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कोरोना और साहित्य से जुड़े तमाम प्रश्नों को लेकर कवयित्री अल्पा से खास बातचीत!

गुजरात के राजकोट की कवयित्री अल्पा योगेश महेता साहित्य में अपने उपनाम एक एहसास से जानी जाती हैं और इन्होंने हिंदी, गुजराती के अलावा अंग्रेजी में काव्य लेखन किया है. पत्र-पत्रिकाओं और डिजिटल चैनलों पर इनकी कविताएं प्रकाशित होती रही हैं और वर्ल्ड बुक आफ टैलेंट रिकार्डस के द्वारा इन्हें संवेदनशील कविता लेखन के लिए सर्वश्रेष्ठ कवयित्री का सम्मान भी प्रदान किया गया है. प्रस्तुत है इनसे राजीव कुमार झा की बातचीत-


आपका काव्य लेखन से गहरा प्रेम है और आपकी पहचान एक संवेदनशील कवयित्री के रूप में है. अपने काव्य लेखन के बारे में बताएं?

पिता का काव्य से गहरा प्रेम था और मैं आज उन्हें एक कवि के रूप में ही याद करती हूं, लेकिन औपचारिक रूप में वे काव्य लेखन नहीं कर पाए. इस प्रकार वे कवि भी नहीं बन पाए. लेखन का संस्कार मुझे अपने पिता से ही मिला. काव्य लेखन से मेरा बाल्यावस्था से ही लगाव रहा और उम्र में बदलाव के साथ कविता लेखन में मेरी रुचि बढती गयी.

आप गुजराती भाषी हिंदी कवयित्री हैं. हिंदी के अपने प्रिय रचनाकारों के बारे में बताइए?

मैंने हिंदी के अनेक कवियों को पढ़ा है. इनमें छायावाद के चार प्रमुख कवियों को मैं अपना आदर्श मानती हूं. जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला हिंदी के ऐसे ही महान कवि हैं. इसके अलावा रामधारी सिंह दिनकर की रचनाओं से भी मेरा मन अनुप्राणित हुआ.

हिंदी में लेखन के प्रति लगाव कैसे कायम हुआ?

मैं गुजरात की निवासी हूं. मेरा शहर राजकोट है. यहां हिंदी भाषा के प्रति लोगों के मन में काफी सम्मान का भाव है. गुजरात में सारे लोग हिंदी पढ़ते हैं. हिंदी के साहित्यकारों के प्रति गुजरात के लोगों के मन में काफी आदर भाव है. मेरी शिक्षा अंग्रेजी और हिंदी माध्यम से हुई है इसके बावजूद हिंदी के प्रति मेरे मन में सदैव आदर का भाव विद्यमान रहा. हिंदी के सहारे लोग एक- दूसरे के सहारे ज्यादा सरलता से विचार विमर्श करते हैं.

अपने काव्य लेखन को आप घर परिवार की परिस्थितियों से किस तरह से प्रभावित महसूस करती हैं?

यद्यपि मुझे व्यक्तिगत तौर पर अपने जीवन में ज्यादा संघर्ष नहीं करना पड़ा क्योंकि मैं एक सुखी परिवार से हूं लेकिन, समाज में दूसरे लोगों के जीवन के संघर्ष को मैंने सदैव महसूस किया. अपनी कविताओं में मैंने लोगों की परेशानियों उनकी जिंदगी की कठिनाइयों को प्रकट किया है. इसे अपने लेखन के लिए मैं जरूरी मानती हूं.

कवयित्री अल्पेश योगेश महेता

गुजराती आपकी मातृभाषा है. इस भाषा का साहित्य आपको कितना प्रिय है?

गुजराती कवि रमेश पारेख की कविताएँ मुझे बहुत प्रिय रही हैं. इनकी कविताओं में जीवन की रमणीयता और इसके दुख के साथ करुणा का सुंदर वर्णन हुआ है. मुझे उनकी कविता ‘झरूखो’ काफी पसंद है. इसमें सुंदर कल्पना है और कविता में एक कन्या झरुखो यानी दरवाजे के पास खड़ी है. कवि ने इस कन्या के मनोभावों का लाजवाब वर्णन किया है. यह भावपूर्ण कविता सबके मन पर अमिट प्रभाव डालती है.

साहित्य में वर्तमान काल काव्य लेखन आपको कैसा प्रतीत होता है?

आज के काव्य लेखन में मन के भावों की गहराई अब पहले की तरह दिखायी नहीं देती. अब काव्य लेखन में कवि के भीतर जीवन की प्रेरणा की कमी दिखायी देती है और इसी अनुरूप कविता में शब्दों का प्रयोग भी बाधित और संकुल होता जा रहा है. आजकल काफी लोग लिख रहे हैं, लेकिन काव्य लेखन कोई खास प्रभाव कायम नहीं कर पा रहा है.

गुजरात में महिलाओं की जीवन संस्कृति के बारे में बताएँ ?

गुजरात एक परंपरागत संस्कृति का प्रांत है और आज भी यहां महिलाएं ज्यादातर घरों में जीवन जीती दिखायी देती हैं. वे घर के भीतर इस जीवन को आसानी से स्वीकार कर लेती हैं. यद्यपि अब गुजरात की नारियां भी अपने जीवन में कुछ नया करना चाहती हैं, लेकिन वे शादी घर गृहस्थी में बंधकर ज्यादातर अपने जीवन के इन सपनों से समझौता कर लेती हैं.

महिलाओं के जीवन में आने वाले बदलावों के बारे में आपका क्या नजरिया है ?

आज की महिलाएं मुझे दोराहे पर खड़ी दिखायी देती हैं. शहरों में महिलाओं के लिए भी नौकरी करना उनकी जरूरत है और इसके साथ घर की जवाबदेही में ही सिमटकर रहना उनकी पुरानी छवि है इसलिए वे एक असमंजस में मुझे दोराहे पर खड़ी नजर आती हैं. समाज में महिलाओं की मनोवेदना को समझना आसान नहीं है और यह संवेदना का बड़ा प्रसंग है.

कविता लेखन के अलावा आपकी अभिरुचि से जुड़े अन्य विषय क्या हैं?

साहित्य के अलावा गायन में भी मेरी रुचि है. पुरानी फिल्मों को देखने का शौक मुझे खूब रहा है. इन फिल्मों के गाने भी मैं सुनती हूं. मुझे गुलाम अली और मेंहदी हसन की गजलें सुनना भी पसंद हैं. गुरुदत्त और दिलीप कुमार मेरे पसंदीदा अभिनेता हैं. इसके अलावा सैर सपाटे का शौक भी मुझे रहा है. मैंने आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और दुबई की यात्रा भी की है. अपने देश में मेरा अक्सर मुंबई आना जाना होता है. मेरी बेटी वहां आर्किटेक्चर की पढ़ायी कर रही है.

कविता के अलावा अन्य विधाओं में अपने लेखन के बारे में बताएं?

कविता लेखन के अलावा मैंने कहानी लेखन भी किया है. अपनी कहानियों में आज की जिंदगी के प्रसंगों को मैंने प्रस्तुत किया है. हाल में मैंने एक कहानी लिखी है और इसमें एक लड़की ऑनलाइन प्रेम में संलग्न दिखायी देती है. प्रेम एक सच्चा भाव है. इस कहानी में जीवन के बदलते संदर्भों में प्रेम के बारे में मैंने यह कहने की कोशिश की है.

कोरोना का संकट और लॉकडाउन को जीवन के कैसे अनुभव के तौर पर देखती हैं?

लॉकडाउन का संकट अचानक आया, लेकिन इसने सारे लोगों को कुटुंब की तरह से एक-दृसरे के करीब आने का मौका दिया. इसे हमें सकारात्मक रूप से देखना चाहिए. धरती पर संकटों का आना जाना एक नियम है. कोरोना भी एक ऐसा ही संकट है. यह देशव्यापी है.

आप जैन मतावलंबी हैं. मानव जाति के प्रति इस धर्म का क्या संदेश है?

जैन धर्म के सदियों पुराने संदेश आज भी प्रासंगिक हैं. आज कोरोना के विषाणु से बचाव के लिये मास्क लगाने की जो बातें कही जा रही हैं उसके बारे में इस धर्म में काफी पहले बताया गया है. इस धर्म के अनुयाइयों में मुंहपति के रूप में कपड़ा बाँधने का रिवाज रहा. कोरोना संकट के इस काल में सारी दुनिया इसका अनुसरण कर रही है. जैन धर्म में बीमारी के वाहक विषाणुओं से बचने के लिए पानी को गर्म करके पीने के लिए भी कहा गया है. इसके अलावा आज शाकाहार के प्रति भी सारी दुनिया में लोगों का झुकाव बढ़ रहा है. ये सारी बातें जैन धर्म में पहले से कही गयी हैं. अहिंसा जैन धर्म का मूल भाव है. इस धर्म में प्रचलित सारी बातें वैज्ञानिक कसौटी पर प्रमाणित हो चुकी हैं.

जैन धर्म में शाम सात बजे के बाद भोजनादि की मनाही है. देर रात तक जगना खाना-पीना स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह है. कोरोना से बचाव में अब ये बातें फिर बतायी गयी हैं. कोरोना में भीड़भाड़ से बचने के लिए कहा जा रहा है और जैन धर्म में ये सारी बातें मोटर गाड़ियों की आवाजाही से बचाव की कही गयी हैं.

डिजिटल मीडिया साहित्य को किस तरह प्रभावित कर रहा?

डिजिटल मीडिया से किताबों को पढ़ने का नया तरीका सामने आया. इससे किताबों को पढ़ने की प्रवृत्ति प्रभावित हुई है. डिजिटल मीडिया से काफी कम समय में लोग प्रसिद्धि पा रहे है. यह अच्छी बात है लेकिन यह भी जरूरी है कि कविता की मौलिकता कायम रहे और अनुकरण से लोग खुद को दूर न ले जाएं.

About the Author

राजीव कुमार झा
बिहार के लखीसराय जिले के बड़हिया के इंदुपुर के रहने वाले राजीव कुमार झा स्कूल अध्यापक हैं। हिंदी और मास कॉम से एमए कर चुके राजीव लेखक, कवि और समीक्षाकार भी हैं।

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