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शैलेंद्र गीतों का चित्रकार, जिसके लिखे में आंसू और मन का चेहरा नजर आता था

चांदनी रात में सागर किनारे उल्टी पड़ी नाव पर दो प्राणी बैठे थे। एक गंभीर और दूसरा कुछ अनमना सा। अनमने अधीर ने यौवन में ही चढ़ आए अपने मोटापे को थोड़ा संभालते हुए कहा, दादा आज तो आप को लिखना ही पड़ेगा। आप लिखोगे नहीं तो मैं हिलूंगा नहीं और जाऊंगा भी नहीं । गंभीर प्राणी कुछ मुस्काया लेकिन गंभीरता बनी रही फिर संयत हो कर बोल- तुम्हारे बाबा कुछ भी धुन बना लें और चाहते हैं कि मैं कुछ भी लिख दूं। फैक्ट्रियों वाला काम न कराया करो। नहीं दादा ऐसा क्यों बोलते हैं, युवक बोला। आप तो इत्मीनान से लिखो। बस लिख दो ताकि मैं बाबा को ये बता कर साबित कर सकूं कि मैं भी कुछ कर सकता हूं और आज मेरा प्रण आपको मनाने का है।

तुम बहुत कुछ कर सकते हो, काम में गंभीर हो और सबसे जरूरी बात कि धुनें भी अच्छी बना लेते हो । लगे रहोगे तो क्रांति लाओगे। अब वो युवक थोडा गंभीर हुआ । ये तो आपने ना कहने का अलग ही ढंग निकाला है। मेरी बेवजह प्रशंसा। बाबा को तो लगता है कि मैं अच्छी धुनें बना ही नहीं पाऊंगा। गंभीर प्राणी ने अब ठंडे लहजे में कहा, कभी कभी सारा आकाश साथ होने पर चांद भी खोया खोया सा हो जाता है। देखो कैसे भटक रहा है अभी वहां था और अब यहां। खोया खोया चांद।

फिर  वे चुप  हो गए। युवक कहना चाहता था दादा ये चांद आपको खोया लगता है, ये तो राजा है राजा। लेकिन युवक ने इन शब्दों को अपने अंदर ही रखा बाहर नहीं निकाला। गंभीरमना कुछ देर शांत रहे फिर बोले अच्छा धुन सुनाओ। युवक ने दोगुने उत्साह से धुन सुनाई । एक स्वर्णिम कृति के आने का समय हो गया था। महोदय ने कहा चलो लिखो

खोया खोया चांद

खुला आसमां 

आंखो में सारी रात जाएगी

तुमको भी कैसे नींद आएगी।

अब तो समझ गए होंगे वह गंभीर मना थे गीतकार शैलेंद्र, वह अनमना युवक था खुद पंचम दा, जिन्हें उनके बाबा एसडी बर्मन ने शैलेंद्र को गीत लिखने के लिए मनाने भेजा था।

खोया खोया चांद। काला बाजार का यह गीत जब अगली बार सुनाई दे तो यह किस्सा जरूर याद करिएगा ।

शंकरलाल केसरीदास, यही नाम था उनका जो माता-पिता ने दिया था। 30 अगस्त 1939 को शैलेंद्र का जन्म तो रावलपिंडी (पाकिस्तान) में हुआ था। पिता फौजी थे और बिहार के रहने वाले थे। बाद में परिवार मथुरा आ गया। यहां उनके बड़े भाई बाबूलाल रेलवे वर्कशॉप में नौकरी करते थे और इन्हें पढ़ा भी रहे थे। किसी जमाने में मथुरा में रेलवे कर्मियों की कॉलोनी रही है धौली प्याऊ की गली। यहां के गंगाराम के मकान में ही शैलेंद्र अपने भाइयों के साथ रहते थे। धीर-धीरे सभी बड़े भाई रेलवे वर्कशॉप में ही काम करने लगे। शैलेंद्र छोटे थे और पढ़ रहे थे। साल 1939 में उन्होंने मथुरा के राजकीय इंटर कॉलेज से हाईस्कूल की परीक्षा दी और पूरें उत्तर प्रदेश में तीसरा स्थान पाया। कहने का मतलब यह कि गुदड़ी का लाल पढ़ाई-लिखाई में भी अव्वल रहा। इसीके साथ पनपती रही संवेदनशीलता जो आगे आजादी के आंदोलन में और उसके बाद हिंदी सिनेमा के बहुत काम आई। हाईस्कूल के बाद  वे भी मथुरा रेलवे वर्कशॉप में काम करने लगे और कुछ समय बाद उनका तबादला माटुंगा (मुम्बई) हो गया। यही तबादला फिल्मों में आने के लिए उनका आधार बना। इससे पहले भारतीय क्रांति उनका इंतजार कर रही थी।

फिल्मों में गीत लिखने से पहले शैलेंद्र देश की आजादी के गीत लिखते थे। यह वीर रस में लिखे होते थे जिनमें कई जगहों पर अभूतपूर्व तरीके से करुण रस घुला होता था। आसान शब्द, लय में बंधी शैली और स्थिति का पूरा ब्यौरा होने से उनके गीत जल्द ही लोगों की जुबान पर चढ़ जाते थे। उनकी एक रचना है जलता है पंजाब… इसे उस दौर में बेहद प्रसिद्धि मिली। आजादी की लड़ाई के दौर में कवि सम्मेलन भी विद्रोह का जरिया होते थे। गीतकार शैलेंद्र इनमें कविता पढ़ने जाते तो चारों ओर से वाह ही वाह होने लगती। ऐसे ही एक सम्मेलन में एक बार अभिनेता व निर्माता राजकपूर ने उन्हें सुन लिया। इतने प्रभावित हुए कि अपनी फिल्म आग के गीत लिखने के लिए उन्हें प्रस्ताव दिया। क्रांति के रंग में रंगे शैलेंद्र तब फिल्मी लोगों से चिढ़ते थे। मानते थे कि देश जल रहा है और यह लोग सिर्फ अपना व्यवसाय कर रहे हैं। उन्होंने उस समय कपूर साहब को मना कर दिया। यह साल 1947 का ही था और आजादी से कुछ महीने पहले की बात थी। 1948 आते-आते देश विभाजन का दंश झेल चुका था। इस समय जब गृहस्थी चलाना मुश्किल हुआ तब उन्होंने राजकपूर से मिलने के बारे में सोचा। उस समय कपूर साहब बरसात फिल्म की तैयारी कर रहे थे। संयोगवश जिस दिन शैलेंद्र उनसे मिलने के लिए निकले रास्ते में तेज बारिश होने लगी। भीगते शैलेंद्र उनके पास पहुंचे और औपचारिक दुआ-सलाम के बाद मुंह से निकला बरसात में तुमसे मिले हम… बाद में यही पंक्ति बरसात में तुमसे मिले हम सनम कपूर साहब की फिल्म का टाइटल ट्रैक बना। शैलेंद्र को नया काम मिल गया था, तनख्वाह मिली 50 हजार मासिक अब बस नाम मिलने की देरी थी। फिल्म रिलीज होते ही शोहरत भी खूब मिलने लगी।

चमक-दमक के बीच भी शैलेंद्र की संवेदनशीलता ने उनका साथ नहीं छोड़ा। इसकी वजह यह शायद यह रही कि मथुरा में जिस तरह के अभाव व कमी में उन्होंने जीवन जिया था उसकी याद हमेशा दिल में बनी रही।

इसीलिए उनके गीतों में आंसू से भीगे गाल, दुख की धौंकनी में गर्म हुई सांसें और तपता हुआ मन बिल्कुल चित्र की तरह नजर आता था। ब्रह्मचारी के गीत दिल के झरोखे…की यह पंक्ति देखिए-

कल तेरे सपने पराए भी होंगे, लेकिन झलक मेरी आंखों में होगी,

फूलों की डोली में होगी तू रुखसत, लेकिन महक मेरी सांसों में होगी।

राजकपूर की ही बेहद प्रसिद्ध फिल्म संगम को याद कीजिए। इसका एक गीत है, ओ मेरे सनम जिसे शंकर जयकिशन के सुरों में लता जी ने सजाया है। शैलेंद्र ने इसके एक-एक शब्द को पिरोया था। लता जी ने जब इसे गाया तो वे भावनाओं के सबसे शीर्ष पर थीं। उनके भीगे हुए आंखों के कोर गीतकार के शब्दों को सार्थक कर रहे थे। इसका पहला अंतरा तब की हिंदुस्तानी स्त्री का खाका खींचता है।

तन सौंप दिया मन सौंप दिया कुछ भी तो मेरे पास नहीं

जो तुमसे है मेरे हमदम, भगवान से भी वो आस नहीं।

एक फिल्म आई थी, तीसरी कसम। इसके निर्माता शैलेंद्र ही थे। फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी मारे गए गुलफाम पर आधारित यह फिल्म सिनेमा के जरिये भारतीय समाज का रेखाचित्र खींचने का सहज कोशिश थी। तब यह फिल्म असफल रही, लेकिन अब देखने वाले इसे क्लास का दर्जा देते हैं। फिल्म का गीत दुनिया बनाने वाले, सजन रे झूठ मत बोलो अब भी अमर हैं।

तब के गीतों और आज के गीतों में एक फर्क है। आदमी संगीत का साधक न भी हो तो भी गीत के शब्द इतने सटीक होते थे कि दिल में उतर जाते थे। बदलाव की क्षमता रखते थे और बातों ही बातों में किसी को समझा लेने की ताकत इनमें होती थी। बाल कविता नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए, बाकी जो  बचा था काला चोर ले गए अब भी सबकी जुबान पर रटी हुई है। इसमें इतनी गूढ़ बात है कि एक अकेली वृद्धा से सामाजिक नियमों और ताने बाने ने सबकुछ छीनकर उसे अकेला कर दिया है।

खैर, तीसरी कसम की असफलता के बाद कर्ज के बोझ में दबे शैलेंद्र बीमार हो गए। अस्पताल में भर्ती थे और उपचार के दौरान वे अपना गीत जाने कहां गए वो दिन लिख रहे थे। 14 दिसंबर 1966 का दिन था। उन्होंने बीमारी की हालत में ही राजकपूर से मिलने की इच्छा जताई। उन्हें लाया जा रहा था कि रास्ते में ही उनकी जिंदगी की कलम टूट गई। उस दिन राजकपूर का जन्मदिन भी होता है। शैलेंद्र कुछ दिन और रहते तो उस पुरस्कार को खुद ले सकते थे जो मौत के बाद उनकी फिल्म को हिट होने पर मिला था।

गीतों का यह चितेरा हिंदी सिनेमा को अमर रचनाएं देकर चला गया। एक आश्चर्यजनक सत्य है, अक्सर बीते दशकों तक की भारतीय गृहणियों को घर के काम करते आप ध्यान से सुनिये। वह जो राग माला गुनगुना रही होंगीं उनके शब्द शैलेंद्र ने पिरोकर दिए हैं। फिर चाहे वह दुख, भक्ति या प्रेम ही क्यों न हो।

Disclaimer: इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं। किसी भी विवाद के लिए फोरम4 उत्तरदायी नहीं होगा।

About the Author

विकास पोरवाल
पत्रकार और लेखक

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