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आपातकाल, अघोषित आपातकाल और दृष्टिकोण का सवाल

तस्वीर गूगल साभार

-रवींद्र गोयल 

पिछले कुछ दिनों से एक दिलचस्प नज़ारा देखने को मिल रहा है। दरअसल, चोर मचाये शोर की तर्ज़ पर वर्तमान में अघोषित आपातकाल के सूत्रधार आपातकाल और उसके दमन पर इतना शोर मचा रहे हैं कि आपातकाल विरोध की गंभीर, विचारशील और जिम्मेदार आवाजें बहुत सुनाई नहीं दे रही हैं। यूं तो यह औपचारिकता हर साल ही होती है, मगर इस साल बात कुछ और है। आपातकाल विरोध अभियान में नरेंद्र मोदी, अरुण जेटली से लेकर सत्तासीन दल के सभी नुमाइंदे लगे हुए हैं।

ऐसे में वर्तमान हालात से त्रस्त कई ईमानदार साथी तो येन केन प्रकारेण आपातकाल और इंदिरा गांधी की खूबियां गिनाने लगे हैं या बहुत ही भोलेपन से आपातकाल की ज्यादतियों का ठीकरा संजय गांधी के सिर पर फोड़ इंदिरा गांधी या आपातकाल की तरफदारी कर रहे हैं। कुछ तो यह कह रहे हैं कि जिस ‘तानाशाह’ इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू किया था, उन्हीं ने चुनाव भी कराए थे, जिनमें वह और उनकी पार्टी बुरी तरह पराजित हुई थी। मगर, जिस जनता ने इंदिरा को आपातकाल के लिए सत्ता से उखाड़ फेंका, उसी जनता ने तीन साल बाद हुए मध्यावधि चुनाव में इंदिरा की कांग्रेस को दो तिहाई बहुमत के साथ सत्ता की कुर्सी पर बिठा दिया था। जाहिर है कि देश की जनता ने इंदिरा गांधी को लोकतंत्र से खिलवाड़ करने के उनके गंभीर अपराध के लिए माफ कर दिया था। अपनी लाख सदिच्छाओं के बावजूद उपरोक्त सोच सही नहीं है। आपातकाल के बारे में निम्न तीन बातों पर गौर करना जरूरी है।

पहली, आपातकाल इंदिरा गांधी द्वारा खुली तानाशाही का ऐलान था, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उससे पहले जनवादी अधिकार सबको मिले हुए थे। पहले भी हजारों कम्युनिस्ट कार्यकर्ता जेलों में बंद थे। बंगाल में सिद्धार्थ शंकर रे पुलिसिया सरकार चला रहे थे, लेकिन आपातकाल उस समय बढ़ती तानाशाही की मुहिम का महत्वपूर्ण पड़ाव था।

दूसरी, आज जब भाजपाई आपातकाल के सवाल पर भाषण देते हैं तो उनकी मंशा यह नहीं है कि भविष्य में आपातकाल के हालात दोहराये न जाएं। उनकी मंशा इस चर्चा से कई उद्देश्य साधने की है। मसलन, उनकी चीख-चिल्लाहट को सरकारी नाकामियों को छुपाने की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है। यह भी कहा जा सकता है कि कांग्रेस को कोसने के लिए गाहे-बगाहे आपातकाल का जिक्र कर भाजपाई आपातकाल और उसके दोहराव को रोकने के लिए उठ रही चर्चा को दबा देना चाहते हैं।

अंतिम बात यह कि वर्ष 1977 में जनता पार्टी द्वारा इंदिरा तानाशाही को करारा झटका लगा था। ईमानदार, मजदूर हितैषी और बौद्धिक लोगों ने जनता पार्टी का हाथ थामा था, लेकिन वो तज़रबा आगे नहीं बढ़ सका। जनता पार्टी बिखर गई और उसका महत्वपूर्ण घटक जनसंघ (वर्तमान में बीजेपी) आज फिर बौद्धिक ताकतों और आलोचकों को चुप कराने के प्रयास में चार वर्षों से लगा हुआ है।

ऐसे में जरूरी है कि जब तक समय इज़ाज़त देता है, हमें इस या उस चुनावी पार्टी का पल्ला पकड़ने के फेर में रहने के बजाय मेहनती तबकों की लड़ाई लड़ने वाले तमाम तबके जैसे विभिन्न कम्युनिस्ट संगठन, विभिन्न समाजवादी संगठन, स्वराज अभियान और अन्य ईमानदार गैर संगठन बद्ध व्यक्तियों के बीच एका कायम करने का प्रयास करना चाहिए। साथ ही आमजनों की मांगों पर आन्दोलन का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि तय है कि यदि अन्य चुनावबाज पार्टियों ने बीजेपी को पटखनी भी दी तो शीघ्र ही वो भी तानाशाही के पथ पर चल देंगी। यदि देश में जनतंत्र को मजबूत और सुरक्षित रखना है, तो तज़रबा गवाह है कि यह मजदूर किसानों के हक में जुटे संगठनों के दम पर ही हो सकता है। यदि इस बीच प्रगतिशील ताकतों की कमजोरी के चलते चुनावबाज पार्टियों से कुछ उम्मीद लगाओगे तो नतीजा जनता पार्टी के शासन से कुछ भिन्न नहीं होगा। यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि ‘Those who forget history are condemned to relive it.’ यानी, इतिहास को भूल जाने वाले इसे दोहराने के लिए दोषी ठहराये जाते हैं।

किसी शायर ने ठीक ही कहा हैः

नयी तरकीब लाजिम है नयी तामीर की खातिर, 

हुआ क्या तू अगर कुछ गिरती दीवारों को थाम आया।

 

(लेखक डीयू के सत्यवती कॉलेज के पूर्व शिक्षक हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं, इससे फोरम4 का सहमत होना कतई जरूरी नहीं है)

 

Disclaimer: इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं। किसी भी विवाद के लिए फोरम4 उत्तरदायी नहीं होगा।

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