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भारत-पाक की लड़ाई में टैंक कमांडर रहे नायब रिसलदार संतराम ने अपने पुराने दिनों को किया याद

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नई दिल्ली। 16 दिसंबर के ही दिन 1971 में (47 साल पहले) पाकिस्तान की सेना ने भारतीय फौज के सामने आत्मसमर्पण किया था और बांग्लादेश (जिसे पहले पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जाना जाता है) के नाम से एक नया देश दुनिया के नक्शे पर आया था। इस दिन को बांग्लादेश अपने स्थापना दिवस के तौर पर और भारतीय सेना विजय दिवस के तौर पर मनाती है।

भारत को इस लड़ाई में बांग्लादेश के लोगों का काफी साथ मिला जिस कारण भारत ने 14 दिन में ये लड़ाई जीत ली। इस युद्ध के हीरो तब के आर्मी चीफ सैम मानेकशॉ रहे थे। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह पहली जंग थी, जिसे भारतीय सेना ने जीता था।

इस युद्ध के दौरान हमारे जवानों ने 93,000 कैदियों को पकड़ा था। इस लड़ाई में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की अहम भूमिका देखी जा सकती है।

अब स्थितियां बदल गई हैं आज जब सीमा पार से आतंकवाद का खतरा फिर बढ़ गया है। पाकिस्तान द्वारा सीजफायर उल्लंघन के मामले बढ़ गए हैं। ऐसे में उन वीर सैनिको को याद करने का दिन है।

इसी को लेकर फोरम4 से लड़ाई के गवाह तब के भारत की ओर से टैंक कमांडर रिटायर्ड नायब रिसलदार संतराम छिल्लर से हुई बातचीत के अंश को आपसे साझा कर रहे हैं।

देखें वीडियोः

 

संतराम अब 82 वर्ष के हो चुके हैं और बाहरी दिल्ली के निजामपुर गांव में रह रहे हैं। संतराम ने न केवल भारत- पाक का 1971 की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाई है, बल्कि वह 1962 के भारत-चीन युद्ध, 1965 के भारत-पाक युद्ध और 1961 के (जब भारतीय सेना ने गोवा, दमन और दीव को करीब 450 साल के पुर्तगाली साम्राज्य से आजाद कराया था, 18 दिसंबर 1961 को भारतीय सेना ने गोवा में ऑपरेशन विजय की शुरुआत की और 19 दिसंबर को पुर्तगाली सेना ने आत्मसर्पण कर दिया) गोवा में पुर्तगालियों से लड़ाई के वे साक्षी ही नहीं रहे बल्कि उन्होंने उसमें अपने साहस का परिचय देते हुए विरोधियों के साथ जमकर मुकाबला किया। यहीं नहीं वह तीन साल नेशनल डिफेंस एकेडमी  (एनडीए) में इंस्ट्रक्टर भी रहे।
पाकिस्तान के साथ लड़ाई के एक सवाल के जवाब में वह कहते हैं कि मैं खुद जाऊंगा लड़ने। जब तक सांस है तब तक देश के लिए मैं समर्पित हूं। उनके जज्बे को ठीक वैसे ही देखा जा सकता है जैसे जब वह टैंक कमांडर थे। कहते हैं कि मुझे अब तो कोई टैंक कमांडर बनाएगा नहीं, लेकिन मैं अब भी इतना साहस रखता हूं कि ऐसे समय में देश के साथ रहूं।

अपने सैनिक साथियों के साथ संतराम छिल्लर

1971 का भारत-पाक युद्ध

भारत-पाक की युद्ध की यादें ताजा करते हुए संतराम बताते हैं कि उस समय उनकी पोस्टिंग बबीना में थी। बबीना से ट्रेन में माउंट, दिल्ली, बहादुरगढ़, रोहतक, पठानकोट, चक्कीब्रिज जाकर डिसमाउंट करने के बाद टैंक तैयार करके बॉर्डर तक पहुंचाया गया। टैंक को लोड करके सड़क मार्ग से सम्भा के जंग़लों की ओर ले जाया गया। यहां से पाकिस्तान बॉडर शुरू हो जाता हैं रास्ते में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता था कि ट्रांसपोर्ट से टैंक गिर न जाए। बिना बिजली के अंधेरे में ही चले जा रहे थे। उस वक़्त ये सोच लिया था कि अब घर वापस नहीं जाना यहीं देश के लिए ही जीना मरना हैं ।
उस समय सम्भा में लाइन नहीं डाली गई थी कार्य चल रहा था। इस बीच चूरमा-दाल बनाकर हम खुद खिलाते और खाते।

परेशानियों को मात देते किया था डटकर मुकाबला
अपने जत्थे के साथ हम रात को ही चला करते थे। पहले मंदिर में आरती और जयकारे लगा कर फिर पाकिस्तान की तरफ आगे बढ़ते।
पाक-बॉर्डर पहुंचे,  हमने चक मारियल पहुँचकर टैंक से फायर किया, वहां से भी जवाबी फायरिंग हो रही थी। हम सभी की पोजीशन अलग-अलग थी। रेकी करते रहे। कोई हलचल नहीं। जमीन पर बम फेके गए। इसके बाद जमीन से पानी निकलने लगा। हम आगे चकढोलमा जैसे गांवों से होते हुए निकले थे।
हमारे जत्थे के कमांडर मेजर शेरेगिल और लेफ्टिनेंट जनरल मेजर स्पैरो रहे। रात में मीटिंग हुई जहां कहा गया चाहे सब कुछ खत्म हो जाये लेकिन, शकरगढ़ हमें चाहिए। मैं टैंक कमांडर संतराम अपने जत्थे के साथ निकल पड़ा था। टैंकों का क्रम ऐसे था- जहां पहला टैंक माइन ट्रोल, दूसरा मेरा टैंक, तीसरा ऑफिसर टैंक, चौथा हवलदार का टैंक रहा।

तोप के साथ हमला करने के लिए मुस्तैद जाबांज

जमीन खाफी दलदली थी, जिससे आगे बढ़ने में काफी परेशानी हो रही थी। लेकिन, हम सभी चुनौतियों का सामना करते गए। हमने पाकिस्तान के अनेक सैनिकों को जीवन दान दे दिया। युद्ध में विराम लगा।
युद्ध के दौरान आने वाली सभी मुश्किलों को मात दी
उस समय सर्दी का मौसम था। न कंबल था न पानी और न खाने का इंतजाम। जंगलों में कई तरह की कीटपतंगों से परेशान हो जाते थे। साथ ही वह यह भी बताते हैं कि टैंक की कमी होने पर दिल्ली से टैंक लाने में 10 से 12 दिन का समय लग जाता था।
‌1971 का भारत-पाक के युद्ध को काफी करीब से देखने वाले संतराम आगे बताते हैं कि कैजुआलिटी होने पर शहीद हुए जवानों की लाशों को वहीं छोड़ दिया जाता था। अब तो उन्हें घर पर बाकायदा इंतजाम के साथ पहुंचा दिया जाता था। लेकिन, तब की स्थिति में ये सब नहीं था। यह कहते हुए वह काफी भावुक हो गए। साथ ही वह कहते है कि उनके खाने-पीने के लिए एक गाड़ी आया करती थी। इसके अंदर सब कुछ हुआ करता था- जैसे खाना, पानी,  पेट्रोल, डीजल अन्य प्रकार के जरूरत के सामान। हालांकि रात के अंधेरे में कब आएंगी गाड़ियां ये भी नहीं पता होता था। कई दिनों तक हमें भूखे प्यासे रह जाना पड़ता था।

1962 में भारत चीन के युद्ध में हार का कारण भी बताते हैं वह कहते हैं कि उस समय भारतीय सेना को रास्तों की जानकारी नहीं थी जबकि चीनियों को पहले से सब कुछ पता था। हथियारों की कमी भी एक बड़ा कारण मानते हैं ।

युद्ध से ही होगा भारत-पाक समस्या का समाधान

संतराम का कहना है कि अब तो पाकिस्तान सीजफायर का उल्लंघन करता है और वह इतनी आसानी से बातचीत के लिए भी तैयार नहीं होता। इसका समाधान बस यही है कि बड़ा युद्ध हो और सभी को मार दिया जाए।

बेटा भी कर रहा है देश की सेवा
वह बताते हैं कि उनका एक साथी जवान राम जी लाल (राजस्थान ) उसे कमीशन भी मिलने वाला था। वह शहीद हो गया। टैंक भी ध्वस्त हो चुका था। कुछ भी नही बचा था।
वह अंत में बेहद ही खुशी से बताते हुए कहते हैं कि उनके बाद उनके पोता कैप्टन नवदीप छिल्लर देश की सेवा कर रहे हैं। वह भी एनडीए और आईएमएमए से कमीशन लेकर 75 आर्मड रेजिमेंट में कैप्टन पद पर जैसलमेर बॉडर पर कार्यरत हैं।

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