सहायता करे
SUBSCRIBE
FOLLOW US
  • YouTube
Loading

शिक्षा के नाम पर गरीब देश के साथ हो रहा मजाकः प्रो. आदित्य मुखर्जी

दिल्ली विश्वविद्यालय के जुबली हॉल में सोमवार को भारत में उच्च शिक्षा के मुद्दे पर व्याख्यान का आयोजन किया गया। व्याख्यान में डूटा के पूर्व अध्यक्ष डॉ. आदित्य नारायण मिश्रा, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अदित्य मुखर्जी और जामिया मिलिया इस्लामिया में जेटीए के पूर्व सचिव प्रोफेसर तबरेज़ आलम ख़ान को मुख्य वक्ता के तौर पर आमंत्रित किया गया था। इस अवसर पर जुबली हॉल के एलुमिनाई और राजधानी कॉलेज के राजनीतिक विज्ञान विभाग के प्रोफेसर राजेश कुमार झा भी मौजूद थे।

कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों को स्मृति चिह्न देकर किया गया। विश्वविद्यालयों के कई शिक्षकों ने भी कार्यक्रम में शिरकत की। कार्यक्रम में उच्च शिक्षा से जुड़े कई आयामों पर चर्चा की गई। देश में शिक्षा की दयनीय स्थिति के कारणों और परिणामों पर भी गौर फ़रमाया गया। कार्यक्रम में मौजूद वक्ताओं ने अपने अनुभव स्वतंत्र रूप से साझा किए।

मुझे खुशी है कि जुबली हॉल ने यह विषय उठायाः प्रोफेसर आदित्य मुखर्जी

प्रोफेसर मुखर्जी ने जुबली हॉल छात्र संघ के सदस्यों की प्रशंसा करते हुए कहा, मुझे खुशी है कि आपने इस विषय को उठाया। उन्होंने इस बात पर भी खुशी जताई कि सरकार द्वारा जेएनयू को राष्ट्र-विरोधी घोषित कर देने के बावजूद भी उन्हें बोलने के लिए आमंत्रित किया गया।

उन्होंने अपने व्याख्यान में शिक्षा और गरीबी के बीच संबंध पर बात की। उन्होंने गरीबी की परिभाषा पर प्रश्न उठाया। उन्होंने कहा कि गरीबी की परिभाषा संभ्रांत वर्ग ने बनाई है। इस परिभाषा के बारे में गरीब क्या सोचते हैं। इस संदर्भ में किए गए एक सर्वे का उन्होंने ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि सर्वे में 99 फीसद लोगों ने कहा कि गरीबी का अर्थ यह नहीं है कि मुझे खाने को नहीं मिल रहा, बल्कि गरीबी का अर्थ मुझे अनपढ़ मानकर नीच समझना है। उनका कहना था कि वे शिक्षा न प्राप्त कर पाने के कारण समाज में बेहतर जगह नहीं बना सके हैं। शिक्षा के नाम पर गरीब देश के साथ मजाक हो रहा है।

उन्होंने नेहरू के दौर की शिक्षा पद्धति की बात करते हुए कहा कि नेहरू ने भारत में आधुनिक शिक्षा की सही व्यवस्था स्थापित की। उन्होंने कहा कि हम लोकतंत्र की बात धर्मनिरपेक्षता के बिना नहीं कर सकते। राष्ट्र-राज्य और राष्ट्रवाद की बात करते हुए उन्होंने समझाया कि भारत ने विश्व को पश्चिम से भिन्न एक अलग राष्ट्रवाद की धारणा प्रदान की है जो एक धर्म और एक भाषा पर बल देने की बजाए अनेक धर्म और अनेक भाषाओं की बंधुता पर बल देता है, लेकिन मौजूदा सरकार इसके विपरीत कार्य कर रही है। वह एक धर्म और एक भाषा वाली पश्चिम की राष्ट्रवादी अवधारणा को भारत में स्थापित करके देश को फिर से उपनिवेश बनाने का ही काम कर रही है।

उन्होंने स्कूलों में पढ़ाई जा रही पाठ्यपुस्तकों पर भी प्रश्न खड़ा किया। उन्होंने गुजरात की पाठ्यपुस्तकों का उदाहरण देते हुए कहा कि उनमें हिटलर का गुणगान किया गया है। उन्होंने कहा कि सरकार बेहतर शिक्षा देने में नाकामयाब रही है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि हमारे 75% इंजीनियर बेरोजगार हैं।

विश्वविद्यालय के निर्णय लेने की शक्ति छिन रही है

डॉ. आदित्य नारायण मिश्रा ने कहा विश्वविद्यालय ज्ञान अर्जित करने का स्थान है। यह तीन आयामों पर काम करता है- ज्ञान का सृजन, ज्ञान का व्यवस्थापन और ज्ञान का वितरण। इनका संचालन विश्वविद्यालय का निर्णायक ढांचा करता हैं। मौजूदा सरकार विश्विद्यालय के इस ढांचे में परिवर्तन कर विश्विद्यालय की ज्ञान की प्रक्रिया में अवरोध उत्पन्न कर रही है। उन्होंने कहा कि वह विश्विद्यालय के निर्णय लेने की शक्ति पर अंकुश लगा रही है। साथ ही शिक्षा संस्थानों के निजीकरण को बढ़ावा देकर समाज के एक बहुत बड़े वर्ग से शिक्षा का अधिकार छीन रही है। उन्होंने कहा कि केन्द्रीय विश्विद्यालयों को भी सरकार से कोई मदद नहीं मिल रही है। ऐसे में राज्य पर आश्रित विश्वविद्यालय की स्थिति तो और भी ख़राब है। उच्च शिक्षा के आधुनिक ढांचे को पूरी तरह तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय 1922 के जिस एक्ट से बना था उसमें अंग्रेंजों ने भी दख़ल नहीं दिया लेकिन मौजूदा सरकार उसमें दख़ल दे रही है।

उन्होंने विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जाने वाले शिक्षकों की दयनीय स्थिति की भी बात की। उन्होंने कहा कि हालात यह है कि एक पीएचडी किया हुआ शिक्षक भी कम वेतन पर पढ़ा रहा है। बिहार में शिक्षक महज़ छ: से सात हज़ार रुपये के वेतन पर पढ़ा रहे हैं। गुजरात के एक शिक्षक का ज़िक्र करते हए उन्होंने कहा कि वे जब रिटायर हुए तो उन्हें महज़ दो चीज़ें मिली-एक पुष्प-वृंद और एक शाल। जीवनयापन के लिए उन्हें किसी प्रकार की पेंशन प्राप्त नहीं थी।

उच्चा शिक्षा सामाजिक बदलाव का माध्यम है

जुबली हॉल के एलुमिनाई रहे राजधानी कॉलेज के प्रोफेसर राजेश कुमार झा ने भी अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने शिक्षा को सामाजिक बदलाव का माध्यम कहा। उन्होंने कहा कि इसीलिए उच्च शिक्षा पर हमले किए जाते हैं।

उन्होंने कहा कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय जब विश्वविद्यालय और शिक्षा पर निर्णय लेने हेतु सुझाव समिति बनाता है तो उसमें निजी शिक्षा संस्थानों के विद्वानों को बुलाया जाता है। सरकारी शिक्षा संस्थानों के विद्वानों को नहीं बुलाया जाता। यह शिक्षा के निजीकरण का एक अहम कारण है।

यही नहीं, निजी शिक्षा संस्थानों को सरकारी शिक्षा संस्थानों से ज़्यादा आसानी से सहायता प्राप्त हो जाती है। जियो विश्वविद्यालय, जिसका मकसद सामाजिक प्रगति नहीं है, उसे आसानी से 800 एकड़ ज़मीन प्राप्त हो जाती है। इस विश्वविद्यालय को मान्यता दिलवाने के लिए यूजीसी के नियमों में बदलाव तक कर दिया जाता है। ऐसे में स्पष्ट है कि सरकार शिक्षा का निजीकरण कर शिक्षा का व्यावसायीकरण कर रही है।

सभी वक्ताओं के व्याख्यान के बाद कार्यक्रम में आए विद्यार्थियों ने उनसे प्रश्न भी किए। प्रश्नकाल के बाद जुबली हॉल के अध्यक्ष चंदन कुमार ने कार्यक्रम में आए सभी वक्ताओं और श्रोताओं का शुक्रिया अदा करते हुए उच्च शिक्षा पर अपने विचार साझा किए और आगे भी इस तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जाने की बात कही।

-सुकृति गुप्ता 

Disclaimer: इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं। किसी भी विवाद के लिए फोरम4 उत्तरदायी नहीं होगा।

Be the first to comment on "शिक्षा के नाम पर गरीब देश के साथ हो रहा मजाकः प्रो. आदित्य मुखर्जी"

Leave a comment

Your email address will not be published.


*