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पॉलीथिन बनाम प्रदूषणः कैसे होगा पर्यावरण संरक्षण?

तस्वीर- गूगल साभार

-प्रभात

पूरे विश्व में पर्यावरण को लेकर समय-समय पर बहस तो होती ही रहती है, लेकिन भारत में अब पर्यावरण प्रदूषण का मुद्दा हर महीने किसी न किसी वजह से छाया रहता है।शीत ऋतु में देश की राजधानी में स्मॉग का कहर विषय था तो अब इस गर्मी के मौसम में धूल और इसकी वजह से धुंध का मुद्दा मीडिया में खूब सुर्खियों में रहा। विश्व पर्यावरण दिवस के दिन से ही इससे संबंधित खबरें मीडिया में हैं। इन सब के बावजूद, 23 जून से मुंबई में प्‍लास्टिक पर प्रतिबंध लग गया है। इसलिए एक बार फिर से पॉलीथिन बनाम प्रदूषण एक मुद्दा बन गया है।

गौरतलब हो कि अब कोई प्‍लास्टिक का कैरी बैग उपयोग करता या किसी दुकानदार से लेता पाया गया तो उस पर 10 हज़ार रुपए का जुर्माना लगाया जा सकता है। बीएमसी ने इसे सख्‍ती से लागू करने का निर्णय लिया है। इसके लिए इंस्‍पेक्‍टर्स की सूची जारी की है जो कि दुकानों पर प्‍लास्टिक पर नज़र रखेंगे। इसके बाद इंस्‍पेक्‍टर्स की दो और सूचियां जारी की जाएंगी। ये बाजार और मॉल सहित गलियों के हॉकर्स पर निगरानी रखेंगे। नागरिकों को तीन महीने का समय दिया गया था ताकि वे पेपर और कपड़े से बने बैग का उपयोग शुरू करें। राज्‍य सरकार ने 23 मार्च को प्‍लास्टिक बैग बैन करने की सूचना जारी की थी। इसके लिए तीन महीने की मियाद दी थी।

इसके पहले दिल्ली में भी लग चुका है इस तरह का प्रतिबंध

शहर को साफ सुथरा बनाए रखने के लिए एनजीटी ने एक जनवरी 2017 को दिल्ली/एनसीआर में डिस्पोजेबल प्लास्टिक के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया था। पूरे शहर में विशेष कर होटलों, रेस्टोरेंट्स और सार्वजनिक एवं निजी कार्यक्रमों में डिस्पोजेबल प्लास्टिक के इस्तेमाल पर रोक लगायी थी।

देश की राजधानी दिल्ली को प्लास्टिक फ्री बनाने की दिशा में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल दिल्ली में 50 माइक्रोन से कम मोटाई वाले प्लास्टिक की थैलियों के इस्तेमाल पर अंतरिम प्रतिबंध लगा चुका है। एनजीटी अध्यक्ष न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह भी घोषणा की कि अगर किसी व्यक्ति के पास से इस तरह के प्रतिबंधित प्लास्टिक बरामद होते हैं, तो उससे 5000 रुपए का पर्यावरण हर्जाना भी वसूला जाए। साथ ही दिल्ली सरकार को भी एक सप्ताह के अंदर ऐसे प्लास्टिक के समूचे भंडार को जब्त करने का निर्देश दिया था।

नए प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट नियम 2016 के तहत, प्लास्टिक थैलियों की मोटाई 40 माइक्रोन्स से बढ़ाकर 50 माइक्रोन्स कर दी गई।

दुनियाभर में लड़ी जा रही है प्लास्टिक के खिलाफ लड़ाई

पूरे विश्व में प्लास्टिक के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए मुहिम चलाई जा चुकी हैं। कई देशों ने अपने-अपने तरीके से प्लास्टिक बैग पर प्रतिबंध लगाया जैसे कि आयरलैंड ने प्लास्टिक बैग के इस्तेमाल पर 90 फीसद तक टैक्स लगा दिया था। वहीं, इससे मिलने वाले टैक्स से देश भर में प्लास्टिक बैग को रिसाइकल करने का अभियान चलाया गया। फ्रांस ने भी 2005 से प्लास्टिक बैग के प्रयोग पर बैन लगाना शुरू किया और धीरे-धीरे 2010 तक ये पूरी तरह से लागू हो गया। वहीं ऑस्ट्रेलिया ने भी अपने नागरिकों से स्वैछिक तौर पर प्लास्टिक बैग का इस्तेमाल न करने की अपील की। ऑस्ट्रेलिया में आज प्लास्टिक बैग्स का इस्तेमाल 90 फीसदी तक बंद हो गया है।

देश की राजधानी दिल्ली में हर रोज 690 टन, चेन्नई में 429 टन, कोलकाता में 426 टन और मुंबई में 408 टन पॉलीथिन फेंकी जाती है, जबकि पूरे देश में हर साल 56 लाख टन प्लास्टिक कचरा निकलता है। 9025 टन प्लास्टिक रीसाइकिल की जाती है, जबकि 6137 टन प्लास्टिक हर साल फेंकी जाती है।

क्या है समस्या

शहरों में जरा सी बारिश होने पर ही नाली व नाले उफान मारने लगते हैं। बड़े-बड़े गड्ढे मौत का कुआं बन जाते हैं। जलभराव के कारण कई पानी से होने वाली बीमारियां जन्म लेती हैं। बांग्लादेश में भी2002 में जलभराव के कारण पॉलीथिन के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई थी। लोग कहीं पर भी पॉलीथीन फेंक देते हैं, जिससे ड्रेनेज सिस्टम ब्लॉक हो जाता है और जलभराव होने लगता है। जलभराव से डेंगू-चिकनगुनिया फैलाने वाले मच्छर पैदा हो सकते हैं। इसके अलावा सीवर व्यवस्था के बिगड़ने, पानी के जहरीला होने और जमीन के बंजर होने के पीछे भी पॉलीथिन जिम्मेदार हैं।

देश में 3-4 लाख टन पॉलीथिन की खपत

भारत में लगभग दस से पंद्रह हजार इकाइयाँ पॉलीथिन का निर्माण कर रही हैं। सन 1990 के आंकड़ों के अनुसार हमारे देश में इसकी खपत 20 हजार टन थी जो अब बढ़कर तीन से चार लाख टन तक पहुँचने की संभावना है जोकि भविष्य के लिये खतरे का सूचक है।

क्या हो उपाय

पॉलीथिन पर प्रतिबंध लगने में जब तक समाज ही नहीं मदद करेगा तो इस तरह के नियमों का कोई औचित्य नहीं रह जाता। हमें खुद चाहिए हम अपने परिवार में अपने से छोटे बच्चों व बड़ों को इससे होने वाली समस्याओं को बताएं। सरकार की तरफ से पॉलीथिन पर प्रतिबंध लगाना सराहनीय कदम माना जा सकता है, लेकिन जरूरी अब यह है कि हमें हर प्रदूषणजनित विपदाओं और पर्यावरणीय आपदाओं से लड़ने के लिए औऱ भविष्य को इस मार से बचाने के लिए संरक्षण पर भी ध्यान देना होगा। हमें पॉलीथिन का प्रयोग करने के और विकल्पों की ओर ध्य़ान देना होगा। दुकानों से पॉलीथिन न लाने के अतिरिक्त इस बात पर भी गौर करना होगा कि हम उन विकल्पों का प्रयोग न करें जिसमें पौधों को बलि दी जाती हो। हमें पेपरलेस होना होगा। ज्यादा से ज्यादा कपड़ों के थैलियों का प्रयोग करना होगा।

चाहे जल यानी नदियों, जलाशयों के संरक्षण की बात हो या वायु संरक्षण यानी पेड़ो का संरक्षण करने की बात हो, संरक्षण जरूरी है। इस पर गंभीर होकर योजनाओं पर काम करने चाहिए। संरक्षण के बाद दूसरी जरूरी चीज है रोपण यानी कि वृक्षारोपण जिसमें अधिक से अधिक प्राकृतिक वातावरण को बनाने का मुद्दा हो। जलाशयों का निर्माण और उन पर शोध करने की दिशा में काम करना चाहिए। तीसरी सबसे अहम बात यह है कि प्रदूषक के साधनों यानी वाहनों, एसी आदि पर नियंत्रण रखने की कोई नीति बने। अगर इन्हीं तीन चीजों पर नियंत्रण, संरक्षण और रोपण पर ध्यान दिया जाएगा तो बहुत हद तक हम पर्यावरणीय समस्याओं से निपट लेंगे।

Disclaimer: इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं। किसी भी विवाद के लिए फोरम4 उत्तरदायी नहीं होगा।

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