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डीयूः कॉलेजों में पदोन्नति और प्रोफेसरशिप के मामले में क्या हुआ, जानिए

दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) द्वारा यूजीसी विनियमन 2018 के संशोधन और नियमन के लिए गठित उच्च स्तरीय कमेटी की शुक्रवार को हुई बैठक में सबसे ज्यादा चर्चा शिक्षकों के पदोन्नति के मुद्दे पर हुई। लगभग 3 हजार शिक्षकों की पदोन्नति का मामला पिछले दस साल से अधिक समय से लंबित है। छठें वेतन आयोग की सेवा शर्तों में शामिल शिक्षक विरोधी एपीआई स्कीम ने पदोन्नति में आज तक न सुलझने वाली समस्या खड़ी की थी।

पदोन्नति का रास्ता साफ

नये विनियमन (रेगुलेशन) में पुराने लंबित मामलों को भी बड़ी राहत देते हुए पदोन्नति का रास्ता साफ किया गया है। अब शिक्षकों के सामने एपीआई रहित विनियमन 2018 और एक दम उदार और नरम बना दी गई विनियमन 2010 में से किसी भी एक को अपने पदोन्नति के लिए चुनने के लिए दो विकल्प हैं। नये विनियमन में शिक्षकों को रिफ्रेशर और ओरिएंटेशन की बाध्यता से ही बड़ी राहत दी गई है। जिन शिक्षकों के पदोन्नति दिसम्बर 2018 तक लंबित होंगे उन्हें रिफ्रेशर से पूरी तरह मुक्त रखा गया है।

विद्वत परिषद के सदस्य प्रो. हंसराज सुमन ने बताया कि 5 सितंबर की बैठक में सर्व सम्मति से शिक्षक समुदाय को यह बड़ी राहत देने पर सहमति बन गई है। मुझे उम्मीद है कि नए साल में हमारे सभी शिक्षक साथियों का लंबे समय से लंबित पदोन्नति हो सकेगी।

बैठक में विभिन्न प्रकार के अवकाशो के ऊपर भी चर्चा हुई ताकि शिक्षकों को ज्यादा से ज्यादा लाभ मिल सके और उन्हें प्रशासन द्वारा छुट्टी के अधिकार से वंचित न किया जा सके। उन्होंने आगे यह भी बताया है कि कई कॉलेजों में प्राचार्य शिक्षकों को छुट्टी देने आना कानी और अड़चन पैदा करते हैं जबकि छुट्टी लेना शिक्षकों का अधिकार है। शिक्षकों को छुट्टी न देकर उत्पीड़ित किया जाता है उनके अकादमिक विकास को अवरुद्ध किया जाता है। हम प्राचार्य की इस मनमानी के खिलाफ हैं।

प्राचार्य को 5 साल का कार्यकाल देने की डूटा की मांग का समर्थन

प्रो. सुमन ने शिक्षक संघ (डूटा) की 5साल का एक ही कार्यकाल प्राचार्यों को देने की मांग का भी समर्थन किया, क्योंकि इससे प्राचार्यों की मनमानेपन पर रोक लगेगी और ज्यादा से ज्यादा शिक्षकों को कॉलेज का नेतृत्व करने का अवसर मिलेगा। ध्यातव्य है कि डूटा लंबे समय से प्राचार्यों के कार्यकाल को सीमित करने की मांग करता रहा है और इस मांग को पूरा करने के लिए यूजीसी से लेकर एमचारडी तक संघर्ष करता रहा है।

बैठक में कॉलेजों में बनने वाले प्रोफेसर को भी दस साल की सेवा के बाद कुलपति पद के लिए योग्य मानने की बात रखी गई।

Disclaimer: इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं। किसी भी विवाद के लिए फोरम4 उत्तरदायी नहीं होगा।

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