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हिंदी लेखन को नारीवाद ने कितना प्रभावित किया है, बिहार की कवयित्री डॉ. मीरा से जानिए!

बिहार के आरा की निवासी मीरा श्रीवास्तव की पहचान हिंदी लेखन में मूलत कवयित्री के रूप में है, लेकिन इन्होंने आलोचनात्मक लेखन भी किया है।  प्रस्तुत है इनसे राजीव कुमार झा की बातचीत, लेकिन उससे पहले मीरा की इन कविताओं को भी पढ़ें –

  1. बड़ा भला लगता है खुद से बतियाना,

भीड़ और अकेलेपन में से

डॉ मीरा श्रीवास्तव

 

किसी एक को चुनने जैसा ,

कभी तो भीड़ में भी निपट अकेले

कभी अकेलापन भी भीड़ के

शोर- शराबे में तब्दील हुआ सा ,

इंसान जिंदगी को ही बहरहाल

चुनता है, दर्द के हिलोरें जो

कम होंगे वहां!

जिंदगी और दर्द के बीच की लकीर

इतनी महीन, इतनी मामूली कि

मन और नजर की पकड़ में

समा ही नहीं पाती ,

न जाने कब बढ़ जाते हैं कदम

उस लकीर के इस पार या उस पार,

हाथ छोड़ देती है जिंदगी,

विस्फारित आंखों से दर्द की घाटी की

गहराई को नापते-थाहते जब हम

गिरते होते हैं गुरुत्वाकर्षण के वशीभूत

हाथ उपर उठाये किसी अदृश्य

अवलंब को थामने की जिद से भरे,

तबतक, जबतक कि जिंदगी और दर्द

एक दूसरे की बांहों को कसकर थाम नहीं लेते!

 

  1. औरतें रसोई में बिता देती हैं

जिंदगी, रोटियां बेलते, सेंकते

घर का कोई पुरुष झांकता तक नहीं

वर्जित क्षेत्र है रसोई पुरुषों के लिए

कुछ वर्जनाएं बड़ी ईमानदारी से

निबाहते हैं ये पुरुष,

सब्जियां छीलते – काटते औरतें

काट लेती हैं उंगली हंसुए

की तेज धार से ,

पुरुष लापरवाही जताते

उंगली से टपकते खून को

अनदेखा कर देते हैं ,

औरतों के अंग से बहता खून

बहुत मायने नहीं रखता

पुरुषों के लिए ,

औरतें पानी की तेज धार के

नीचे खून को धो ,

कटी उंगली को मुंह में भींच

उंगली के झक्क् सफेद होने तक

चूसती जाती हैं जबतक उन्हें

यकीन न आ जाए कि कतरा भर

खून भी जाया नहीं हुआ ,

औरतें सावन में, घुटनों तक

खेत के कीचड़ -पानी में धंस

रोपती हैं धान के बिजड़े

कमर दोहराये क्यारियों में

रोपनी करती औरतें जैसे

कसीदे काढ़ती होती हैं पानी पर ,

एक भी धागा न ढीला, न कसा

दर्द से पिराती अपनी कमर

सीधा नहीं करतीं ये औरतें

जबतक टोकरी के बिजड़े

खत्म नहीं हो जाते

उस वक्त भी खेत के आसपास

नहीं होता एक भी पुरुष ,

बदरंग साड़ी को घुटनों तक

उठाये, फटे पल्लू को छाती पर

कसकर लपेटे, अन्नपूर्णा का रुप धरे

ये औरतें इंद्रदेव का आह्वान जब

कर रही होती हैं, तब भी वहां

पुरुष नहीं होते,

… औरतें चूल्हा – चौका समेटती

बुझती लकड़ी का धुआं अपनी

छाती बस में भरे, खटिया पर निढाल

गिरने को होती हैं, वही पुरुष

जो दिन भर न उनके आसपास

न उनके साथ कहीं नहीं होते,

खटिया पर करवटें बदलते

उनकी राह तकते होते हैं …

1. आपने कविता लेखन कब और कैसे शुरू किया?

हिंदी साहित्य की छात्रा होने के कारण पठन एवं लेखन में स्वाभाविकत: रुचि रही! स्त्री होने के नाते संवेदनशीलता के आधिक्य ने कविता लिखने को प्रेरित किया या यूं कह लूं कि स्वानुभूतियों की सघनता ने कविताएं लिखवा ली! लेखन और पठन, अध्ययन साथ-साथ चलते रहे नतीजतन लेखन को सुनिश्चित दिशा नहीं मिल पाई जो भी लिखा। यहां-वहां , किताबों , नोट्स , डायरियों में बिखरा रहा। उन सामग्रियों को एकत्रित करना और संकलित करना बेहद श्रमसाध्य था, किन्तु पति प्रो. सुरेश श्रीवास्तव जी ने यह बीड़ा उठाया और 2016 में ‘ ऊनी शॉल ‘ नामक काव्य संग्रह का प्रकाशन अभिधा प्रकाशन से हुआ।

2. आज मानव जीवन में असंख्य चुनौतियों के साथ जीने को विवश है! कविता मनुष्य की संवेदन लय है अतः चुनौतियों का सामना करने में वह मनुष्य के समानांतर ही खड़ी है!

कविता मात्र रस्मी शब्दों से आकार नहीं लेती, जीवन की अति साधारण स्थितियों से भी आकार ग्रहण करती है। मनुष्य की संवेदनशीलता को लयबद्ध करने का काम कविता ही कर पाती है। जटिल जीवन की समस्याओं से दिन – रात जूझते रहने की मशक्कत में जब मनुष्यता ही मनुष्य का साथ छोड़ देती है, तब कविता का रचनात्मक हस्तक्षेप ही इस रूपांतरण को रोक पाता है। मनुष्य के सोये विवेक को जगाने का दुरूह कार्य कविता के अतिरिक्त अन्य कोई विधा नहीं कर सकती है।

यह भी एक विकट प्रश्न है कि क्या कविता के बगैर भी जीवन अपनी लीक पर बिना रोक-टोक के चलता रह सकता है? नहीं , अन्यथा जीवन में जब भ्रांति के कोहरे में मनुष्य दिशाहीन हो उठता है तो क्यों रहीम, कबीर, तुलसी की पंक्तियां दोहराने लगता है? यह इस बात का प्रमाण है कि कविता न तो जीवन से और न ही संवाद से पूर्णतया निकाल बाहर की जा सकती है! यद्यपि मनुष्य उपभोक्तावाद के युग में जीता पूर्णतः व्यापारी बन चुका है जहां मानवीय मूल्यों , संवेदनाओं , संबंधों को वह लाभ-हानि की कसौटी पर ही कसता है फिर भी कविता जीवन से लुप्त नहीं हो सकती क्योंकि कविता हृदय के विस्तार, मनुष्य के विवेक एवं उसकी मनुष्यता पर टिकी हुई है।

3.क्या आपको ऐसा लगता है कि अज्ञेय के बाद हिंदी कविता लेखन को नागार्जुन ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है? इसके बारे में बताएं

तार सप्तक के संपादन के साथ अज्ञेय अपनी साहित्यिक गतिविधियों के कारण जहां बहु चर्चित रहे, वहीं आलोचना के निशाने पर भी खूब रहे। किन्तु यह निर्विवाद सत्य है कि कविता में अज्ञेय की चिंताएं और कविता को सामाजिक सरोकार से जोड़ने की असाधारण चेष्टा अज्ञेय में थी। मात्र कविता ही नहीं, अन्य साहित्यिक विधाओं में भी उनकी पकड़ समान रुप से सशक्त थी! शब्द शक्तियों का जिस सरल स्वाभाविकता से वे प्रयोग करते थे  उनके समकालीनों में एवं परवर्तियों में भी इसका अभाव था। अज्ञेय किसी विधा विशेष के दायरे में यद्यपि बंध कर नहीं रहे तथापि मूलतः वह एक कवि ही थे।

नागार्जुन प्रगतिशील काव्यधारा के पुरोधा कवि थे एवं अज्ञेय की ही तरह सामाजिक सरोकार से गहरा जुड़ाव रखने वाले कवि थे। भारत की आज़ादी भारतीय इतिहास ही नहीं विश्व इतिहास की एक बहुत बड़ी घटना थी किन्तु आश्चर्य कि विश्व वेदना पर कराह उठने वाली हिंदी कविता आजादी के बाद के विभाजन की त्रासदी को अनसुना कर गई। अज्ञेय की विभाजन पर आद्धृत ‘ शरणार्थी ‘ सीरिज की ग्यारह कविताएं अपवाद हैं।

आजादी के बाद आजाद भारत की सत्ता लोलुप राजनेताओं को जो गांधी के नाम पर राजनीति का कुत्सित खेल भी खेलने से बाज़ नहीं आए, नागार्जुन ने उनपर गहरा तंज़ कसा – बापू के भी ताऊ निकले तीनों बंदर बापू के / सरल सूत्र उलझाऊ निकले तीनों बंदर बापू के ! ” नागार्जुन ने आजादी के मोहभंग का सर्वाधिक शिकार बने किसानों , मजदूरों के साथ – साथ गांव – गंवई की पगडंडी से उड़ने वाली धूल की भी कविताएं लिखीं। इन कविताओं ने अपनी नई विषय वस्तु, भाषा और विन्यास के कारण हिंदी कविता को नया तेवर प्रदान किया, यथा – नए गगन में नया सूर्य जो चमक रहा है / यह विशाल भूखंड आज जो दमक रहा है / मेरी भी आभा है इसमें या –

बहुत दिनों के बाद / अबकी मैंने जी भर देखी / पकी सुनहरी फसलों की मुस्कान / बहुत दिनों के बाद! ” गांव की धूल को चन्द्रवर्णी बताने वाले नागार्जुन ने नई कविता के समानांतर नया काव्य लोक बनाया। हिन्दी कविता में नागार्जुन का योगदान अतुलनीय है।

4. अपने बचपन घर – परिवार और पढाई- लिखाई के बारे में बताएं?

मध्यमवर्गीय संयुक्त परिवार में जन्म लिया और पिता सरकारी नौकरी ( इंजीनियर ) के पद पर थे। सात भाई – बहनों के बड़े परिवार में मैं दूसरे नंबर पर थी, इस नाते छोटे – छोटे भाई – बहनों की मां की भूमिका में भी रही और उनके यथोचित स्नेह सम्मान की भागी अब तक हूं। बहुत छोटी आयु से ही पिता की साहित्यिक रुचि के कारण मुझमें भी पढ़ने और खूब पढ़ने की रुचि परिष्कृत हुई। पत्रिकाएं , हिंद पॉकेट बुक्स की पेपर बैक उपन्यासों – प्रेमचंद, शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, रवीन्द्र नाथ टैगोर, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय से पिताजी ने परिचित कराया और परिचय को प्रगाढ़ता भी दी। मां ने सात – सात बच्चों को अनुशासन और संस्कार में बांधने में अत्यंत कुशलता से अपनी भूमिका निभाई। पिताजी के हर तीन चार साल पर तबादले की वजह से स्कूली शिक्षा कोशी अंचल के भिन्न-भिन्न स्थानों पर हुई, मैट्रिकुलेशन करने के लिए पिताजी ने पटना को स्थायी निवास बनाने का निर्णय लिया और गर्दनीबाग गर्ल्स स्कूल से मैट्रिक, फिर पटना वीमेंस कॉलेज से स्नातक (हिन्दी) तथा पटना विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर, 1978 में विवाह, पति ( प्रो सुरेश श्रीवास्तव – जीव विज्ञान, महाराजा कॉलेज) के साथ आरा आज 42 वर्षों से दोनों की कर्मभूमि बनी हुई है। मगध विश्वविद्यालय से ‘ साठोत्तरी महिला कथाकारों की रचनाओं में – संघर्ष , आक्रोश , विद्रोह एवं व्यंग्य की भावनाओं की अभिव्यक्ति ‘ विषय पर स्व. प्रो. लक्ष्मीकांत सिन्हा के निर्देशन में शोध प्रबंध का काम पूरा किया।

1999 में स्थानीय डीएवी स्कूल में शिक्षिका के रूप में काम करते हुए 2002 में प्राचार्या का पदभार संभालते हुए 2016 में सेवानिवृत्त हुई। पति मेरे एक साल बाद 2017 ( सेवाकाल पैंसठ वर्ष होने के कारण) सेवानिवृत्त हुए।

5. अपने प्रिय लेखकों – कवियों के बारे में बताएं

अज्ञेय , नागार्जुन , मुक्तिबोध, जानकी वल्लभ शास्त्री, निराला, प्रसाद, पंत, महादेवी आदि विभिन्न धाराओं के विशिष्ट कवियों की रचनाओं से परिचय और प्रगाढ़ता अध्ययन के क्रम में ही बनी, किन्तु अज्ञेय एवं निराला ने मुझे अपने विविध आयामी तेवर की कविताओं के कारण बहुत अधिक प्रभावित किया। अलग – अलग विधाओं एवं नए रचनाकारों में दुष्यंत कुमार, सूर्य भानु गुप्त, हिमांशु जोशी, आदि मुझे विशेष प्रिय हैं। महिला कथाकारों ने अपनी मूर्ति भंजक भूमिका में मुझे  सम्मोहित सा किया है – मन्नू भंडारी, शिवानी, उषा प्रियवंदा, मेहरुन्निसा परवेज, सुधा अरोड़ा, कृष्णा सोबती, ममता कालिया, चित्रा मुद्गल, मृणाल पांडे, दीप्ति खंडेलवाल, मधु कांकरिया, शर्मिला जालान, गीता श्री, अवधेश प्रीत आदि – अनेक नाम हैं, वर्तमान काल में अरुण कमल, मदन कश्यप, रश्मि भारद्वाज,  बाबुशा कोहली,  अनुराधा सिंह आदि अपनी व्यापक दृष्टि फलक से दुनिया और ज़िन्दगी को बड़ी गहराई से निहारते हुए कविताएं रच रही हैं।

6. साहित्य में आलोचना की उपस्थिति आपको कितनी सार्थक और निरर्थक प्रतीत होती है?

साहित्य में आलोचना की उपस्थिति सार्थक या निरर्थक है, इस पर बहस करने की बजाय हिंदी आलोचना के आधुनिक युग के आरंभिक चरण में जन्मे हिंदी आलोचना की शुरुआती दौर पर दृष्टि डालना उचित होगा क्योंकि आलोचना संशय एवं भ्रामक परिस्थितियों के बीच ही हिंदी आलोचना अस्तित्व में आई। एक तो एक परंपरा के साथ यह पूर्णतः जुड़ नहीं पाई, दूसरे पाश्चात्य विचार इसके ऊपर हावी रहे ऊपर से घेरेबंदी को इसने भरपूर प्रश्रय दिया। निश्चित तौर पर इसका खामियाजा इसे भुगतना पड़ा। अपने समाज एवं साहित्य की सांस्कृतिक सरोकारों से यह कट सी गई, अपना कोई आलोचनात्मक विवेक हिंदी आलोचना का हिस्सा नहीं बन पाया जिसके कारण इसमें आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान की भावना का अभाव रहा। हिंदी रचनाकार भी आलोचना के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्त रहे। रिल्के के विचारों से उनकी सहमति कमोबेश रही कि, ‘ समीक्षा कर्म किसी कला सृजन को छूने तक की क्षमता नहीं रखता, उसके बारे में भ्रांतियों का प्रसार जरुर करता है।’

हिंदी आलोचना का यह दुर्भाग्य रहा कि कुछ रूढ़ियां एवं रूपक इसके साथ अपरिहार्यता के साथ जुड़ गए, यह बाहर से लाए गये सिद्धांतों के कारण हुआ। पहले हिंदी आलोचना पर विचारात्मक रूपक हावी थे आज विमर्शात्मक रुपकों का आधिपत्य है। सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि हिंदी आलोचना की समझ और विवेक आजतक स्वंय को औपनिवेशिक संस्कारों से मुक्त नहीं कर पाई है। यह प्रभाव इतना गहरा है कि हमें अपनी विरासत और परंपराएं इनके सामने तुच्छ सी लगती हैं।

व्यापक संशय और संभ्रम के बीच भी हिन्दी आलोचना के पक्ष में एक सकारात्मक बिन्दु तो है कि आलोचना के प्रति पूर्वाग्रह ग्रस्त होने के बावजूद भी साहित्यकारों को इसकी अपेक्षा रहती है। स्वतंत्रता उपरांत हिंदी में आलोचना के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण कार्य इस तरह से हुए जिसमें परंपरा और पश्चिमी विचारों के साथ द्वन्द्व और अंतर्क्रिया से साहित्य के मूल्यांकन की कई नई कसौटियां निर्मित हुईं।

यद्यपि आलोचना का कार्य नियमन करना एवं प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देना है, साथ ही ऐसी कृति का निर्माण करना जिसे पाठक नि:संकोच ग्रहण कर सके, किंतु विचारण प्रश्न यह भी है कि क्या आलोचना अपने इन दायित्वों का निर्वहन समुचित रुप से कर रही है ? गत दो दशकों में हिंदी, आलोचना एवं साहित्यिक दबावों का शिकार बन रही है, परिणामत: रचनाएं रचनाकार का वास्तविक मूल्यांकन करने की बजाय राजनीतिक, सामाजिक, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक या नैतिक परिप्रेक्ष्य में अभिप्रायों को व्यक्त कर रही हैं।

निर्मला जैन जी की ये पंक्तियां इस संदर्भ में उद्धरणीय हैं, ‘ आलोचना हर बार इस आधार पर लिखी जानी चाहिए कि कृति आपसे क्या कहती है।’

7. आलोचना में साहित्य विषयक सम्यक चिंतन का अभाव क्यों होता दिखायी दे रहा है?

आजादी के बाद के दौर को आलोचना का स्वर्ण युग कहा जा सकता है और नामवर सिंह जैसे आलोचक साहित्य के लिए नए प्रतिमान रच रहे थे, किंतु वर्तमान आलोचना की प्रक्रिया में स्थापित मानदंडों का कोई उल्लेख नहीं होता , नब्बे का दशक तो अस्मितामूलक विमर्शों का ही दौर था। उन्होंने आलोचना के सर्वथा नए मानकों की खोज की जो किसी अस्मिता विशेष से जुड़े हुए थे। समग्र रुप से यह कहा जा सकता है कि इस पूरे परिदृश्य में आलोचना का कोई एक प्रतिमान या मानक नहीं बन पाया और समय के बीतने के साथ इनकी परस्पर सीमाएं धुंधलाती ही जा रही हैं। आलोचना आज प्रायोजित होती जा रही हैं जिसके कारण रचना की चिंता वहां गौण हो जाती है।

8. हिंदी लेखन को नारीवाद ने कितना प्रभावित किया है?

जहां तक हिंदी लेखन पर नारीवाद के प्रभाव का प्रश्न है, इसका संबंध सीधे तौर पर नारी लेखन से है। साठ के दशक के बाद हिंदी कहानी विधा में एकसाथ युवा और धारदार लेखन के हथियार से लैस स्त्री रचनाकारों की जमात ने ताजी हवा की बयार की तरह प्रवेश किया और कहानी, उपन्यास विधा की रुढ़िवादी धारणाओं को ध्वस्त कर अपने स्पष्ट टू द प्वांइट भाषा और तेवर के साथ जिस त्वरा और बेबाकी के साथ घर-परिवार, समाज के उन विषयों को जो कभी बहस का मुद्दा बन ही नहीं पाईं या पुरुषवादी मानसिकता ने उन्हें बहस में आने ही नहीं दिया, दाम्पत्य संबंधों की सीलन, सड़ांध को अभिव्यक्त करने की सहजता, सेक्स को वर्जना मुक्त करते हुए एक जरुरी मुद्दा बनाने का साहस दिखाया, निश्चित तौर पर उनका लेखन सकारात्मक नारीवादी दृष्टिकोण के प्रभाव को दर्शाता है।

रचनाकारों पर नारीवादी प्रभाव पर चर्चा करने से पूर्व नारीवाद से प्रभावित अध्ययन पर एक नजर डालना उचित होगा। नारीवादी अध्ययन के अंतर्गत परिवार यौनिकता , अंतर्संबंध आदि विषयों को एक सर्वथा नई दृष्टि एवं नए परिप्रेक्ष्य में देखा गया है जो अबतक उपेक्षित रहे। नारीवादी अध्ययन वस्तुत: समाज और सामाजिक सिद्धांतों का पुनर्निरीक्षण करता है तथा इनमें अनुस्यूत पुरुष रुझानों को उजागर कर पुरुष विषयक मिथक को ध्वस्त करता है।

नारी प्राचीन काल से ही साहित्य के केन्द्र में रही किन्तु क्षोभ का विषय यह है कि नारी या तो देवी रुप में महिमा मंडित की गई या फिर उसके अस्तित्व को ही खारिज़ किया जाता रहा। वितृष्णा जगाती है यह सोच कि पुरुष का आकलन तो उसकी संपूर्णता में किया जाता रहा है किन्तु नारी का आकलन उसकी देह मात्र के आधार पर-नाभि के एक बित्ता ऊपर और नाभि के एक बित्ता नीचे। नारी के इसी आधे-अधूरे अस्तित्व पर सिमोन द बोउवा ने कहा था – ” औरत पैदा नहीं होती, बनायी जाती है” – पुरुष मानसिकता की सुविधानुसार। सामाजिक स्तर पर भले ही स्त्रियां घोर उपेक्षा की पात्र हों, धर्म ने उन्हें मारने और जलाने के तमाम संरजाम जुटा लिए हों किन्तु साहित्य रचयिताओं ने, विशेषकर उपन्यासकार एवं कथाकारों ने स्त्री को मानवीय करुणा एवं सहानुभूति से देखा है। टालस्टॉय , दोस्तोवस्की, मोपांसा, शरतचन्द्र, रवीन्द्रनाथ टैगोर, प्रेमचंद आदि रचनाकारों ने पूर्वाग्रह मुक्त हो अपनी रचनाओं के केन्द्र में स्त्री को स्थापित किया। मिर्जा हादी ‘रुसवा’ की ‘उमराव जान अदा’ इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। अपराध जगत के बीच जीने वाली उमराव जान में पहली बार मानवीय गरिमा का आरोपण करते हुए मिर्जा हादी ने उमराव जान की अंतरात्मा में झांकने का सफल प्रयास किया।

भक्ति काल में मीरा एवं आधुनिक काल में महादेवी का व्यक्तित्व और कृतित्व नारी अस्तित्व , अस्मिता और गरिमा को ठोस धरातल देने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

नारीवादी लेखन आज कई अनदेखे और अनुत्तरित प्रश्नों को उठाता है – स्त्री की दुनिया आखिर है कहां – घर या बाहर ? सदियों से वस्तु और मादा बने रहने को अभिशप्त , मनुष्य नहीं मात्र स्त्री बनने की यातना से रोज गुजरती औरत के दिल में कई छिपे और अनछुए कोनों को छूने में नारीवादी लेखन कामयाब रहा है , स्त्री के नासूर बन चुके घावों को बेनकाब करने के साथ-साथ उन्हें भरने की कोशिश भी कर रहा है।

हिन्दी साहित्य में महादेवी वर्मा की “श्रृंखला की कड़ियां” नारीवादी लेखन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण दस्तावेज के समान है। आधुनिक काल में कई समर्थ लेखक-लेखिकाओं ने नारीवादी लेखन को अत्यंत सशक्त और सार्थक बनाया है। “कागज़ी है पैरहन” से भारतीय नारीवादी लेखन का प्रारंभ माना जा सकता है। साठ के दशक में नारीवादी लेखन में जो नाम कथा साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर बनकर उभरे उनमें – कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, ऊषा प्रियंवदा, ममता कालिया, चित्रा मुद्गल, मृदुला गर्ग, मृणाल पाण्डे , मेहरुन्निसा परवेज, प्रभा खेतान, शशिप्रभा शास्त्री, सूर्यबाला, मणिका मोहिनी, कुसुम अंसल, अलगा सरावगी, लवलीन, लता शर्मा, गीतांजलि श्री, मधु कांकरिया, शर्मिला जालान, मनीषा कुलश्रेष्ठ, चन्द्रकांता, नासिरा शर्मा, तहमीना दुर्रानी, ऊषा किरण खान, ऋता शुक्ल आदि उल्लेखनीय हैं जिन्होंने स्त्री की परंपरागत निस्पृह मूर्ति को तोड़ उसे जीवंत, अपनी अस्मिता की खोज में संघर्षरत प्राणी के रूप में अपनी रचनाओं में चित्रित किया।

हिन्दी नारीवादी लेखन में पुरुष लेखकों के योगदान को भी कमतर करके आंका नहीं जा सकता।  यशपाल के, “दिव्या”, भगवती चरण वर्मा की, “चित्रलेखा”, कृष्ण बलदेव वैद का, “नर-नारी”, सुरेन्द्र वर्मा का,”मुझे चांद चाहिए”, सत्येन कुमार का, “नदी को याद नहीं” में नारी स्वातंत्र्य के तेवर और स्त्री चेतना के विविध रंग परिलक्षित होते हैं। नारीवाद प्रभाव ने हिंदी साहित्य लेखन को विषय वस्तु के सीमित दायरे से निकाल, सामाजिक एवं राष्ट्रीय सरोकारों से जोड़ा। मन्नू भंडारी के “महाभोज”, महाश्वेता देवी के “जंगल के दावेदार”, कृष्णा सोबती का “जिंदगीनामा”, कुरेतुल एन हैदर का” आग का दरिया”, प्रभा खेतान का, “छिन्न मस्ता”, नासिरा शर्मा का “जिन्दा मुहावरे”, चित्रा मुद्गल का” आवां”, मैत्रैयी पुष्पा का “अल्मा कबूतरी” व्यापक सरोकारों को लेकर रचे गए हैं।

मृदुला गर्ग का “चित्तकोबरा”, कृष्णा सोबती की “मित्रो मरजानी” स्त्री की आरोपित नैतिकताओं से मुक्त होने की छटपटाहट और बगावत को साहसी यौन चित्रों के माध्यम से व्यक्त किया है। राजी सेठ के “तत-सम” और “निष्कवच” उपन्यासों में मुखर, तीव्र, आत्यंतिक नारीवादी स्वर एवं किसी भी तरह की नारेबाजी से मर्यादित दूरी बनाते हुए एक विशेष संकुलता और अन्त:प्रवाह को प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है जो लीक से हटकर एक अलग संवेदना की प्रतीति देते हैं।

9. बिहार में समुचित साहित्यिक परिवेश क्यों नहीं कायम हो पा रहा है?

बिहार में समुचित साहित्यिक परिवेश के कायम नहीं हो पाने के बहुत से कारण हैं जो मुख्य रूप से स्थानीय ही हैं। बिहार स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। गौरवपूर्ण अतीत, समृद्ध ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से संपन्न होने के बावजूद अशिक्षा, वर्चस्ववादी मानसिकता, सामाजिक, आर्थिक असमानता, वर्ण भेद भाव, आदि कुरीतियों ने बिहार के बौद्धिक विकास को तो बाधित किया ही, सांस्कृतिक विरासत को परिष्कृत नहीं होने दिया। यद्यपि स्वतंत्रता पूर्व एवं स्वतंत्रता पश्चात भी बिहार के लेखक लेखिकाओं का साहित्यिक अवदान उल्लेखनीय रहा है बाणभट्ट, विष्णु शर्मा, अश्वघोष, वात्स्यायन, मंडन मिश्र से लेकर पौराणिक काल में गौतम, विश्वामित्र, कपिल, कनादी, याज्ञवल्क्य, अष्टावक्र, जैमिनी, मध्य काल में बुद्ध, महावीर, कालिदास, विद्यापति एवं आधुनिक काल में देवकीनंदन खत्री, शिव सागर मिश्र, राजा राधिका रमण सिंह,  दिनकर, रेणु, गोपालसिंह ‘नेपाली’, नागार्जुन, ज्योतिरेश्वर ठाकुर, शिवपूजन सहाय, जानकी वल्लभ शास्त्री, मृदुला सिन्हा, भिखारी ठाकुर, मुकुट लाल मिश्र, मोहनलाल महतो ‘वियोगी’ आदि ने राष्ट्रीय साहित्यिक परिदृश्य पर अपनी सबल और सार्थक उपस्थिति दर्ज कराई। महिला लेखिकाओं में भी बिंदु सिन्हा, प्रकाशवती नारायण, डॉ मिथिलेश कुमारी मिश्र आदि उपन्यास, कहानी, लघुकथा विधा में सक्रिय रहीं। किन्तु स्वतंत्रता पश्चात परिदृश्य बदला। हिंदी सत्ता की भाषा बनी और सत्ता से सुख सुविधा पाने की लालसा ने रचनाकारों को साहित्य रचना के स्वान्त:सुखाय उद्देश्य से विमुख कर चाटुकारिता की ओर आमुख कर दिया।

बिहार कभी साहित्य का केन्द्र नहीं रहा जिसके कारण यहां के साहित्यकार उपेक्षित ही रहे, बाहर से छपने के बाद ही उन्हें या उनकी रचनाओं को पहचान मिल पाई या दोनों चर्चा का विषय बन पाये। परिणामस्वरूप रचनाधर्मिता के लिए जिस प्रतिबद्धता की अपेक्षा है, वह यहां के साहित्यकारों में विकसित नहीं हो पाई।

लेखक/कवि के बारे में  

डॉ. मीरा श्रीवास्तव  (एमए हिंदी,  बीएड, पीएचडी)

द्वारा – प्रो. सुरेश श्रीवास्तव, राजेंद्र नगर ,आरा- भोजपुर

मोबाइल – 08709732548 /7324091558

पूर्व प्राचार्या डीएवी पब्लिक स्कूल, आरा – भोजपुर

विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में कवितायें, लेख, समीक्षाएं प्रकाशित

संप्रति स्वतंत्र लेखन में व्यस्त “ऊनी शॉल” प्रथम काव्य संग्रह अभिधा प्रकाशन से प्रकाशित, शोध प्रबंध “साठोत्तरी कहानियों में नारी लेखिकाओं की भूमिका” का पुस्तक रुप में ज्योति प्रकाशन से प्रकाशन

Disclaimer: इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं। किसी भी विवाद के लिए फोरम4 उत्तरदायी नहीं होगा।

About the Author

राजीव कुमार झा
शिक्षक व लेखक

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