अखिल विश्व के जीवन में नित जीवन रक्षक वायु बहाते

सुंदर छाह पथिक को देते, राहगीर भी चलते-फिरते शरणागत हो जाते इनके।

कवि चन्द्रशेखर तिवारी कहते हैं कि आज जमीन जल रही है और हमें वृक्षों की नितांत आवश्यकता है। आधुनिक जीवन शैली की चाह में मनुष्य पर्यावरण के साथ खिलवाड़ करने से भी परहेज नहीं कर रहा है। वर्षों पहले पपीहा पक्षी आकाश में विचरण करता दिखाई देता था, मगर आज वह विलुप्त हो गया है। उसे हम अपने बचपन में देखा करते थे। उसकी बोली बहुत मीठी होती थी और वह आकाश में अतरंग वाचना करता था। वे उस पपीहा पंछी की व्यथा के बारे में लिखते हैं-

दूर क्षितिज के नभ में जाकर पंछी पपीहा व्यथा कहे

हे नील गगन के अवतारी धरती जल बनकर बुला रही

धरती तब होगी धन्य-धन्य जब तुम बरसोगे उपवन में

डाली-डाली और पात-पात में प्राकृतिक आलिंगन में

घटा-छटा के वात्सल्य का बहता नीर समीरों में

नाले-नदियां घुमड़-घुमड़ कर कहतीं मिलकर सागर से

धरती के संग धन्य हो गए वृक्ष-धरा के संगम से।

(कवि चन्द्रशेखर तिवारी उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारी हैं)

 

 

Disclaimer: इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं। किसी भी विवाद के लिए फोरम4 उत्तरदायी नहीं होगा।

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