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एक ऐसी प्रथा जिसमें निचली जाति की महिलाओं को नहीं थी स्तन ढकने की इजाजत

तस्वीर - गूगल साभार

महिला दिवस पर विशेष : नंगेली की कहानी

आज महिला दिवस है और आज एक ऐसी महिला की कहानी बताते हैं जिसने एक ऐसी प्रथा को खत्म करने का साहस दिखाया जिसके बारे में बात करने का साहस पुरुषों में भी नहीं थी। नंगेली का नाम बहुत ही कम लोगों ने सुना होगा। उनके साहस की मिसाल अद्भुत है। हम लोगों को कम ही ऐसी कहानियों के बारे में बताया जाता है आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर हम आपके सामने एक ऐसी ही कहानी लेकर आए हैं और आप सभी से भी यही गुजारिश करते हैं कि आपको अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों के विरूद्ध खुद ही साहस दिखाना होगा क्योंकि नंगेली का साहस भी कुछ ऐसा ही था, जिसने पूरे समाज को एक हासिये पर खड़ा कर दिया।

कहाँ से है इसका संबंध

ये कहानी केरल के उस समय कि है जब त्रावणकोर में ब्राह्मण शासन था और वहाँ केवल ऊपर की जातियों को स्तन ढंकने का अधिकार था और अगर निचली जाति की महिलाएं स्तन ढकती थीं, तो उन्हें स्तन कर देना होता था। यह इसलिए किया गया था ताकि जाति के आधार पर लोग एख दूसरे को आसानी से पहचान सके और उस दौर में निचली जाति के लोग ज्यादातर खेतिहर मजदूर हुआ करते थे और उनके लिए ये कर दे पाना बहुत ही मुश्किल हुआ करता था।

क्या कहते हैं इतिहासकार

इतिहासकार डॉ.शिबा कहती हैं कि इसका मुख्य उद्देश्य जातिवाद को बनाए रखना था और इसलिए इस ब्रैस्ट टैक्स को बनाया गया था।

ब्राह्मण महिलाएं भी थी, इसमें

यहाँ तक की ब्राह्मण जातियों की महिलाओं को भी मन्दिर में अपने स्तन के ऊपर के कपड़े को हटाना होता था। लेकिन उनके साथ यह केवल मन्दिर तक था, लेकिन नीची जाति की महिलाओं को हमेशा बिना स्तन ढके हुए रहना पड़ता था।

नंगेली का विरोध

नंगेली जो कि, एड़वा जाति से थी। उसने इसका विरोध किया और खुद के स्तनों को न ढकने का फैसला ले लिया और इसके विरोध में उसे बहुत ही ज्यादा कर भरने के लिए कहा गया, जो कि असंभव था और उसने इसके विरोध में अपने स्तन काट दिए और एक पत्ते पर रखकर उन्हें पेश कर दिया और कहा जब ये स्तन ही नहीं रहेंगे, तो किस बात का टैक्स होगा और ज्यादा खून बहने से उनकी मृत्य हो गई।

पहला पुरुष जो सती हुआ

कहा जाता है कि उनके पति चिरुकंदन ने उसके दाह-संस्कार में आग पर कूद कर जान दे दी और इसे इतिहास में पहले पुरुष सती के रूप में देखा गया।

आखिरकार कर हटाना पड़ा

इस कर को मुलाकर्म कहा जाता था और नंगेली के साहस का नतीजा यह निकला कि वहां के राजा को इस कर को वापस लेना पड़ा। उन्होंने ये लड़ाई पूरे समाज के लिए लड़ी थी। उनमें अतुल्य साहस था, जिसका नतीजा यह निकला कि उन्हें अपनी जान देनी पड़ी, पर उन्होंने इस गलत कर को नहीं माना। कहते हैं कि उस समय वहां किसी पुरुष में भी इस प्रथा के विरुद्ध आवाज उठाने की हिम्मत नहीं थी, लेकिन नंगेली ने पूरी प्रथा ही बदल कर रख दी। इससे पता चलता है कि स्त्रियों में अतुल्य साहस होता है और अगर वे किसी दुराचार या किसी भी गलत अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाने पर आ जाएं, तो उन्हें कोई नहीं रोक सकता और फिर उस कुरुति को समाप्त ही होना पड़ता है।

About the Author

अनुराग मिश्रा
लेखक, सेल्फ मेड शेफ एवं स्पीकर हैं, उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक किया है

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