-प्रभात
जब इंसान किसी लक्ष्य को हासिल करने का मन बना ले तो प्रेरणा प्रदान करने के लिए कोई वस्तु या व्यक्ति अपने आप सामने आ जाता है। सपना उसकी हकीकत को दिखाने के लिए रात को आ जाता है और तकिए को बार-बार पलटने लगता है। हकीकत में लक्ष्य या मुकाम हासिल करने के लिए बस रात ही काटने की मजबूरी बन सकती है। उसके बाद कुछ पाने को कोशिश करने के लिए ही विहान होता है। इसी तरीके का कुछ एक शख्स के साथ हुआ। गुलशन नंदा की पुस्तकें पढ़ने का शौक बना और अब वह प्रसिद्ध साहित्यकार हैं। लेखक जिस तरह कुछ किताबें लिख डालता है। कवि जिस तरह कविताएं करने लगता है उसी प्रकार यह लेखक भी कई-कई विधा में अब तक 24 से अधिक पुस्तकें लिख चुके हैं। हिंदी भवन की नींव नहीं पड़ी थी तभी से दिन में इनका एक ही ठिकाना है जो लेखक के लिए मंच का काम करता है और वह है- हिंदी भवन के पास फुटपाथ। यहां कलम चलती है तो अच्छे-अच्छे लोग फुटपाथ पर दर्शन करने आ जाते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक को खबर हो जाती थी। प्रतिभा पाटिल से पुरस्कार भी मिलता है। यहीं से चाय की कप बांटते और दूध के साथ चीनी और चायपत्ती को पतीले में खौलाते-खौलाते गजब की लेखनी का अभ्यास हो जाता है। रातों रात प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति पर किताबें लिख दी जाती हैं। कुछ पन्नों पर कहानियां लिख दी जाती हैं और जब इन पन्नों पर कहानियां एक से एक हकीकत से जुड़ती जाती हैं तो उपन्यास का रूप ले लेती हैं। दरअसल हम बात कर रहे हैं चाय बेचने वाले मशहूर शख्स की जो हिंदी भवन के पास अपनी ठिया लगाते हैं और ठीक उसके बगल फुटपाथ पर ही अपने द्वारा लिखी किताबों की लाइब्रेरी सजाए 66 साल के हो चुके लक्ष्मण राव की।
महाराष्ट्र में पैदा हुए लक्ष्मण, पिछले 40 सालों से साहित्य के इतने प्रेमी हैं कि वो चाय बेचकर अपनी पुस्तकें निकालते हैं और अपना गुजारा करते हैं। जहां चाय बेची जाती है वहीं उसी के साथ पुस्तक भी बिकती रहती हैं। उनकी किताबें ऑनलाइन फ्लिपकार्ट और अमेजन पर भी सबसे अधिक बिकती हैं। लक्ष्मण राव अपनी किताबों के लेखक, प्रकाशक और विक्रेता ख़ुद ही हैं।
लक्ष्मण राव कहते हैं कि “जब मैं अपने गांव में था तब मैं गुलशन नंदा की किताबें पढ़ता था जो काफी सरल हिंदी में होती थी। स्कूल में भी कुछ हिंदी भाषी बच्चे होते थे तो उनके साथ मैं हिन्दी बोलता था। एक दिन अध्यापक ने सुना तो उन्होंने कहा कि तुम हिंदी भाषी क्षेत्र से हो ही नहीं तो इतनी सुंदर हिंदी कैसे बोल लेते हो? मैंने कहा कि मैं गुलशन नंदा की पुस्तकें पढ़ता हूं तो उन्होंने मुझे गांधी व विवेकानंद के बारे में हिंदी में भाषण देने के लिए कहा तो इस तरह मैं अभ्यास करता गया और धीरे-धीरे मेरी हिंदी अच्छी हो गई। मैंने सोचा था कि जब गुलशन नंदा कि पुस्तकें दिल्ली से मेरे गांव तक पहुंच सकती हैं तो एक दिन मेरी भी पुस्तकें भी एक दिन ऐसे ही दिल्ली पहुंचेगी लेकिन, प्रकाशन व्यवस्था दिल्ली में थी इसलिए मुझे दिल्ली आना पड़ा।
वह अपने द्वारा लिखी पुस्तकों के विषय के बारे में बताते हुए कहते हैं कि “मैंने कई विधाओं में पुस्तकें लिखीं। मैंने 5 उपन्यास लिखे जिनमें नर्मदा, रामदास, पत्तियों की सरसराहट, रेणु प्रमुख हैं। दृष्टिकोण, अभिव्यक्ति व नवयुवक जैसी कहानियां संग्रह हैं। 5 मैंने ग्रंथ लिखे जैसे बैरिस्टर गांधी, राष्ट्रपति ज्ञानी जैल का कार्यकाल, इंदिरा गांधी का कार्यकाल। 37 साल में मैंने12 वीं पास की। 50 साल में डीयू से बीए की और 63 साल में इग्नू से एमए। अब 66 साल का हूं सोच रहा हूं कि इंग्लिश में एमए फिर से करूं।”
मैंने एमए किया तो पाठ्यक्रम के आधार पर एक ग्रंथ लिखा 720 पुस्तका मानविकी हिंदी साहित्य। अब मैं एक किताब लिख रहा हूं द फिलोसॉफर जवाहर लाल नेहरू।”
यह पूछे जाने पर कि क्या वह अपनी आत्मकथा भी लिख रहे हैं या ऐसी कोई योजना बना रहे हैं वह कहते हैं कि “लोगों को मिलने के बहाने मैं यहां सुबह से शाम बैठता हूं। चाय बेचकर पैसे नहीं कमा रहा हूं। मेरे दो बेटे हैं एक बिजनेसमैन हैं, एक अकाउंट का कार्य करते हैं। मेरा किराये का मकान है। लेकिन मैं आत्मकथा भी जरूर लिखूंगा, लेकिन समय आने पर।”

वह अपने जीवन के संघर्ष के दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि “1976 में पुस्तक प्रकाशन के लिए जब दिल्ली आय़ा था तो घर खुद का नहीं लिया जबकि उस समय जमीन लेना आसान था। केवल इसलिए क्योंकि मेरी प्राथमिकता में घर लेना नहीं था, केवल किताबें ही लिखना और उन्हें प्रकाशित करवाना था। जब मैं 1976 में आया था तो उसके बाद अपनी पुस्तक लेकर एक प्रकाशक के पास गया। उस समय मुझे अपमानित करते हुए बाहर निकाल दिया गया था। तभी से मैं खुद प्रकाशक भी बन गया। इससे पहले मैं मजदूरी करता था और ढाबों पर बर्तन साफ करता था। अब मैं 15000 के किराये का मकान लेकर परिवार के साथ रहता हूं। दो बेटे अच्छी पोस्ट पर हैं और कमा रहे हैं।”

मोदी के नाले सें से पाइप लाकर चाय बनाने के सवाल पर वह प्रतिक्रिया देते हुए कहते हैं कि “राजनीति में वक्ता कुछ भी बोल देते हैं यह जीवन से जुड़ा हुआ विषय नहीं है। और मोदी जी क्या बोलते हैं यह बोलना ज्यादा मायने नहीं रखता जब तक यहां के लोगों को रोजगार न मिल जाए। वह कहते हैं कि पहले चाय बेचते थे फिर कहने लगे कि पकौड़े बेचते थे। भारत सरकार को देश के लोगों की प्राथमिकताओं पर ध्यान देनी चाहिए। प्रलोभन या उच्च कोटि की बातें करने से बात नहीं बनती है।”
उपलब्धियों के बारे में पूछने पर वह कहते हैं कि “देखने वाले को लगता है कि मैंने कुछ नहीं पाया। जब दिल्ली में आया था तो मेरे पास कुछ भी नहीं था। लेकिन ऐसा नहीं है अब इतनी पुस्तकें हैं जोकि मैं कुछ बन गया होता तो शायद ये पुस्तकें न होतीं। धनी आदमी के पास खुद की इतनी पुस्तक हो य़े जरूरी नहीं। पुस्तक लिखना और पैसे कमाना दोनों अलग है। लेखक का जन्म ही 50 साल बाद है। और जीवन मिलना उससे भी बाद हैं। आपने अनुमान लगाया होगाकि लोग मरने के बाद ही याद किए जाते हैं। अटल को कौन याद करता था वह15 साल तक गुमनाम रहे और आज उनकी प्रतिभा उभर कर आ रही है। आज उनकी कविताओं को लोग याद कर रहे हैं।”
“मेरी पहली पुस्तक 1978 में छपी जब मैं 22 साल का था। इसके बाद ही मेरे जीवन पर लेख टाइम्स आफ इंडिया में प्रकाशित हुई, जिसकी चर्चा इंदिरा गांधी के ऑफिस में होने लगी। इसके बाद ही मेरा मिलना इंदिरा गांधी से हुआ और मैंने उनकी आत्मकथा लिखने को लेकर जिज्ञासा प्रकट की। इंदिरा ने कहा कि आप मेरे बारे में न लिखकर मेरे काम के बारे में लिखें। मैंने उनके भाषणों का संकलन कर एक किताब लिखी। किताबें बिक रही हैं, अमेजन पर भी ज्यादा बिकती हैं।”
नए लेखकों के बारे में वह कहते हैं कि “मेरा मानना है कि नवलेखकों को पैसे के लिए पुस्तकें नहीं लिखनी चाहिए क्योंकि लेखक का जन्म ही 50 साल बाद होता है। किसी को राजनीति में आकर कैशियर नहीं बनना चाहिए। मैं कभी भी कहीं आवेदन नहीं करता। मैं चाटुकारिता नहीं करता। मैं जैसे ही गुलशन नंदा बनने आया था ऐसे ही मैं अब शेक्सपियर बनना चाहता हूं।”

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