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म्यांमार के इस संगठन पर है 99 हिंदुओं को मारने का आरोप

Credit: google

शीतल चौहान

मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल की म्यांमार के रखाइन प्रांत में हुई हिंसा के संबंध में जारी हुई जांच रिपोर्ट में दावा किया गया है कि रोहिंग्या मुसलमानों के हथियारबंद चरमपंथी संगठन अराकान रोहिंग्या सेल्वेशन आर्मी (एआरएसए) ने कथित रूप से 99 हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया। एमनेस्टी इंटरनेशनल की अधिकारी तिराना हसन ने इस जांच में कहा कि एआरएसए ने जिस बड़े पैमाने मानवीय अपराध किए और क्रूरता बरती उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसे लोगों को बताना बेहद जरूरी है। हालांकि एआरएसए ने इस बात से इंकार किया है। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि अगस्त, 2017 में हिंदू गांवों पर एआरएसए द्वारा किए गए हमलों में महिलाओं और बच्चों को भी नहीं बख्शा गया। म्यांमार और बांग्लादेश में दर्जनों इंटरव्यू, कई तस्वीरों, गवाहों और फ़ॉरेंसिक रिपोर्ट्स का विश्लेषण करने के बाद एमनेस्टी इंटरनेशनल ने यह रिपोर्ट तैयार की है। इसमें बताया गया है कि किस तरह एआरएसए ने हिंदुओं को भयभीत करने की कोशिश की।

क्या है एआरएसए संगठन?

अराकान रोहिंग्या सेल्वेशन आर्मी (एआरएसए) म्यांमार के उत्तरी सूबे रख़ाइन में सक्रिय सशस्त्र संगठन है। यहां के लोगों के मुताबिक, यह संगठन म्यांमार के अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुस्लिमों की रक्षा के लिए सशस्त्र संघर्ष कर रहा है और इसके ज़्यादातर सदस्य बांग्लादेश से आए अवैध शरणार्थी हैं। इसका सरगना अताउल्लाह अबू अम्मार जुनूनी है। पहले एआरएसए को हराकाह अल-यक़ीन के नाम से भी जाना जाता था। एआरएसए के प्रवक्ता के मुताबिक, यह संगठन वर्ष 2013 में शुरू हुआ। इसमें भर्ती लड़ाकों को पहले प्रशिक्षण दिया गया। इसके बाद पहला हमला अक्टूबर, 2016 में किया गया, जिसमें 9 पुलिसकर्मी मारे गए थे। म्यांमार सरकार का आरोप है कि एआरएसए अब तक 20 से ज़्यादा पुलिसकर्मियों की हत्या कर चुका है।

रोहिंग्या मुस्लिमों की रक्षा करना है एकमात्र उद्देश्य’

एआरएसए दावा करता है कि उसका एकमात्र उद्देश्य म्यांमार में रह रहे रोहिंग्या मुस्लिमों की रक्षा करना है। सरकार और सेना रोहिंग्याओं पर अत्याचार करती है, जबकि संगठन ने  कभी भी आम नागरिकों पर हमला नहीं किया। हालांकि, म्यांमार की सरकार उनके इस दावे से इत्तेफाक नहीं रखती है। मार्च, 2017 में अज्ञात स्थान से समाचार एजेंसी रॉयटर्स को दिए इंटरव्यू में अताउल्लाह ने कहा था कि उनकी लड़ाई म्यांमार के बौद्ध बहुमत के दमन के खिलाफ है और यह लड़ाई तब तक जारी रहेगी, जब तक म्यांमार की नेता आंग सान सू ची उन्हें बचाने के लिए कोई कदम नहीं उठाती हैं। भले इस लड़ाई में लाखों लोगों की जान क्यों न चली जाए।

एआरएसए कहां से जुटाता है हथियार?

25 अगस्त, 2017 को पुलिसकर्मियों पर हुए हमले के बाद सरकार ने कहा था कि एआरएसए के हमलावरों के पास चाकू और घर में बनाए बम थे। संगठन के विद्रोहियों के पास अधिकांश वो हथियार हैं जिन्हें घर में तैयार किया गया है। हालांकि इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप (आईसीजी) की रिपोर्ट बताती है कि एआरएसए में शामिल लोग पूरी तरह से अनुभवहीन नहीं हैं। एआरएसए अफ़ग़ानिस्तान के संगठनों से भी मदद ले रहा है। म्यांमार सरकार ने कहा था कि रोहिंग्या लोगों ने खाद और स्टील पाइपों से इम्प्रोवाइज्ज एक्सप्लोसिव डिवाएस (आईईडी) तैयार किए हैं।

पाकिस्तान, सऊदी अरब और बांग्लादेश कनेक्शन

म्यांमार सरकार की नज़र में एआरएसए चरमपंथी संगठन है, जिसके लड़ाके विदेश से प्रशिक्षण लेते हैं। वहीं, इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप (आईसीजी) के मुताबिक़, अताउल्लाह एक रोहिंग्या शरणार्थी का बेटा है, जिसकी पैदाइश पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की है। इसके बाद अताउल्लाह जब नौ साल के हुआ, तब उसका परिवार सऊदी अरब चला गया था और अताउल्लाह सऊदी अरब में ही पला-बढ़ा। हालांकि, आईसीजी ने अपने विश्लेषण में भी कहा था कि बाहरी चरमपंथी समूहों से मिल रही मदद के बावजूद एआरएसए के खिलाफ ऐसे कोई सबूत नहीं मिले हैं, जिनसे पता चलता हो कि एआरएसए के लड़ाके अंतरराष्ट्रीय जिहादी एजेंडे का समर्थन करते हैं। उल्लेखनीय है कि इस्लामिक स्टेट के समर्थकों ने भी एआरएसए के समर्थन में ऑनलाइन बयान जारी कर म्यांमार में हिंसा का आह्वान किया था। नई दिल्ली में म्यांमार के पत्रकारों की स्थापित की गई निजी कंपनी ‘द मिज़्ज़िमा मीडिया ग्रुप’ ने 19 अक्टूबर, 2016 को अपनी रिपोर्ट में बताया था कि अताउल्लाह को एक अन्य चरमपंथी संगठन हरक़त उल-जिहाद इस्लामी अराकान (हूजी-ए) ने जोड़ा था। हरक़त उल-जिहाद इस्लामी अराकान (हूजी-ए) के पाकिस्तानी चरमपंथी समूह लश्कर-ए-तैयबा और पाकिस्तानी तालिबान के साथ संबंध हैं। इस रिपोर्ट में बांग्लादेश के चरमपंथ रोधी अधिकारियों के हवाले से कहा गया था कि रोहिंग्या और बांग्लादेशी चरमपंथी समूहों के बीच तालमेल को भी ख़ारिज नहीं किया जा सकता है। हालांकि, विदेशी इस्लामी चरमपंथियों से संबंध रखने के म्यांमार सरकार के आरोपों को अताउल्लाह बेबुनियाद बताते हैं।

म्यांमार सेना की कार्रवाई

माना जाता है कि अगस्त, 2017 में पुलिस चौकियों पर एआरएसए के सशस्त्र हमलावरों ने कथित तौर पर हमला किया, जिसके बाद रख़ाइन में रोहिंग्या मुसलमानों पर संकट गहरा गया। इसके बाद म्यांमार के सुरक्षा बलों ने कार्रवाई शुरू की और लाखों रोहिंग्या मुस्लिम बांग्लादेश में शरण लेने को मजबूर हुए। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि म्यांमार के सुरक्षा बलों ने रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर कार्रवाई की, जिसमें गांव के गांव जलाकर राख कर दिए गए। इसे नरसंहार कहा गया और सुरक्षा बलों की कार्रवाई को मानवता के विरुद्ध अपराध कहा गया।

 

 

 

 

Disclaimer: इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं। किसी भी विवाद के लिए फोरम4 उत्तरदायी नहीं होगा।

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