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कितने गांधी- गांधी जयंती विशेष

गांधी बारम्बार कहते थे कि सत्य के प्रयोगों के क्रम में मेरे विचार निरंतर बदलते रहते हैं, अतैव एक ही विषय पर प्रकट किए गए दो विचारों में से बाद वाले विचार को अधिक प्रमाणभूत माना जाए।

यह एक प्रगतिकामी व्यक्ति के रूप में भले गांधी के लिए सहज दशा रही हो, उससे उनका मूल्यांकन करने वालों को बहुत मुश्किलें आती हैं। उनके अनुयायियों को भी इससे एकरूप निर्देश नहीं मिलते। आलोचक की समस्या वही है जो अनुयायी की है। वह कहता है, हमें एक सार-सूत्र दे दो, फिर हम उस पर बात करें, या उसको जस का तस मान लें। किंतु आप निरंतर स्वयं का परिशोधन करेंगे और हमसे भी वैसा करने को कहेंगे तो इसमें हमें असुविधा है। मनुष्य का मन मूलत: प्रमाद में रहना चाहता है।

समाजवादी चिंतक किशन पटनायक ने एक किताब लिखी है- “सम्भावनाओं की तलाश।” यह सूत्रधार प्रकाशन, कांचड़पाड़ा से आई है। किताब तो मैंने पढ़ी नहीं, किंतु गांधीवादी विचारक अरविंद मोहन ने उसका जो रिव्यू किया है, वो देख रहा था। उसमें एक बिंदु ने मेरा ध्यानाकर्षण किया। किशन पटनायक ने लिखा है कि 1930 के पहले के गांधी और 1930 के बाद के गांधी में बड़ा अंतर है। 1940 आते-आते तो मनुष्यता की उनकी धारणाएं और व्यापक हो रही थीं और जातीय जड़ताएं टूट रही थीं। किसी भी प्रबुद्ध के जीवन की यह स्वाभाविक गति है।

वर्तमान परिस्थिति में क्या अधिक स्वीकार्य है, यह व्यवहारवादी दृष्टि, आप चाहें तो समझौतावादी दृष्टि भी कह सकते हैं, गांधी में उनकी तमाम हठधर्मिताओं के बावजूद हमेशा थी। वे राष्ट्रीय नेता थे और पूर्वग्रह के आधार पर चल नहीं सकते थे। ख़िलाफ़त आंदोलन का समर्थन उन्होंने उसी के वशीभूत होकर किया। उनके सामने प्रश्न था कि औपनिवेशिकता के विरुद्ध संघर्ष में हिंदुस्तानियों को एकजुट करूं या तुर्क कैलिफ़ैट के विरुद्ध संघर्ष में ब्रिटिश सत्ता का साथ दूं? उन्होंने पहला वाला विकल्प चुना। यों भिन्न परिस्थितियों में वे एकाधिक बार ब्रिटिश सत्ता के पक्ष का समर्थन कर चुके थे, विशेषकर दोनों विश्व युद्धों में। जब दक्षिण अफ्रीका में थे, तब बोअर युद्ध में ब्रिटिश सत्ता का पक्ष-समर्थन करके अपने विरोधियों को चौंका चुके था। आत्मकथा में उन्होंने लिखा है कि “अलबत्ता मेरी सहानुभूति बोअरों के साथ थी, लेकिन ऐसे मामलों में व्यक्तिगत विचारों के अनुसार काम करने का अधिकार मुझे अभी प्राप्त नहीं हुआ है। जब मैं ब्रिटिश सत्ता की प्रजा के नाते नागरिक-अधिकार मांग रहा हूं तो ब्रिटिश राज की रक्षा में हाथ बंटाना भी मेरा धर्म है।” गांधी के भीतर इस तरह की जटिलताएं आपको उनके सम्पूर्ण जीवन-प्रसंगों में मिलेंगी। वो अपनी तात्कालिक नैतिकताओं का पुनर्सीमन करते रहते थे।

मेरा मत है कि 1920 के ख़िलाफ़त आंदोलन के समय उनके सम्मुख 1947 का चित्र स्पष्ट नहीं था। यदि होता तो वे दुविधा में पड़ जाते। उन्होंने भाईचारे की संस्कृति को अधिक मूल्यांकित कर लिया था। ठीक वैसे ही, जैसे सविनय अवज्ञा को उन्होंने अधिक मान लिया था। चौरी-चौरा ने उन्हें तुरंत अपना निर्णय बदलने की सुविधा दी। 1947 तक बहुत देरी हो चुकी थी। रिचर्ड एटेनबरो की फ़िल्म विभाजन के बाद वाले गांधी को एक टूटे हुए व्यक्ति की तरह दिखाती है, जिनको यह लगता था कि वे ग़लत साबित हुए हैं और अपना पूरा जीवन जिन मूल्यों के लिए उन्होंने लड़ाई लड़ी, वे अंतत: निर्मूल सिद्ध हुए। उनका भरोसा डिग गया था।

मकरंद परांजपे की पुस्तक “द डेथ एंड आफ़्टरलाइफ़ ऑफ़ गांधी” को पढ़ने का प्रयास इधर इसीलिए किया था कि गांधी की मृत्यु और उत्तरजीविता के प्रसंगों को और समझ सकूं। मकरंद परांजपे जेएनयू से आने वाली विरल मेधा हैं और विचारधारागत कट्‌टरता के उस धाराप्रवाह में संश्लेष के द्वीप की तरह उपस्थित होते हैं। गांधी-टैगोर पर उनकी स्थापनाएं सुंदर हैं। उनकी पुस्तक से कुछ और विचार लेकर पाठकों के सम्मुख आऊंगा, अगर अवसर मिला। ऊपर ख़िलाफ़त आंदोलन और ब्रिटिश सत्ता के प्रति गांधी के रुख़ का वर्णन किया है। अपनी यूरोप यात्रा के दौरान गांधी मुसोलिनी से भी मिले थे। हिटलर को उन्होंने ख़त लिखे थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सभाओं में भी वे वक्ता की हैसियत से सम्मिलित हुए हैं। गांधी को समझने के लिए एक व्यापक और मुक्त दृष्टि चाहिए।

दो खंडों में प्रकाशित “प्रार्थना-प्रवचन” का अध्ययन इसीलिए आवश्यक है, क्योंकि वह गांधी के जीवन के अंतिम कालखंड के वक्तव्य हैं, और स्वयं गांधी के निर्देशानुसार हमें उनके उत्तरोत्तर कथनों को ही अधिक प्रमाणभूत मानना चाहिए। यों, उनकी जीवन-दृष्टि की निरंतरता तो हमें “दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास” से लेकर “हिन्द स्वराज” और “सत्य के प्रयोग” तक में बदस्तूर मिलती रहती है और गांधी ने भी “हिन्द स्वराज” के परवर्ती संस्करणों में यह कहा था कि इसमें मुझे अधिक रद्दोबदल नहीं करना है, इसे ऐसे ही छाप दीजिए।

किशन पटनायक ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि गांधी की परिवर्तनकामी विचार-शैली जिन्ना को हैरान करती थी, जो उन्हें लीग के सम्मुख एक रामनामी हिंदू की तरह स्थापित करके मुस्लिमों का भयादोहन करना चाहते थे। यह सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों को भी तंग करती थी, जो चाहकर भी गांधी को भारतविद्वेषी मार्क्सवादियों के साथ एक कोष्ठक में नहीं डाल सकते थे और हिंदूद्रोही नहीं बतला सकते थे। नेहरू, पटेल, आम्बेडकर, टैगोर – इन चारों को गांधी के प्रति अपनी तात्कालिक अधीरता को तजकर देर-सबेर उनके प्रति सदाशय होना पड़ा था। गांधी की अनेक प्रतिभाओं में से एक यह भी थी कि वे आपमें ग्लानि का प्रकटीकरण करने में अत्यंत सक्षम थे। गांधी का प्रतिकार करने वाले हर व्यक्ति के भीतर समय-समय पर वे ग्लानियां प्रकट होती रहती हैं।

मैं इधर रुक-रुककर गांधी को पढ़ रहा था। गांधी-साहित्य विपुल और वैविध्यपूर्ण है। उनका जीवन भी अत्यंत घटनाप्रधान रहा। मेरी तो इतनी क्षमता नहीं कि गांधी का मूल्यांकन कर सकूं। भला किसकी हो सकती है? गांधी-शोध में पूरा जीवन खपा देने वाले रामचन्द्र गुहा जैसे व्यक्ति ही जब गांधी-विचार के संश्लेष को चूक जाते हैं तो औरों का क्या कहें। किंतु अन्य बातों के साथ गांधी की न्यूनतावादी दृष्टि मुझे आकृष्ट करती है। गांधी आज संसार के लिए प्रासंगिक हों या न हों, उस वक़्त के भारत के लिए अवश्य प्रासंगिक थे, जो गांवों में रहता था। आज भी भारत के गुणसूत्र आमूलचूल बदल नहीं गए हैं, आभासी यथार्थ ऊपर से चाहे जितनी चमकीली जटिलताएं उसमें रच दें। जिस संसार में सबों ने अपनी-अपनी विचारधाराएं और राजनीतियां सुस्पष्ट कर ली हैं और वे पहले ही निर्णयों पर पहुंच चुके हैं, वहां गांधी के ये सत्य के परिवर्तनकामी प्रयोग मूल्यवान हैं। आशा की जानी चाहिए कि गांधी-जन्मोत्सव के 150 साल पूरे होने पर हम एक अधिक गम्भीर दृष्टि से उनका मूल्यांकन करने के लिए प्रवृत्त होंगे, और उनके प्रति अपने सुपरिचित राग-द्वेष को अंतत: तिलांजलि दे देंगे।

(नोटः यह लेखक के निजी विचार हैं। इसके लिए किसी भी प्रकार की विवाद की स्थिति में फोरम4 जिम्मेदार नहीं होगा)

About the Author

राम बिश्नोई
लेखक जेएनयू के छात्र हैं।

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