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मालदीव में इब्राहिम सोलह की जीत को भारत ने बताया लोकतंत्र की जीत, जानिए कैसे राह बनी आसान

तस्वीरः गूगल साभार

-साहित्य मौर्या

मालदीव 1200 द्वीपों, 90 हजार वर्ग किलोमीटर में फैला करीब 4 लाख की जनसंख्या वाला देश है जो भारत के लिए रणनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण है। हिंद महासागर में अवस्थित इस देश में हाल ही में अर्थात् 23 सितंबर को चुनाव सम्पन हुए।

भारत और चीन दोनों इस दक्षिण एशियाई देश में होने वाले चुनाव पर काफी करीब से नजर जमाए हुए थे। साथ ही, इस चुनाव पर विश्व के महत्वपूर्ण देशों की भी नजर थी। 2008 में जब इस देश में लोकतंत्र बहाल हुआ उसके बाद का यह सबसे महत्वपूर्ण चुनाव था।

इस चुनाव में चीन समर्थित या यूं कहें चीनी हितैषी राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन की पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है और विपक्ष के साझे उम्मीदवार इब्राहिम मोहम्मद सोलिह को जीत मिली है जो भारत समर्थित माने जाते हैं। उनको सहयोग करने वाले निर्वासित जीवन जी रहे पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद भी भारत के काफी सहयोगी रहे हैं। सोलिह को कुल 58 फीसद मत प्राप्त हुए हैं। भारत ने साझे उम्मीदवार इब्राहिम की जीत का स्वागत किया और कहा कि यह लोकतंत्र की जीत है।

करीब 4 लाख की आबादी वाले इस देश से लक्षद्वीप की दूरी  महज 1200 किलोमीटर है। इसलिए पिछले कुछ वर्षों से मालदीव में बढ़ती हुई चीन की गतिविधि भारत के लिए खतरा का विषय बना हुआ था। जब यामीन में बदलाव नहीं आया तो भारत ने यामीन की छवि को कमजोर करने की रणनीति के तहत सुरक्षा परिषद की अस्थायी सीट चुनाव में मालदीव को हरवा दिया था।

इन सबके बीच इस छोटे से देश में सत्ता परिवर्तन तो हो चुका है फिर भी मेरे विचार से भारत को आगे का कदम काफी फूँक-फूँक के रखना चाहिए। चूँकि हम पूर्व में यह देख चुके हैं कि जब श्रीलंका में महिंद्रा राजपक्षे की सरकार थी जो चीन के हितों को ध्यान में रखकर अपनी नीतियाँ बनाती थी उसके कार्यकाल पूरा होने के बाद जब 2015 में श्रीलंका में संसदीय चुनाव हुए तो वहाँ सत्ता परिवर्तन हुआ और मैत्रीपाला श्रीसेना नए राष्ट्पति निर्वाचित हुए। भारत ने मालदीव की तरह उस चुनाव में भी अपनी रणनीतिक सूझ-बूझ का परिचय दिया था और कहा जा रहा था कि श्रीलंका में जारी चीनी प्रोजेक्ट अब हासिए पर चले जाएँगे एवं भारतीय कामों को श्रीलंका में ज्यादा तरजीह दी जाएगी लेकिन, हुआ इसके विपरीत। मैत्रीपाला ने चीन के प्रोजेक्टों में आंशिक बदलाव कर सारे प्रोजेक्टस को मंजूरी दे दी और चीनी कर्ज के बोझ के तले दबे श्रीलंका को अपना बंदरगाह हंबनटोटा 99 वर्षों के लिए चीन को लीज पर देना पड़ा।

हिंदुस्तान को मालदीव के परिणाम से उत्साहित तो होना चाहिए परन्तु अति उत्साह से बचना चाहिए और इस देश में आचार्य चाणक्य की कूटनीति और दूरदर्शिता का परिचय देना चाहिए। उम्मीद है कि भारत श्रीलंका में हुई अपनी पुरानी गलतियों से सबक लेकर नई रणनीति के साथ मालदीव के मैदान में उतरेगा।

Disclaimer: इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं। किसी भी विवाद के लिए फोरम4 उत्तरदायी नहीं होगा।

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