हम देशी हैं साहब
जब सरकारी कर्मचारियों की छंटनी हो रही हो , दिनोंदिन चुपचाप बिना कोई शोर जब सरकारी कम्पनियां बंद कराई जा रही हैं जबरन मुनाफे के बावजूद , दिनोदिन चुपचाप बिना कोई शोर और दूसरी ओर…
जब सरकारी कर्मचारियों की छंटनी हो रही हो , दिनोंदिन चुपचाप बिना कोई शोर जब सरकारी कम्पनियां बंद कराई जा रही हैं जबरन मुनाफे के बावजूद , दिनोदिन चुपचाप बिना कोई शोर और दूसरी ओर…
आयी आयी मोर नगरिया झूठ बोलती एक बदरिया गड़ गड़ की ध्वनि रही सुनाती पर न बरसी वो इह डगरिया । छायी बनकर घुँघराली सी लगती कितनी मतवाली सी कजरारे से नयन दिखाकर सज…
संबंधों की मरुथली को नेह भरी बरसात चाहिये दुख शूल बनकर चुभे कभी न अपनापन सौगात चाहिये । पीर परायी आँसू मेरे कुछ ऐसे अहसास चाहिये । महके सौरभ रेत कणों में हरी भरी…
सर पर छत है , पर पानी टपकता है। खुशियों का अंबार है , पर आदमी फफकता है। चारों तरफ नीतिज्ञ हैं, पर वह बहकता है। बेईमानी से भरा है, पर वो…