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सारागढ़ी दिवस – जिंदगी जीना सिखाती है 21 सिखों की जांबाज कहा

तस्वीरः गूगल साभार

सोशल मीडिया पर एक भावुक कर देने वाला संदेश काफी शेयर किया जा रहा है। इसे लिखा है जाने-माने फिल्म अभिनेता रणदीप हुड्डा ने, जिस पर उनके फैंस दिल खोलकर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। 12 सितंबर की सुबह रणदीप ने ट्वीट किया- “1897… 10000 के खिलाफ केवल 21 सिख… यह एक निश्च‍ित मौत थी, लेकिन विपरीत परिस्थ‍ितियों के बावजूद एक ऐसा फैसला जिसमें दुश्मनों को पीठ न दिखाकर उनसे साढ़े 6 घंटे तक लड़ना एक बहुत बड़े फैसले को दर्शाता है। जो बोले सो निहाल…सत श्री अकाल….”

कुछ ऐसा ही ट्वीट फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार ने भी किया। “36 सिख रेजीमेंट के बहादुरों को मेरी श्रद्धांजलि, 10000 के खिलाफ केवल 21 लोग जिनका बलिदान इतिहास के पन्नों और हमारे दिलों में हमेशा अंकित रहेगा।  दरअसल साल 1897 में सारागढ़ी किले में 10 हजार अफगान सैनिकों के खिलाफ 21 सिख सैनिकों ने जंग लड़ी थी। हर साल 12 सितंबर को 36 सिख रेजिमेंट इन वीर शहीदों की याद में सारागढ़ी दिवस मनाती है। अक्षय कुमार और रणदीप हुड्डा ने सारागढ़ी की इस लड़ाई का फिल्मांकन किया है।

सारागढ़ी का क़िला पाकिस्तान के उत्तर पश्चिम सीमांत क्षेत्र के कोहाट ज़िले में करीब 6000 फ़ीट की ऊँचाई पर है। ये वो इलाका है जहाँ रहने वाले लोगों पर आज तक किसी सरकार का नियंत्रण नहीं हो पाया है। 1880 के दशक में अंग्रेज़ों ने यहाँ पर तीन चौकियाँ बनाईं जिसका स्थानीय औरकज़ई लोगों ने ज़बरदस्त विरोध किया, जिसकी वजह से अंग्रेज़ों को वो चौकियाँ खाली करनी पड़ी। 1891 में अंग्रेज़ों ने वहाँ दोबारा अभियान चलाया. रबिया खेल से उनका समझौता हुआ और उन्हें गुलिस्ताँ, लॉक्हार्ट और सारागढ़ी में तीन छोटे क़िले बनाने की अनुमति मिल गई। लेकिन स्थानीय औरकज़ई लोगों ने इसे कभी पसंद नहीं किया। वो इन ठिकानों पर लगातार हमले करते रहे ताकि अंग्रेज़ वहाँ से भाग खड़े हों। 3 सितंबर 1897 को पठानों के बड़े लश्कर ने इन तीनों क़िलों को घेरने की कोशिश की लेकिन कर्नल हॉटन ने किसी तरह हालात को संभाल लिया। लेकिन 12 सितंबर को औरकज़ईयों ने गुलिस्ताँ, लॉकहार्ट और सारागढ़ी तीनों क़िलों को घेर लिया और लॉक्हार्ट और गुलिस्ताँ को सारागढ़ी से अलग-थलग कर दिया। सारागढ़ी लड़ाई पर बहुचर्चित किताब ‘द आइकॉनिक बैटिल ऑफ़ सारागढ़ी’ लिखने वाले ब्रिगेडियर कंवलजीत सिंह बताते हैं, “हवलदार ईशेर सिंह ने अपने जवानों को आदेश दिया कि गोली न चलाई जाए और पठानों को आगे आने दिया जाए और उन पर तभी फ़ायरिंग की जाए जब वो 1000 गज़ यानी उनकी ‘फ़ायरिंग रेंज’ में आ जाएं।” “सिख जवानों के पास सिंगल शॉट ‘मार्टिनी हेनरी 303’ राइफ़लें थीं जो 1 मिनट में 10 राउंड फ़ायर कर सकती थीं। हर सैनिक के पास 400 गोलियाँ थी, 100 उनकी जेबों में और 300 रिज़र्व में। उन्होंने पठानों को अपनी राइफ़िलों की रेंज में आने दिया और फिर उन्हें चुन-चुन कर निशाना बनाना शुरू कर दिया।” पहले एक घंटे में ही पठानों के 60 सैनिक मारे जा चुके थे और सिखों की तरफ़ से सिपाही भगवान सिंह की मौत हो चुकी थी और नायक लाल सिंह बुरी तरह से घायल हो चुके थे।  पठानों का पहला हमला नाकामयाब हो गया. वो बिना किसी मक़सद के इधर-उधर दौड़ने लगे लेकिन उन्होंने सिखों पर गोली चलानी बंद नहीं की। तभी उत्तर की तरफ़ से चलने वाली तेज़ हवा से पठानों को बहुत मदद मिल गई. उन्होंने घास में आग लगा दी और उनकी लपटें क़िले की दीवारों की तरफ़ बढ़ने लगीं। धुएं का सहारा लेते हुए पठान क़िले की दीवार के बिल्कुल पास चले आए. लेकिन सिखों का निशाना ले कर की जा रही सटीक फ़ायरिंग की वजह से उन्हें पीछे हटना पड़ा। उस बीच सिख ख़ेमे में भी घायलों की संख्या बढ़ती जा रही थी. सिपाही बूटा सिंह और सुंदर सिंह वीर गति को प्राप्त हो चुके थे। सिग्नल मैन गुरमुख सिंह लगातार कर्नल हॉटन को सांकेतिक भाषा में बता रहे थे कि पठान एक और हमला करने की तैयारी कर रहे हैं और हमारी गोलियाँ ख़त्म होने लगी हैं। कर्नल ने जवाब दिया, अंधाधुंध गोलियाँ न चलाई जाएं. जब आप बिल्कुल निश्चित हों कि गोली दुश्मन को लगेगी, तभी उन्हें चलाया जाए. हम कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरह कुछ मदद आप तक पहुंचाई जाए। अमरिंदर सिंह अपनी किताब ‘सारागढ़ी एंड द डिफ़ेंस ऑफ़ द सामना फ़ोर्ट’ में लिखते हैं, “लॉकहार्ट क़िले से रॉयल आयरिश राइफ़ल्स के 13 जवानों ने आगे बढ़ कर सारागढ़ी पर मौजूद जवानों की मदद करनी चाही।” “लेकिन उन्हें तुरंत अहसास हो गया कि उनकी संख्या इतनी कम है कि अगर वो उन पर 1000 गज़ की दूरी से भी फ़ायर करेंगे, पठानों पर इसका कोई असर नहीं होगा।” अगर वो और क़रीब जाएंगे तो पठानों की लंबी नालों वाली ‘जिज़ेल’ और चुराई गई ली मेटफ़ोर्ड राइफ़लें उन्हें आसानी से अपना निशाना बना लेंगी. वो अपने क़िले वापस लौट गए।” ये सब हो ही रहा था कि दो पठान मुख्य क़िले के दाहिने हिस्से की दीवार के ठीक नीचे पहुंचने में सफल हो गए। अपने तेज़ छुरों से उन्होंने दीवार की नेह और नीचे के पत्थरों के पलास्टर को उखाड़ना शुरू कर दिया। इस बीच ईशेर सिंह अपने चार लोगों को क़िले के मुख्य हॉल में ले आए जब कि वो खुद ऊपर से फ़ायरिंग करते रहे। लेकिन पठान क़िले की दीवार के निचले हिस्से में सात फ़ीट बड़ा छेद करने में सफल हो गए। ब्रिगेडियर कंवलजीत सिंह बताते हैं, “पठानों ने एक और तरकीब निकाली. उन्होंने चारपाइयों को अपने सिर पर उठाया और उसकी आड़ ले कर आगे बढ़ने लगे ताकि सिख उन्हें देख कर निशाना न लगा पांए. उन्होंने क़िले की बनावट में एक नुख़्स का फ़ायदा उठाया।” “वो एक ऐसे कोण पर पहुंच गए जहाँ ऊपर से क़िले में छेद करते समय उन्हें कोई देख नहीं सकता था. फ़ोर्ट गुलिस्ताँ के कमांडर मेजर दे वोए अपने ठिकाने से ये सब होते हुए देख रहे थे”। “उन्होंने सारागढ़ी के जवानों को इस बारे में सिग्नल भी भेजे, लेकिन सिग्नल मैन गुरमुख सिंह लॉकहार्ट से आ रहे सिग्नलों को पढ़ने में व्यस्त थे, इसलिए इन सिग्नलों की तरफ़ उनका ध्यान ही नहीं गया। लांस नायक चांद सिंह के साथ मुख्य ब्लॉक में तैनात तीन जवान साहिब सिंह, जीवन सिंह और दया सिंह मारे गए। जब चांद सिंह अकेले रह गए तो ईशेर सिंह और उनके बाकी के साथी अपनी रक्षण ‘पोज़ीशन’ को छोड़कर उनके पास मुख्य ब्लॉक में आ गए। ईशेर ने हुक्म दिया कि वो अपनी राइफ़लों में संगीन लगा लें. जो भी पठान उस छेद से अंदर घुसा, उस पर राइफ़लों से या तो सटीक निशाना लगाया गया, या उसे संगीन भोंक दी गई। लेकिन बाहर किनारों पर कोई सिख तैनात न होने की वजह से पठान बांस की बनी सीढ़ियों से ऊपर चढ़ आए। हॉटन ने देखा कि पठान क़िले की दीवार फलांग चुके हैं और क़िले के मुख्य दरवाज़े में आग लगी हुई है. हॉटन को अंदाज़ा हो गया कि अब सारागढ़ी गिर चुका है।” सिग्नल की व्यवस्था देख रहे गुरमुख सिंह ने अपना आख़िरी संदेश भेजा कि पठान मुख्य ब्लॉक तक पहुंच आए हैं। उन्होंने कर्नल हॉटन से सिग्नल रोकने और अपनी राइफ़ल संभालने की इजाज़त माँगी. कर्नल ने अपने आखिरी संदेश में उन्हें ऐसा करने की इजाज़त दे दी। गुरमुख सिंह ने अपने हेलियो को एक तरफ़ रखा, अपनी राइफ़ल उठाई और मुख्य ब्लॉक में लड़ाई लड़ रहे अपने बचे खुचे साथियों के पास पहुंच गए। तब तक ईशेर सिंह समेत सिख टुकड़ी के अधिकतर जवान मारे जा चुके थे. पठानों की लाशें भी चारों तरफ़ बिखरी पड़ी थीं। उनके द्वारा बनाया गया छेद और जल चुका मुख्य द्वार पठानों की लाशों से अटा पड़ा था. आख़िर में नायक लाल सिंह, गुरमुख सिंह और एक असैनिक दाद बच गए। बुरी तरह ज़ख्मी होने के कारण लाल सिंह चल नहीं पा रहे थे, लेकिन वो बेहोश नहीं हुए थे और एक स्थान पर गिरे हुए ही लगातार राइफ़ल चला कर पठानों को धराशाई कर रहे थे।गैरबराबरी की ये लड़ाई करीब 7 घंटे तक चली, जिसमें सिखों की तरफ़ से 22 लोग और पठानों की तरफ़ से 180 से 200 के बीच लोग मारे गए. उनके कम से कम 600 लोग घायल भी हुए। इसमें 36 सिख रेजिमेंट के आखिरी जवान ने भी जान देकर लड़ाई जारी रखी। बाद में अंग्रेजों ने भले ही पठानों को हरा दिया, लेकिन मदद पहुंचने तक इन 21 सिख रणबांकुरों ने जो किया इसके लिए ब्रिटिश संसद का स्टैडिंग ओवेशन दिया। इसी दिन की याद में 12 सितंबर को सारागढ़ी दिवस मनाया जाता है।  

नोटः लेख में लेखक के निजी विचार हो सकते हैं। 

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विकास पोरवाल
पत्रकार और लेखक

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