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कविताः फ़िर कल

-बिकाश आनंद

आंखें तरस रहीं,
पलकें बरस रहीं,
न जाने तन बदन में,
ये कैसी हो रही हलचल
ओह, फ़िर कल…

रात न कटी,
दिन जो है डटी ,
न जाने कब लौटेगा,
ये बीत रहा जो पल
ओह, फ़िर कल…

हवाएं जो चलीं,
सायेबा (प्रेमिका) की गली,
बदलता है जमाना,
न जाना तुम बदल,
ओह, फ़िर कल..

प्रेमी दिल दीवानें ,
बस प्रेम को ही जानें,
प्रेम रस बिना ये,
जिंदगी है जो गरल,
ओह फ़िर कल…

सबको अहं की बीमारी,
जाने ये दुनिया सारी,
वेद हकीम सब है हारे,
न इसका कोई हल,
ओह, फ़िर कल…

बच-बच यहाँ तू चलना,
जमाने का काम है जलना,
ठोकर लगते ही गिरोगे,
जरा गिर-गिर के तू सँभल,
ओह, फ़िर कल…

Disclaimer: इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं। किसी भी विवाद के लिए फोरम4 उत्तरदायी नहीं होगा।

1 Comment on "कविताः फ़िर कल"

  1. Nice Poem

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