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एनजीओ पर आधारित एक उपन्यास ‘एक तयशुदा मौत’ पढ़कर जान जाएंगे इसकी हकीकत

श्रेया उत्तम

‘एक तयशुदा मौत’ बंगला लेखक मोहित राय के द्वारा लिखा गया लघु उपन्यास है। मूल उपन्यास बंगला भाषा में ‘ऐकटि अवधारित मृत्युर धाराविवारनी’ के नाम से है। देश में बढ़ते जा रहे गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) की संख्या में दिन दूनी रात चौगुनी गति से इजाफ़ा हुआ है। देश में लगभग 33 लाख से ज़्यादा गैर सरकारी संगठन हैं।

यह उपन्यास साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के जहाजों में सवार होकर आए गैर सरकारी संगठनों की आंतरिक पोल खोलता है। एनजीओ में काम करने वाले कर्मचारी दीपू की कहानी है। उजड़े, वीरान, जला देने वाली धूप, गर्मी, रेतीली, बंजर ज़मीनों व खदानों की पृष्ठभूमि से उपन्यास की शुरुआत होती है और कलकत्ता, दिल्ली, बिहार राज्यों के इर्दगिर्द घूमती है। समाजसेवा व जागरूकता फैलाने की बात व ज़िन्दगी की ख़ोज में निकले हुए दीपू को भी इस बात का आभास होता रहता है कि एक भयानक, काली सोच उसके आसपास फैलाई गई है, जिसे एक मौत या पहले से निर्धारित मौत कह सकते हैं।

असंगठित मज़दूरों से संबंधित केस स्टडी करते हुए दीपू इन मज़दूरों और उनके बच्चों के लिए  एनजीओ के बैनर तले बदलाव लाने का भरपूर प्रयास करता है।

समाज को अपंग बनाने वाली जातीय इकाइयों से लड़ता है, राजनीतिक हस्तक्षेप झेलता है, फटी तिरपालों की छतों वाली बस्तियों में जागरूकता का बिगुल बजाता है, जुलूस निकालता, प्रतिरोध झेलता है, लड़ता है, आवाज़ उठाता है, गिरता है, लाठियां खाता है, उठता है, प्यार करता है और फिर एक दिन मार दिया जाता है। इन टीस मारती, गंधाती व्यवस्थाओं के सुधार के लिए जिस एनजीओ का वो हाथ पकड़े था, वो बस उसके साथ आंख-मिचौली खेल रहे थे। मौत के पहले ही एनजीओ मदद की बजाय अपना हाथ पीछे खींच लेता है।

दीपू की मौत की वजह खंगालता हुआ दोस्त गैर सरकारी संगठनों के कामकाज, संस्कृति और राजनीतिक पहलुओं को उजागर करता है। पूरा उपन्यास इसी पर है।

समाजसेवा के नाम पर देश के न जाने कितने एनजीओ फल फूल रहे हैं। गरीबी समाज की नहीं बल्कि एनजीओ की दूर हो रही है। विकास देश का नहीं, इन एनजीओ का हो रहा है।

परिकल्पना प्रकाशन से छपे उपन्यास की शैली बहुत ही रोचक और बांधने वाली है। घटनाओं के तेज प्रवाह से गुजरते हुए उपन्यास बेहद ज़रूरी सवाल पाठकों के सामने छोड़ता है। उपन्यास का बंगला भाषा से हिंदी में अनुवाद रामकृष्ण पांडेय ने किया है।

किताब के बारे में

बंगला में यह सर्वप्रथम 1988 में छपा था। प्रथम संस्करण फरवरी 2004 में व द्वितीय  संशोधित संस्करण जनवरी 2008 में प्रकाशित हुआ। पुस्तक का मूल्य 30₹ है। पुस्तक का आवरण राम बाबू ने दिया है।

Disclaimer: इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं। किसी भी विवाद के लिए फोरम4 उत्तरदायी नहीं होगा।

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