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राम सिया के लव कुश- कहानी की आत्मा से खेल रही है निर्माताओं की रचनात्मक छूट

तस्वीरः गूगल साभार

तमसा नदी के तट पर पीपल के वृक्ष के नीचे एक ऋषि विचारमग्न थे। सुबह की इस वेला में नदी की लहरें शांत थीं। मंद हवा बह रही थी, जिनमें पत्तियां-डालियां हिल-मिल रही थीं। पंछी घोसलों से निकल आए थे और उड़ने की तैयारी कर रहे थे। इसी समय क्रौंच पक्षी का एक जोड़ा पास ही पेड़ की डाल पर बैठा कलरव कर रहा था। दोनों एक-दूसरे को चोंच मारते, पंख सहलाते, साथ-साथ उड़ान भरते और फिर डाल पर बैठ जाते थे। इस आमोद-प्रमोद से उनकी सृष्टि में अपार आनंद था। विचारमग्न ऋषि भी यह दृष्य देखते तो उनके भी होंठो पर मुस्कान आ जाती थी। यह क्रम चल ही रहा था कि एक व्याध (शिकारी) बाण संधान किए हुए वहां आ पहुंचा। उसने इधर-उधर देखा और फिर क्रौंच पक्षी की ओर दृष्टि जमा दी। अगले ही क्षण एक तीर सनसनाता हुआ नर पक्षी को भेद गया। वह चीत्कार करते हुए भूमि गिरा और उसने प्राण त्याग दिए। यह देख उसकी सहचरी क्रौंच विलाप करने लगी। अभी जहां कलरव था उस जगह शोक छा गया। विलाप करते हुए उसके भी प्राण निकल गए। यह दृष्य देख ऋषि गरज उठे, वेदना से उनका हृदय फट पड़ा और शोक श्लोक बनकर फूट पड़ा।

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः, यत्क्रौंचमिथुनादेकम अवधी काममोहितम।।

यह एक श्राप था, जो ऋषि वाल्मीकि ने उस शिकारी को दिया था। उन्होंने उसे जीवन भर अशांत रहने का श्राप दिया। करुणा के प्रभाव से फूटी यह श्लोकबद्ध कविता रामायण की रचना का आधार बनी। वाल्मीकि ने इससे पहले कुछ भी नहीं लिखा था। दंतकथाओं के अनुसार वे रत्नाकर नाम के डाकू थे, जो ज्ञान पाकर ऋषि बन गए थे। उनकी लिखी रामायाण जितनी अधिक श्रद्धा का केंद्र है, उतनी ही कई तरह के विवादों की जिम्मेदार भी है।

समय-समय पर राम और रामकथा चर्चा में बनी रहती हैं। आज एक तरफ सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की सुनवाई की जा रही है। इसमें पक्ष-विपक्ष की ओर से हर रोज नये तर्क दिए जा रहे हैं। दूसरी ओर टीवी चैनल कलर्स पर एक डेली सोप प्रसारित हो रहा है। नाम है राम सिया के लव कुश। जाहिर है कि माइथोलॉजी के तड़के वाले इस सीरियल में पौराणिक किरदार लव-कुश की बात की जा रही है। दोनों ही राम-सीता के पुत्र थे। सीता ने इन्हें वन में जन्म दिया था। यह सीरियल फिलहाल काफी चर्चा का विषय बना हुआ है। कहा जा रहा है कि इस शो में तथ्यों के साथ छेड़छाड़ की गई है। यही वजह है कि तमाम धार्मिक संगठनों ने चैनल को नोटिस भेजा है, साथ ही वाल्मीकि समाज के लोगों ने भी इस पर आपत्ति जताई है।

बीते 11 सितंबर को सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने कलर्स टीवी को सीरियल के जरिये धार्मिक भावना को आहत करने, गलत व भ्रामक जानकारी देने को लेकर नोटिस दिया था। गायक से नेता बने हंसराज हंस ने भी इसे वाल्मीकि जाति के लिए छवि बिगाड़ने वाला बताया था। विवाद अधिक बढ़ने के बाद मनोरंजन समूह वॉयाकॉम 18 ने बयान जारी कर कहा है कि चैनल ने इस सीरियल का निर्माण मनोरंजन के लिए किया है। इसके लिए रामायण से जुड़ी कई कहानिय़ों, लेखों और दंतकथाओं का सहारा लिया गया है। उनका कहना है कि रामायण की कहानी कई सूक्ष्म प्रसंगों से प्रेरणा देने वाली कहानी है। हमें सिर्फ दो चरित्रों पर कहानी को केंद्रित रखना है इसलिए हमने रचनात्मक छूट ली है।

रचनात्मक छूट, यह एक टर्म कई दशकों से सिनेमा में बहस का मुद्दा बना हुआ है। सेंसर बोर्ड और निर्माताओं के बीच इसे लेकर खींचतान बनी रहती है। यह तय नहीं हो पा रहा है कि किसी प्रसंग, चरित्र या कहानी के फिल्मांकन में निर्माता कितनी और कैसी रचनात्मक छूट ले। सीरियल राम-सिया के लव-कुश में विवाद को लेकर राजनीतिक स्वार्थ हो तो वह अलग विषय है, लेकिन कई स्थानों पर रचनात्मक छूट दर्शकों की भी पाचन क्रिया पर असर डाल रही है।

एक उदाहरण लेते हैं। एक एपिसोड में दिखाया गया है कि वाल्मीकि आश्रम में लव-कुश शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, उसी आश्रम में लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के पुत्र भी शिक्षा ले रहे हैं। एपिसोड का यह पहलू कुछ अलग लगता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार सीता को ऋषि वाल्मीकि ने सहारा दिया, इसलिए उन्होंने लव-कुश को शिक्षा दी। दूसरी ओर रघुकुल के कुलगुरु वशिष्ठ थे। उन्होंने राम सहित चारों भाइयों को शिक्षित किया था। इसके बाद वह राज परिवार के अन्य राजकुमारों को भी शिक्षित कर रहे थे। यही नियम था।

एक और सीन है, जिसमें दोनों कुमार धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहे हैं। अन्य कुमार उन्हें उनके पिता का नाम न पता होने के कारण परेशान कर रहे हैं। कहानी कहने का यह तरीका कुछ अशोभनीय सा लगता है। हालांकि इसके अलावा ऋषि वाल्मीकि की छवि कैसे धूमिल की गई है, यह अभी शुरुआती एपिसोड देखकर समझना मुश्किल है। उनकी कहानी का रत्नाकर वाला हिस्सा सभी जानते हैं और लगभग सभी भाषाओं में यह कहानी इसी तरह कही गई है। इसलिए इस पर आपत्ति जताना खुद में तथ्यों से छेड़छाड़ करना है।

हिंदी-अवधी में रामचरित मानस रचने वाले तुलसी दास ने वाल्मीकि का जिक्र किया ही नहीं है। दरअसल उनकी रचना का केंद्र केवल राम रहे। जिसमें वह एक आदर्श पुत्र, भाई, प्रेमी, मित्र से लेकर आदर्श राजा बनने तक का सफर तय करते हैं। राम का राज्याभिषेक होने के बाद ही तुलसी का मानस समाप्त हो जाता है। वहां सीता विछोह जैसी कोई कथा नहीं है। कहते हैं कि तुलसी, राम-सीता के वियोग से इतने दुखी हुए कि कहानी में आगे की कड़ियां लिख ही नहीं सके।

दूसरी ओर कंबन की लिखी तमिल रामायण में भी राम का चरित्र ही उभारा गया है। सीता, लक्ष्मण व अन्य भाइयों का चरित्र राम के सहयोग में ही उभरता है। तुलसी के राम और वाल्मीकि के राम में भी अंतर है। तुलसी के लिए राम एक आराध्य की तरह हैं। वह उनसे सवाल नहीं करते। यही वजह है कि बाली जब अपने वध का कारण पूछता है तो राम उसे महज राजनीतिक कहकर छोड़ देते हैं। जबकि वाल्मीकि, समाज के द्वारा कई बार राजा राम को कठघऱे में खड़ा करते हैं। एक बार कौशल्या ही राम को लगभग लताड़ते हुए कहती हैं कि क्यों रे, तू इतना निर्मोही कैसे हो गया। क्या यह भी राजा का कर्तव्य है। राम राज की एक महिमा सवाल करना रही है। रामायण इसे भी रेखांकित करती है। धोबी ने सीता के चरित्र पर सवाल उठाया, राम ने उन्हें वन में भेज दिया। यह निर्णय़ आज तक राम राज पर सवाल है। अलग-अलग विद्वान इसकी अपनी तरह से समीक्षा करते हैं। कई का कहना है कि राम कई जगहों पर सवालों से बचते थे। जब प्रजा ने सीता पर उंगली उठाई तो वे उसे एक अच्छा उदाहरण बता सकते थे। वह कह सकते थे कि किसी स्त्री के साथ बलपूर्वक कुछ अनिष्ट हो तो उसमें उसका दोष नहीं, लेकिन शायद राम उस समय की पितृसत्ता को चुनौती नहीं देना चाहते थे। रामायण सीरियल के निर्माता रामानंद सागर ने अग्नि परीक्षा की स्थिति को सीता की छाया से जोड़ा था। उन्होंने दिखाया था कि असली सीता को राम पहले ही अग्निदेव को सौंप चुके थे। अग्निपरीक्षा का स्वांग देवता से असली सीता को वापस पाने के लिए रचा गया था। उन्होंने यह स्टोरीलाइन अलग-अलग प्रचलित दंतकथाओं से उठाई थी। हालांकि इसमें भी सवाल हैं कि अगर राम ने सीता को बिना किसी को बताए अग्नि देव की सुरक्षा में सौंपा था तो असली सीता को वापस पाने का काम भी अकेले में किया जा सकता था। अग्निपरीक्षा जैसा शब्द ही क्यों रचा गया।

जहां तक रचनात्मक छूट लेने की बात है, सीरियल के निर्माण में कई बार यह अतिश्योक्ति के भी पार पहुंच जाता है। निर्माताओं को अब भी लगता है कि उनका दर्शक वर्ग किचन पॉलिटिक्स को खूब पसंद करता है। वह हर अगले पल एक रहस्य से जुड़ना चाहता है या किसी चालबाजी से जूझना चाहता है। यही वजह है कि धार्मिक सीरियल को बनाते हुए भी यह मसाला प्रयोग किया जा रहा है। कुछ साल पहले रजिया सुल्तान पर आधारित एक डेली सोप प्रसारित हुआ था। इसमें गुलाम वंश की प्रथम महिला शासिका रजिया की कहानी को बेहद लंबा खींच दिया गया। उसका शासन काल महज 3 से 4 साल का था, लेकिन सीरियल ने किचन पॉलिटिक्स में ही डेढ़ साल खर्च कर दिए और यह शो बिना किसी अंजाम के ऑनएयर होना बंद हो गया। यही हालत चित्तौड़ की रानी पद्मिनी शो की रही। नागमती और पद्मिनी का संघर्ष दर्शकों के लिए बोझिल रहा। इस रचनात्मक छूट के कारण दर्शक का नुकसान यह होता है कि वह इतिहास को देखता हुआ भी उससे रूबरू नहीं हो पाता है। भारत का वीर पुत्र, चाणक्य, अशोक जैसे कई शो इन मामलों में कच्चे साबित हुए। यह रचनात्मक छूट का ही गलत नतीजा था। एकता कपूर ने कहानी हमारे महाभारत की सीरियल का निर्माण किया। इसमें कौरव-पांडव बचपन में ही इतना लड़ पड़े कि सीरियल 55 एपिसोड में ही खत्म हो गया। खैर, जहां तक राम-सिया के लव कुश की बात है तो तुलसीदास ने लिखा है हरि अनंत हरि कथा अनंता, कहहिं सुनहीं बहु बिधि सब संता।

यानी कि हरि और उनकी कथाएं अनंत हैं, जिसे संत-विद्वान लोग अनेक प्रकार से कहते सुनाते हैं। लेकिन कलर्स चैनल पर जिस तरीके से यह कथा सुनाई जा रही है, शायद वह तरीका थोड़ा गलत है।

नोटः प्रस्तुत लेख में लेखक के निजी विचार समाहित हो सकते हैं। लेख के किसी भाग से असंतुष्टि की दशा में फोरम4 जिम्मेदार नहीं होगा। 

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विकास पोरवाल
पत्रकार और लेखक

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