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एक बदरिया

तस्वीरः गूगल साभार

आयी आयी मोर नगरिया

झूठ बोलती एक बदरिया

गड़ गड़ की ध्वनि रही सुनाती

पर न बरसी वो इह डगरिया ।

 

छायी बनकर घुँघराली सी

लगती कितनी मतवाली सी

कजरारे से नयन दिखाकर

सज घजकर वह चली सँवरिया ।

 

बदरों के संग रही घूमती

शुभ्र – ज्योति सी ओढ़ चुनरिया

भरने चली सलिल सागर तट

कर में रीती लिये गगरिया ।

 

जन जन में है आस जगायी

पानी अंजुली भर न लायी

इठलाती वह रही शशी से

बिन बरसे ही उड़ी बदरिया ।

About the Author

डॉ रीता सिंह
असिस्टेंट प्रोफेसर, एनकेबीएमजी (पीजी) कॉलेज , चन्दौसी, उत्तर प्रदेश।

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