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अगर आप छात्र या शिक्षक हैं तो आपको साहित्यिक डाकेबाजी के बारे में ये जान लेना जरूरी है

-सुकृति गुप्ता

द टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी रिपोर्ट के अनुसार मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने यूजीसी के साहित्यिक डाकाबाजी वाले नियम को मंजूरी दे दी है। अब जो शोधार्थी या शिक्षक दूसरे के शोध पर डाका डालेगा, उन्हें इसका खामियाज़ा भुगतना होगा। अगर आप शोध छात्र हैं तो आपका पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) रद किया जा सकता है और अगर आप शिक्षक हैं तो आपकी नौकरी भी जा सकती है।

कई विद्वानों पर लगे हैं साहित्यिक डाकेबाज़ी के आरोप

कई बड़े विद्वानों और लेखकों पर साहित्यिक चोरी के आरोप लगे हैं। यहाँ तक कि जेएनयू जैसे बड़े शिक्षा संस्थान में भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति दीपक पेंटल (Deepak Pental) पर भी 2014 में साहित्यिक चोरी का आरोप लगा था। फिलहाल ऐसे तीन मामले आजकल बड़ी लाइमलाइट में हैं-

पांडिचेरी विश्वविद्यालय के कुलपति चंद्र कृष्णमूर्ति, वाराणसी के महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ के रीडर और लखनऊ के एपीजे अब्दुल कलाम टेक्निकल यूनिवर्सिटी के कुलपति विनय कुमार पाठक का मामला।

यूजीसी ने पिछले वर्ष जारी किया था नोटिस

यूजीसी ने साहित्यिक चोरी से निपटने के लिए एक कमेटी बनाई थी। इस कमेटी ने पिछले वर्ष 1 सितंबर को एक नोटिस जारी करते हुए सूचना दी थी कि वह साहित्यिक चोरी के संबंध में निर्देश जारी करेगी। नोटिस के साथ इस रेग्युलेशन का ड्राफ्ट भी पेश किया गया था, जिस पर 30 सितंबर, 2017 तक विद्वानों और विद्यार्थियों की राय मांगी गई थी। 20 मार्च 2018 को एमएचआरडी की मंजूरी के बाद यूजीसी ने भी इसे मंजूर कर लिया था।

साहित्यिक चोरी को तीन स्तरों पर रखा गया है

इस विनियमन में विद्यार्थियों व शिक्षकों दोनों के लिए सज़ाएं तय की गई हैं। इन्हें साहित्यिक डाकाबाज़ी के फीसद के आधार पर निम्न स्तरों पर रखा गया है-

10 प्रतिशत तक की समानता पाए जाने पर कोई सज़ा नहीं है।

पहला स्तर: 10% से 40% तक समानता – इस स्तर पर विद्यार्थी को उसके शोध के लिए कोई अंक नहीं दिए जाएँगे तथा उसे अपने शोध को संशोधित करने के लिए अधिकतम 6 महीने की अवधि दी जाएगी।

यदि कोई शिक्षक साहित्यिक चोरी करता है तो शिक्षक को शोध पत्र  वापिस लेने के लिए कहा जाएगा और एक साल तक किसी भी तरह का कार्य प्रकाशित करने की इजाज़त नहीं दी जाएगी।

दूसरा स्तर: 40% से 60% तक समानता – एक वर्ष तक विद्यार्थी को संशोधित पत्र पेश करने से रोक दिया जाएगा तथा 18 महीने के अंदर-अंदर उसे संशोधित शोध पत्र जमा करना होगा। मतलब आप एक वर्ष के बाद ही अपना संशोधित पत्र जमा कर पाएंगे।

यदि कोई शिक्षक साहित्यिक चोरी करता है तो शिक्षक को शोध पत्र वापिस लेने के लिए कहा जाएगा और दो साल तक किसी भी तरह के कार्य के प्रकाशन पर प्रतिबंध लगाया जाएगा। इसके अलावा एक वर्ष तक वार्षिक वेतन वृद्धि  पर भी रोक लगा दी जाएगी तथा दो वर्ष तक शिक्षक किसी भी यूजी, पीजी, एमफिल या पीएचडी के विद्यार्थी को सुपरवाइज़ नहीं कर सकेगा।

तीसरा स्तर: 60% या उससे अधिक समानता-इस स्तर पर विद्यार्थी को कोई अंक नहीं दिए जाएंगे और पाठ्यक्रम से उसका रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया जाएगा।

यदि कोई शिक्षक साहित्यिक चोरी करता है तो इस स्तर में शिक्षक से उसका कार्य वापिस लेने के लिए कहा जाएगा और तीन साल तक उसके किसी भी कार्य के प्रकाशन पर प्रतिबंध लगाया जाएगा। इसके अलावा दो वर्ष तक वार्षिक वेतन वृद्धि पर भी प्रतिबंध लगाया जाएगा तथा तीन वर्ष तक शिक्षक किसी भी यूजी, पीजी, एमफिल या पीएचडी के विद्यार्थी को सुपरवाइज नहीं कर सकेगा।

यहां यह समझ लें कि कुछ विशिष्ट मामलों में साहित्यिक डाकाबाजी के प्रति ज़ीरो-टॉलरेंस को अपनाया गया है। यदि किसी किताब या शोध के कोर वर्क में किसी भी प्रकार की साहित्यिक डाकाबाज़ी पाई जाती है तो उस मामले में सबसे अधिक सज़ा का प्रावधान है। यहाँ कोर वर्क से अभिप्राय किसी भी शोध या किताब के आमुख, सार, परिकल्पना, टिप्पणियों, परिणाम और निष्कर्ष से है।

साहित्यिक चोरी या डाकाबाज़ी संबंधी नियम केवल पीएचडी के विद्यार्थियों के लिए नहीं है। वे तमाम विद्यार्थी जो उच्च शिक्षा में शोध से जुड़े हैं, उन सबके लिए है। मतलब ये एमफिल और एमए के विद्यार्थी भी हो सकते हैं।

इन संदर्भों में नहीं आंकी जाएगी साहित्यिक चोरी

साहित्यिक चोरी को प्लेज्यरिज़्म डिटेक्शन टूल के सहारे आंका जाएगा। इसी वर्ष प्रकाश जावड़ेकर ने थीसिस को चेक करने के लिए टरनिटिन सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करने की बात कही थी। साथ ही यह भी ज़िक्र किया था कि कोई भी शोध छात्र अपने शोध को पूरा करने के लिए किसी अन्य के शोध पत्र का इस्तेमाल नहीं कर सकेगा।

यूजीसी के नियमों के तहत निम्न संदर्भों में साहित्यिक चोरी नहीं आंकी जाएगी-

वो तमाम उद्धरित कार्य जो कि सार्वजनिक दायरे के अंतर्गत आते हैं अथवा जिन्हें इस्तेमाल करने के लिए पहले मंजूरी ली गई है

सभी रेफरेन्स, संदर्भ ग्रंथ सूची, विषय सूची तथा आभार

सभी जेनेरिक टर्म्स, सिद्धांत, सामान्य चिह्न तथा मानक समीकरण

इसके अलावा परीक्षा में पूछे गए प्रश्नों पर लिखी गई उत्तर पुस्तिका को इस संदर्भ में नहीं आंका जाएगा।

यह भी जाने कि साहित्यिक चोरी है क्या

यूजीसी अधिनियम 1956 की धारा 2(K) के अनुसार साहित्यिक चोरी से अभिप्राय अकादमिक बेईमानी और नैतिकता का उल्लंघन है। इसमें किसी और के काम को स्वयं के रूप में इस्तेमाल करना शामिल है। इसमें डेटा चोरी और आत्म चोरी भी शामिल है।

यहाँ डेटा चोरी तो आप समझ गए होंगे, पर ये आत्म-चोरी (Self Plagiarism) क्या है?

आत्म चोरी से अभिप्राय अपने ही काम की चोरी किए जाने से है। यहाँ मसला अपने पुराने काम को नया दिखाने का है। मतलब यदि आप अपने पुराने काम का उपयोग अपने नए कार्य में पर्याप्त रूप से उद्धृत किए बिना करते हैं तो इसे भी साहित्यिक चोरी के दायरे में लाया जाएगा। यह शोध के मौजूदा उद्देश्य का हनन है। यहाँ मसला कॉपीराईट का भी है। मतलब प्रकाशित कार्यों के कॉपीराइट आमतौर पर लेखक के बजाए प्रकाशक के पास होते हैं। ऐसे में आपके स्वयं के काम से चोरी करने का अर्थ इस तरह के कॉपीराइट का उल्लंघन होगा।

प्रो अपर्णा की राय (एक्सपर्ट व्यू)

यूजीसी द्वारा साहित्यिक चोरी को रोकने के लिए बनाए गए नियमन के संदर्भ में हमने दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास की प्रोफेसर अपर्णा बालाचंद्रन से बात की। उन्होंने कहा कि हालांकि यूजीसी ने 10 फीसद की छूट दी है, मगर फिर भी यह ज़रूरी है कि उस 10 फीसद की समानता को भी उचित रूप से उद्धृत किया जाए। शोध के लिए कोई शॉर्टकट नहीं हैं। यदि आप वाकई शोध करना चाहते हैं तो उसके लिए आपको शोध ही करना होगा। ये ज़रूरी है कि आप बड़े विद्वानों को पढ़ें, उन्हें समझें पर उनके विचारों को अपने विचारों की तरह पेश न करें। उनको उचित रूप से उद्धृत किया जाना ज़रूरी है।

यह पूछने पर,

क्या साहित्यिक चोरी करने के लिए शोधार्थी ही जिम्मेदार है या सिस्टम भी? अपर्णा कहती हैं कि दोनों की ही इसमें भूमिका है। बहुत से विद्यार्थियों को यह पता ही नहीं होता कि साहित्यिक चोरी क्या है? हमारी शिक्षा व्यवस्था में कई दिक्कते हैं। मसलन स्कूल में रटने वाले सिद्धांत पर ज़ोर दिया जाता है। कुछ विद्यार्थियों द्वारा ग्रेजुएशन में भी पढ़ने का यही तरीका अपनाया जाता है। ऐसे में जब वे एमए या एमफिल करने आते हैं तो उन्हें साहित्यिक चोरी की जानकारी नहीं होती। लेकिन, कई दफा यह जानबूझकर भी किया जाता है।

साहित्यिक चोरी को कैसे रोका जाए?

इस पर वे कहती हैं कि इसके लिए यह ज़रूरी है कि विद्यार्थियों को पढ़ाने के साथ-साथ इसके बारे में भी बताया जाए और उन्हें बार-बार इसके प्रति सचेत किया जाए। हम खुद भी एमफिल/पीएचडी कर रहे अपने विद्यार्थियों को इसके बारे में बताते रहते हैं कि शोध के दौरान क्या नहीं करना है या क्या चीज़ शोध को विकृत करती है।

यूजीसी के नियम जो साहित्यिक चोरी रोकने के लिए बनाए हैं वे किस हद तक कारगर रहेंगे?

इस पर अपर्णा कहती हैं कि ये नियम यदि ठीक से लागू होते हैं तो वाकई कारगर रहेंगे। हाल में इस संदर्भ में कई हाई-प्रोफाइल केस सामने आए हैं। इसलिए यह जरूरी भी था कि इसका कोई हल निकाला जाए। यूजीसी ने ये नियम बनाकर बहुत अच्छा किया।

Disclaimer: इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं। किसी भी विवाद के लिए फोरम4 उत्तरदायी नहीं होगा।

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