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कविता

हम देशी हैं साहब 

जब सरकारी कर्मचारियों की छंटनी हो रही हो , दिनोंदिन चुपचाप बिना कोई शोर जब सरकारी कम्पनियां बंद कराई जा रही हैं जबरन मुनाफे के बावजूद , दिनोदिन चुपचाप बिना कोई शोर और दूसरी ओर…


एक बदरिया

आयी आयी मोर नगरिया झूठ बोलती एक बदरिया गड़ गड़ की ध्वनि रही सुनाती पर न बरसी वो इह डगरिया ।   छायी बनकर घुँघराली सी लगती कितनी मतवाली सी कजरारे से नयन दिखाकर सज…


इक सच्ची मुस्कान चाहिये

संबंधों की मरुथली को नेह भरी बरसात चाहिये दुख शूल बनकर चुभे कभी न अपनापन सौगात चाहिये ।   पीर परायी आँसू मेरे कुछ ऐसे अहसास चाहिये । महके सौरभ रेत कणों में हरी भरी…


सर पर छत है पर पानी टपकता है

सर पर छत  है , पर पानी टपकता है।   खुशियों का अंबार है , पर आदमी फफकता है।   चारों तरफ नीतिज्ञ  हैं, पर वह बहकता है।   बेईमानी से भरा  है, पर वो…