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संडे-मंडे की छुट्टी मनाता रहा शहरी वोटर

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हरियाणा व महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव सोमवार को संपन्न हो गए। शाम 6 बजे तक की चली वोटिंग में जहां हरियाणा में 61.72 प्रतिशत वोट पड़े तो वहीं महाराष्ट्र में महज 55 फीसदी वोट ही पड़ सके। इलाके वार वोट प्रतिशत पर नजर डाली जाए तो साइबर सिटी कहलाने वाले गुरुग्राम में वोट प्रतिशत कम रहा तो वहीं महाराष्ट्र में भी शहरी इलाकों में कम ही वोटिंग देखने को मिली। वोटिंग का यह कम प्रतिशत अन्य पार्टियों के लिए सिरदर्द तो है ही भाजपा के लिए और भी निराशाजनक है जिसे शहरी वोटर से सबसे अधिक जीत की आस है।
देश के दो राज्यों हरियाणा व महाराष्ट्र में सोमवार को नई विधानसभा के लिए चुनाव हुए। इन दोनों राज्यों का जो मतदान प्रतिशत रहा उसने एक बार फिर मतदाता जागरूकता अभियानों पर सवालिया निशान लगा दिया है, साथ ही राजनीतिक विशेषज्ञों के सामने फिर से वही पुरानी बहस ताजा कर दी है। दरअसल चुनावों को लेकर यह बात हमेशा कही जाती है कि प्रत्याशी शहरी मतदाताओं को वोटिंग के लिए नहीं रिझा पाते हैं या फिर कितना भी जोर लगा लो शहर में रहने वाला मतदाता लोकतंत्र के इस पर्व को महज एक छुट्टी ही मानता है। सोमवार को महाराष्ट्र व हरियाणा के शहरों में यह स्थिति स्पष्ट रही। शाम छह बजे तक दोनों ही प्रदेशों में मतदान का जो प्रतिशत रहा उससे फिर यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या शहरी मतदाता इस बार भी वोट डालने नहीं निकला?
गुरुग्राम जिले की चार विधानसभा सीटों पर सुबह सात बजे से दोपहर 2 बजे तक अलग-अलग माहौल देखने को मिला। यहां शहरी क्षेत्र के पोलिंग बूथ के मुकाबले ग्रामीण क्षेत्र के पोलिंग बूथ पर लंबी कतार देखने को मिली। जबकि पॉश इलाके के मतदाता एक-एक करके बूथों पर पहुंचते रहे। सबसे खास शहरी इलाके की बात करें तो डीएलएफ का उदाहरण बेहद सटीक है। यहां मतदान शुरू होने के 3 घंटे बाद तक कई बूथों पर मतदाता पहुंचे ही नहीं थे। यहां शुरुआती घंटों में वोटिंग महज 2 प्रतिशत हुई। ग्रामीण इलाकों में शुमार सोहना क्षेत्र में दोपहर दो बजे तक 36 प्रतिशत मतदान हो चुका था, जबकि गुरुग्राम में इतनी देर तक इसका ठीक आधा केवल 18 प्रतिशत ही मतदान हुआ था। कमोबेश यही हाल फरीदाबाद शहरी क्षेत्र का रहा। यहां दोपहर दो बजे तक का 17 प्रतिशत ही मतदान हो सका। डीएलएफ और फरीदाबाद दोनों ही वह इलाके हैं जहां बड़ी-बड़ी कंपनियां देश की अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करती हैं और इनमें काम करने वाला शहरी भी यहीं रहता है। मतदान प्रतिशत देखकर लगता है कि सुबह नौ से शाम पांच बजे तक की डेडलाइन मेंटेन करने वाला कामकाजी आदमी रविवार-सोमवार की छुट्टी मना गया।
सितारों की सरजमीं और मायानगरी के नाम से मशहूर मुंबई भले ही भारत की आर्थिक राजधानी है और राजनीति के भी कई समीकरण यहां से बनते-बिगड़ते हैं। लेकिन वोटिंग के मामले में बंबई नगरिया हमेशा पीछे रह जाती है। इस बार उम्मीद थी कि विधानसभा चुनाव में यहां का वोटिंग प्रतिशत सुधरेगा, लेकिन अफसोस, ऐसा नहीं हुआ। हालांकि पहले के मुकाबले में अब बॉलीवुड सितारे जमकर वोट करने आते हैं और इसके लिए अपील भी करते हैं, लेकिन इन सबके बावजूद महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में वोटिंग को लेकर सुस्ती सी छाई रही। दोपहर 3 बजे मुंबई शहर में महज 35 फीसदी वोट पड़े थे। कमोबेश इसी के आस-पास पूरे महाराष्ट्र का वोट प्रतिशत रहा। सुबह 9 बजे तक यहां महज 5 प्रतिशत वोटिंग हुई थी।
2019 मई में हुए आम चुनाव में देशभर में मतदान प्रतिशत में तेजी देखने को मिली थी। इस दौरान मुंबई में भी पहले के मुकाबले वोट प्रतिशत में काबिलेतारीफ बढ़ोतरी हुई थी। यह माना जाता था कि मुंबई ने कभी 45-50 फीसदी से अधिक वोट किया ही नहीं है, जबकि लोकसभा चुनाव-2019 में यहां 55 फीसदी वोट पड़ गए। साल 2000 से 2009 तक यहां बमुश्किल 40-45 फीसदी मतदान हुआ करते थे। ठीक इसी तरह हरियाणा के गुरुग्राम और फरीदाबाद में तेज धूप में भी मतदाताओं का उत्साह ठंडा नहीं पड़ा था। हाईराइज सोसायटियों में रहने वाला शहरी मतदाता इस दौरान सड़क पर उतरकर बूथों तक पहुंचा था। डीएलएफ जैसे पॉश इलाके में इस दौरान दोपहर 2 बजे तक ही तकरीबन 55 फीसदी वोट पड़ चुके थे, फरीदाबाद के भी कई बूथों पर शहरी मतदाताओं की लंबी कतारें देखने को मिली थीं। विधानसभा चुनाव में यह जोश कहां गया, पता नहीं
एग्जिट पोल के आकड़े भले ही कोई भी दावा करें, लेकिन इस तरह का कम मतदान प्रतिशत सभी पार्टियों के लिए नुकसानदेह साबित होता ही है। हरियाणा में कांग्रेस वैसे भी बुरी तरह बिखरी हुई है। क्षेत्रीय पार्टियां इनेलो और जेजेपी भी अपना मूल जनाधार खो चुकी हैं। इसके बाद बचती है भाजपा, जिसने पिछले विधानसभा चुनाव से गैर जाट की राजनीति का दौर शुरू किया है। भाजपा का आशातीत वोटर शहरों में ही रहने वाला है। नई भाजपा लहर को जिसने समर्थन दिया है उनमें छोटे व्यापारी, एमएनसी कर्मचारी, कॉलेज जाने वाले छात्र और मध्यम रोजगार अपनाने वाले लोग शामिल हैं। अगर यह पूरी भीड़ वोट डालने नहीं निकल रही है तो चुनावी प्रचार और नीतियों में और बदलाव की जरूरत है।

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