देश में आए दिन भीड़ की ओर से किसी की हत्या कर देने का समाचार सामने आ रहा। अब इसे भीड़तन्त्र का एक शर्मनाक पहलू मानें, सरकार की विफलता या फिर कट्टरपंथियों की सफलता। कारण चाहे जो भी हो, पर किसी प्रजातंत्र का इससे ज्यादा मजाक नहीं बनाया जा सकता, जहां भीड़ ही पुलिस और भीड़ ही अदालत बन जाती है। ऐसे में ये कहना बिल्कुल गलत न होगा कि गोरक्षा के नाम पर समाज में लोग असहनशील और अपराधी बन रहे हैं।
एक नज़र घटना पर
बुलंदशहर के स्याना तहसील के गांव महाव में सोमवार सुबह गोकशी की सूचना मिलने पर पुलिस, हिंदूवादी संगठन और ग्रामीणों में जमकर टकराव हुआ। गुस्साए ग्रामीणों ने चिंगरावठी चौकी के पास सड़क पर जाम लगा दिया। स्याना थाने के कोतवाल इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह ने मौके पर पहुंचकर जाम खुलवाने की कोशिश की तो ग्रामीणों ने पथराव कर दिया।
इज्तेमा के कारण किया जल्द जाम खुलवाने का प्रयास किया गया। बुलंदशहर में तब्लीगी इज्तिमा चल रहा है। इसमें देश दुनिया के लाखों लोगों ने भाग लिया। पुलिस ने सांप्रदायिक माहौल खराब होने की आशंका के चलते जल्द जाम खुलवाने की कोशिश की। हालात बेकाबू होते देख पुलिस ने हवाई फायरिंग की। इस पर ग्रामीणों ने सुबोध कुमार पर हमला बोल दिया। घटना में गोली लगने से कोतवाल सुबोध की जान चली गई।
सियासी दांव
अब इस घटना को लेकर अलग-अलग अटकलें लगाई जा रही हैं। मुख्यमंत्री आदित्यनाथ को इस घटना में साजिश नज़र आ रही। अन्य मंत्री जी को लगता है कि वोट बैंक के लिए यह भड़काऊं प्रयोजन किया गया। बेहिसाब बयानबाज़ी हो रही है। पुलिस जहां जांच में लगने का आश्वासन दे रही वहीं नेता जी मृतकों के मुआवजा तय कर रहे, पर यह सब बहुत आम बात लग रही है, क्योंकि यह पहली घटना नहीं है।
भीड़ बनी अदालत
इससे पहले भी बहुत सारी इस प्रकार की घटना को भीड़ अंजाम दे चुकी है, कभी गौकशी, कभी बच्चा चोरी तो कभी प्रेम प्रसंग, के नाम पर भीड़ हत्याएं करते आ रही है। भीड़ को न कोई प्रशासन पकड़ सकता है ना कोई अदालत कार्यवाही कर सकती है। अगर कोई मुसलमान लड़का और हिन्दू लड़की एक साथ मिल कर जीवन बिताने की बात करें तो ये भीड़ उस लड़के को मार के इंसाफ करती है, पर अगर कोई लड़कियों पर तानाकसी करे या अन्य दुर्व्यवहार तब यही भीड़ कहीं नज़र नहीं आती। यदि किसी पड़ोसी के घर में चोरी हो जाये तो किसी को खबर नहीं मिलती पर गाय की बात आए तो फिर यह भीड़ बेकाबू होकर इंसाफ करने में पीछे नहीं हटती।
सरकार की जिम्मेदारी
कुछ मामलों में हमारे समाज में भीड़ अनियंत्रित हो जाती है, पर सरकार को क्या यह बात बताने की जरूरत है। सरकार चाहे तो प्रशासन की कमर कसने में समय बिल्कुल नहीं लगेगा। यह धर्म, जाति और इतिहास की राजनीति करती सरकार अपनी जिम्मेदारियों को साजिश का नाम दे देती है। इलाहाबाद को प्रयागराज बनाने जैसे काम में दिलचस्पी लेती सरकार को राज्य की समस्या का अंदाजा न रहा।
भीड़ एक यंत्र बनता जा रहा है। आजकल लोगों की मानसिकता को समझना बहुत आसान हो गया है। कोई भी गुट अपने हिसाब से भीड़ को नियंत्रित कर सकता है। यह समाज के लिए चिंतन का विषय है।
-पूजा श्रीवास्तव
(इस लेख में लेखिका पूजा के निजी विचार हो सकते हैं, इससे फोरम4 का सहमत होना कोई जरूरी नहीं हैं)
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