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डीयू में दाखिले के नाम पर एससी, एसटी छात्रों से वसूला जा रहा पैसा! कुलसचिव को विद्वत परिषद सदस्य ने लिखा पत्र

प्रो हंसराज सुमन

दिल्ली विश्वविद्यालय की विद्वत परिषद ने 12 जून 1981 को दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों और कॉलेजों में प्रवेश लेने वाले अनुसूचित जाति/जनजाति के उन छात्रों की ट्यूशन फीस, दाखिला फ़ीस एवं अन्य फ़ीस में छूट देने का निर्णय लिया था जिनके अभिभावक आयकर दाता की श्रेणी में नहीं आते हैं। बावजूद इसके इस नियम का पालन कोई भी कॉलेज/विभाग नहीं कर रहे हैं। सभी ऐसे छात्रों से कॉलेज ट्यूशन फीस, दाखिला फ़ीस आदि चार्ज कर रहे हैं। कॉलेजों में बनी स्पेशल सेल, ग्रीवेंस कमेटी केवल खानापूर्ति के लिए बनी है उनके हितों में कोई काम नहीं कर रही हैं।

इस संबंध में डीयू के कुलसचिव प्रो तरुण दास को विद्वत परिषद के सदस्य प्रो हंसराज सुमन ने एक पत्र लिखकर यह मांग की है कि जिस प्रकार से 9 सितम्बर 2015 को कॉलेजों/विभागों/संकाय डीन को पत्र भेजा गया था। ठीक उसी प्रकार से शैक्षिक सत्र 2018-19 में प्रवेश लेने वाले उन छात्रों को इस सुविधा का  लाभ मिल सके। साथ ही अपनी ओर से पुनः कॉलेजों को यह निर्देश दिया जाए कि उन छात्रों से दाखिला फ़ीस व अन्य चार्ज न लें जिनके अभिभावक आयकर से छूट प्राप्त है। साथ ही अनुरोध किया है कि वर्ष 2007 के बाद से ओबीसी कोटे के छात्रों को भी केंद्र सरकार की ओर से छूट दिए जाने का प्रावधान है। यदि इसी तरह का पत्र ओबीसी छात्रों के लिए भी चला जाए तो उन्हें प्रवेश के समय आर्थिक रूप से मदद मिल सकती है।

डीयू की विद्वत परिषद के फैसले को लागू नहीं कर रहे हैं कॉलेज व विभाग

दिल्ली विश्वविद्यालय की वर्ष 1981 की विद्वत परिषद का यह निर्णय कुछ वर्षों तक कॉलेजों व विभागों ने अपने यहां लागू किया, जिससे एससी/एसटी के छात्रों को इस सुविधा का लाभ भी मिला, लेकिन बाद में यह योजना बंद सी हो गई। कॉलेजों ने इस योजना को कब बंद किया, क्यों किया या इस योजना के अंतर्गत इसका लाभ छात्रों द्वारा नहीं उठाया जा रहा है, इस संबंध में कोई सूचना कॉलेजों/विभागों ने विश्वविद्यालय को नहीं दी। इससे यह योजना आज कॉलेजों में ठप पड़ी है, इसे कोई देखने वाला नहीं, हर तरह के सेल बने हुए हैं, लेकिन कागज़ों में ही काम कर रहे हैं।

डीयू का स्पेशल सेल जो कि एससी/एसटी के छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों के हितों व उनके अधिकारों के लिए समय-समय पर केंद्र सरकार द्वारा दी जाने वाली सुविधाएं उपलब्ध कराता है। स्पेशल सेल को जब यह पता चला कि एससी/एसटी के छात्रों को दी जाने वाली योजनाएं ठीक से लागू नहीं हो रही है तो स्पेशल सेल ने सन 2000में भी कॉलेजों व विभागों को पत्र भेजकर जानकारी दी थी, जिसमें यह जानकारी मांगी गई थी कि संबद्ध कॉलेजों और विभागों में क्या अनुसूचित जाति/जनजाति के छात्रों को ट्यूशन फीस, दाखिला फ़ीस में विद्वत परिषद के निर्णय के अनुसार छूट दी जा रही है या नहीं? स्पेशल सेल ने यह जानकारी उपलब्ध कराने के लिए उन्हें दस दिन का समय दिया गया था।

इससे पहले भी भेजा जा चुका है सर्कुलर

प्रो सुमन ने बताया है कि इसी तरह का एक सर्कुलर दिल्ली विश्वविद्यालय की स्पेशल सेल ने 9 सितम्बर, 2015 को भी सभी विभागों के अध्यक्षों, कॉलेजों के प्राचार्यों व संकायों के डीन को भेजा गया था। डीयू ने तुरंत संज्ञान लेते हुए 9 सितम्बर 2015 को कॉलेजों के प्राचार्यों, विभागों के अध्यक्षों व संकाय के डीन को पत्र लिखकर यह कहा कि अनुसूचित जाति/जनजाति के छात्रों की फीस में छूट दिए जाने का प्रावधान है, लेकिन पिछले चार साल से इस पत्र को कोई भी कॉलेज/विभाग/संकाय गंभीरता से नहीं लेता है और हर शैक्षिक सत्र में उनसे प्रवेश के समय फ़ीस व अन्य चार्ज लिए जाते हैं।

यह है मांग

प्रो सुमन ने कुलसचिव से यह भी मांग दोहराते हुए कहा है कि 2015 के पत्र के आधार पर कॉलेजों से यह आंकड़े मंगवाएं जाएं कि एससी/एसटी के कितने छात्रों को कॉलेजों ने अपने यहां ट्यूशन फीस, दाखिला फ़ीस एवं अन्य चार्ज से उन्हें छूट दी गई है। साथ ही जिन कॉलेजों ने डीयू के इस सर्कुलर को लागू नहीं किया है उन कॉलेजों के विरुद्ध कार्रवाई की जाए और पुनः 2015 के पत्र की तरह इस शैक्षिक सत्र में भी कॉलेजों/विभागों/डीन को पत्र भेजा जाए ताकि प्रवेश के समय अनुसूचित जाति/जनजाति और ओबीसी छात्रों को आर्थिक रूप से मदद मिल सके। उनका कहना है कि देखने में आया है कि सैंकड़ो ऐसे छात्र प्रवेश लेना तो चाहते हैं, लेकिन जिनके माता-पिता की आमदनी कम होने के कारण बच्चों को पढ़ा नहीं पाते।

Disclaimer: इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं। किसी भी विवाद के लिए फोरम4 उत्तरदायी नहीं होगा।

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