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“राष्ट्रीय आंदोलन के नायकों पर झूठी सियासत कर रही सरकार”

नई दिल्ली। हरिजन सेवक संघ में नेशनल मूवमेंट फ्रंट के तत्वावधान में 15-16 जुलाई को दो दिवसीय शिविर का आयोजन हुआ। इस कार्यक्रम को आयोजित करने की मुख्य वजह देश का आजादी की लड़ाई के असली नायकों और उनके उद्देश्यों को समाज में खासकर युवाओं के बीच अग्रसारित करना है। यह शिविर राष्ट्रीय आन्दोलन फ्रंट नेतृत्व के कस्टोडियन नामक चुनिन्दा सदस्यों के लिए दिल्ली के किंग्सवे कैंप स्थित गाँधी आश्रम में आयोजित हुआ। कार्यक्रम में प्रख्यात इतिहासकार प्रो. मृदुला मुखर्जी, प्रो. आदित्य मुखर्जी,  प्रो. सुचेता महाजन, गांधीवादी व पूर्व सांसद रामजी सिंह, गांधी स्मारक निधि के अध्यक्ष रामचंद्र राही, सर्वसेवा संघ के पूर्व अध्यक्ष अमरनाथ भाई तथा दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के शिक्षक संगठन एकेडेमिक्स फ़ॉर एक्शन एंड डेवलपमेंट के चेयरमैन प्रो. आदित्य नारायण मिश्रा समेत अन्य लोग मौजूद रहे।

देशभर में वैचारिक-सांस्कृतिक जागरण और रचनात्मक कार्यक्रमों के विस्तार का अभियान

आज़ादी के बाद वैचारिक-सांस्कृतिक जागरण के साथ-साथ देश भर में रचनात्मक और सेवा कार्यक्रमों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू हुआ यह एक बिरल प्रयास है। इस प्रयास में बुद्धिजीवी, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, रंगकर्मी, संस्कृतिकर्मी, छात्र-छात्राएं सभी वर्ग शामिल हैं। राष्ट्रीय आन्दोलन फ्रंट गाँधी, नेहरु, भगत सिंह, मौलाना आज़ाद, सरदार पटेल, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, खान अब्दुल गफ्फार खान, अम्बेडकर सहित तमाम क्रांतिकारी, समाजवादी, किसान और आदिवासी नेताओं को अपनी प्रेरणा मानता है। फ्रंट का नारा है कि देश को बनाने और सजाने का काम करने के लिए निःस्वार्थ सेवकों की एक ऐसी पीढी तैयार करनी है जो देश भर में अपने महानायकों के सपने का भारत बनाने का अभियान छेड़ दे। इसलिए अतीत की बुनियाद पर वर्तमान के निर्माण की इस मुहीम का नारा है— देश है तो हम हैं देश नहीं तो हम कहाँ?

अब गरीब के लिए शिक्षा नहीं रहेगी!

शिविर में देश के विभिन्न राज्यों से आए सदस्यों को संबोधित करते हुए इतिहासकार प्रो मृदुला मुखर्जी ने कहा कि गांधीजी सहित आज़ादी की लड़ाई को लेकर जो झूठ प्रचारित किया जा रहा है, उसका मुकाबला करने के लिए राष्ट्रीय आन्दोलन फ्रंट आज के समय की जरूरत है। उन्होंने जातिवाद, दलित राजनीति, छुआछूत आदि मसलों का जिक्र करते हुए गांधी के काम को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत पर बल दिया।
इतिहासकार आदित्य मुखर्जी ने कहा कि अभी तक गरीब के पास एक ही रास्ता रहता था कि वह अपने बच्चों को पढ़ालिखा कर रोजी रोटी में लगा दे। लेकिन सरकार शिक्षा का बजट लगातार घटा रही है। वह जान बूझकर सार्वजनिक शिक्षा को खत्म कर रही है। उन्होंने एक निजी यूनिवर्सिटी का हवाला देते हुए कहा कि वहां बीए करने के लिए तीन साल में बच्चे को 21 लाख रुपए देने पड़ रहे हैं। यानी अब गरीब के लिए शिक्षा नहीं रहेगी वहीं दूसरी ओर जिस संस्थान का अभी अस्तित्व ही नहीं है उसे देश के उम्दा संस्थानों में शामिल किया जा रहा है और उसे बड़े पैमाने पर धन भी देने की तैयारी है।

प्रधानमंत्री की प्राथमिकता में शिक्षा व्यवस्था है ही नहीं
दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक नेता आदित्य नारायण मिश्रा का कहना था कि जब अडानी- अम्बानी के हाथ में शिक्षा व्यवस्था चली जाएगी तो देश की शिक्षा व्यवस्था का गला दब जाएगा। उन्होंने देश के पहले प्रधानमंत्री पंडितजवाहर लाल नेहरू के शिक्षा क्षेत्र में किए गए योगदान को मौजूदा प्रधानमंत्री से तुलना की। साथ ही बताया कि मौजूदा प्रधानमंत्री की प्राथमिकता में शिक्षा व्यवस्था है ही नहीं। इसके लिए उन्होंने गुजरात में लागू किए गए उच्च शिक्षा बिल का हवाला दिया जिसमें अधिकांश अधिकार सरकार के पास हैं।
गांधीवादी मूल्यों में अटूट विश्वास रखने वाले पूर्व सांसद रामजी सिंह ने कहा कि यह ऐसा समय है। जिसमें गांधीवादी मूल्यों को खारिज करने का प्रयास हो रहा है। गांधीवादी रामचन्द्र राही ने कहा कि मौजूदा समय में फासीवादी नीतियों से ज्यादा सरकार के कथित विकासवादी एजेंडे से लड़ने की जरूरत है। वह ज्यादा हानिकारक है। हरिजन सेवक संघ के अध्यक्ष शंकर सान्याल ने गांधी की नीतियों को बढ़ाने पर जोर दिया। इसी के साथ पहले सत्र का समापन हो गया।
दूसरे सत्र में हमारे काम से जुड़ी चुनौतियां और इतिहास का सही परिप्रेक्ष्य विषय पर बोलते हुए इतिहासकार सुचेता महाजन ने कहा कि आज फासीवादी ताकतें राष्ट्रीय आंदोलन के नायकों को अपने पाले में कर रही हैं। पटेल को वह अपना नायक मानने का ढ़ोंग कर रही हैं और गांधी को भी अपने पाले में लाने के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं। नेहरू को खारिज करने की मुहिम के जोरदार मुक़ाबले की सलाह देते हुए उन्होनें कहा कि ऐसे समय में हम सभी को एकजुट रहने की जरूरत है।
पत्रकार व लेखक अरुण त्रिपाठी का कहना था कि ऐसा लग रहा है जैसे आज हमारे महापुरुषों का दंगल कराया जा रहा है। इसमें गांधी को सबसे बड़ा अन्यायी साबित करने का प्रयास किया जा रहा है।

आजादी की लड़ाई से उपजे मूल्यों का पालन करने का लिया संकल्प
दो दिवसीय शिविर में भाग लेने वाले लोगों ने संकल्प लिया कि वे आजादी की लड़ाई से उपजे मूल्यों का पालन करेंगे, भारत को सुखी, सुंदर और शोषणमुक्त देश बनाएंगे, न ही गलत करेंगे और न ही गलत सहेंगे तथा देशभर में वैचारिक-सांस्कृतिक नव जागरण और रचनात्मक कार्यक्रमों का प्रचार-प्रसार करेंगे।

Disclaimer: इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं। किसी भी विवाद के लिए फोरम4 उत्तरदायी नहीं होगा।

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