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ममता का मास्टरस्ट्रोक- मुख्य सचिव के तबादले मामले में आया नया मोड़!

देश की एक ही महिला मुख्यमंत्री है ममता बनर्जी और उनको लेकर मोदी सरकार का रवैया अभी सुधरा नहीं है। कारण यह है कि मोदी बंगाल चुनाव हार गये औऱ हार के बाद बीजेपी पूरी तरह बौखला गई है। ममता बनर्जी की जीत मोदी सरकार को हजम नहीं हो रही है। अभी मामला पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और मोदी के बीच मुख्य सचिव के तबादले की चल ही रही थी कि दिल्ली से बंगाल तक इन्हीं उठापटक के बीच अब ममता ने नया दांव खेलते हुए मोदी सरकार की बोलती बंद कर दी है। खबर आ गई कि मुख्य सचिव के दिल्ली भेजने के केंद्र के फैसले को दरकिनार करते हुए ममता ने तीन साल के लिए उन्हें अपना मुख्य सलाहकार नियुक्त कर लिया। और मुख्य सचिव अलप्पन बंदोपाध्याय ने पद और सिविल सेवा से इस्तीफा दे दिया। यह दिखाता है कि ममता कहीं झुकती नहीं है, लेकिन बंगाल का यह संग्राम अभी यहीं रुकने वाला नहीं है, यह अभी आगे भी चलने वाला है। बात मुख्य सचिव के तबादले का जरूर है, लेकिन इससे पहले बंगाल चुनाव के बाद से हो रही और भी घटनाओं को जोड़कर देखना जरूरी है। क्यों एक प्रधानमंत्री अकेली महिला मुख्यमंत्री से भिड़ने में लगा है? और क्यों ये सब कोरोना के दूसरी लहर के बीच हो रहा है? इन सभी मामलों को समझना जरूरी है। आज हम इन्हीं पर बात करने वाले हैं।

ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री बनते ही टीएमसी के नेताओं को नारदा घोटाले में सीबीआई जांच के लिए बुला लिया गया था। लेकिन अदालत ने चारों टीएमसी नेताओं को जमानत दे दी। इस बारे में आगे हम बात करेंगे। लेकिन अभी जो विवाद चल रहा है उसे समझिये।

अब जब सभी कैबिनेट मंत्रियों ने शपथ ले ली है उसके बाद भी बीजेपी बंगाल में उथल पुथल कर रही है। ममता बनर्जी के चीफ सेक्रेटरी यानी मुख्य सचिव का अलपन बंदोपाध्याय का दिल्ली में तबादला कर दिया गया। और इसके बाद ममता के दिल्ली भेजने से इनकार के बाद मुख्य सचिव ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।

बात यह है कि अलपन बंदोपाध्याय ममता बनर्जी के खास रहे हैं और मुख्य सचिव के रूप में 31 मई को रिटायर होने वाले थे। मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद 10 मई को ममता बनर्जी ने कोरोना के कारण अलपन बंदोपाध्याय का कार्यकाल 3 महीने के लिए बढ़ाने का यानी सेवा विस्तार के लिए केंद्र को पत्र लिखा था। ममता के पत्र के आधार पर 24 मई को केंद्र ने इसकी अनुमति दे दी।

इसके बाद चक्रवाती तूफ़ान यास से हुए नुक़सान का जायज़ा लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब कलाईकुंडा एयरबेस में एक समीक्षा बैठक बुलाई।

इस बैठक में न तो मुख्यमंत्री ने हिस्सा लिया और न ही मुख्य सचिव ने।

बीजेपी ने इन दोनों पर प्रोटोकॉल के उल्लंघन का आरोप लगाया था।

ममता बनर्जी उस बैठक में क़रीब आधे घंटे की देरी से पहुंची थीं और प्रधानमंत्री को नुक़सान के बारे में रिपोर्ट सौंपकर वहां से दीघा रवाना हो गई थीं।

और इन्हीं चीजों को लेकर कि पीएम मोदी की बैठक में ममता बनर्जी देरी से क्यों पहुंची? इसे बीजेपी पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री का अपमान बताया जाने लगा। सोशल मीडिया पर ट्रेंड भी चलाया गया। और जल्दी ही यह मामला बहस का मुद्दा बन गया।

हालांकि ममता ने अपने देरी से पीएम मोदी की बैठक में पहुंचने का कारण भी बाद में बताया। ममता ने सफाई में आरोप लगाया कि वह बैठक उन्‍हें नीचा दिखाने की योजना था। ममता ने यह भी कहा कि उन्‍होंने पीएम मोदी को इंतजार नहीं कराया उलटे उन्‍हें ही पीएम से मिलने के लिए इंतजार करना पड़ा।
इसके अलावा ममता बनर्जी ने आगे कहा कि जब मुख्‍य सचिव और हम वहां पहुंचे तो देखा कि पीएम गवर्नर, केंद्रीय नेताओं और विपक्षी दल के विधायकों के साथ बैठक कर रहे थे। ममता के अनुसार बैठक केवल पीएम और सीएम के साथ होनी थी। इसलिए हमने पीएम को रिपोर्ट सौंपने का फैसला किया और दीघा के दौरे की उनसे अनुमति मांगी। यह बैठक केवल राजनीतिक बदला लेने के लिए बुलाई गई थी। ममता के अनुसार ओडिशा और गुजरात में हुई समीक्षा बैठक में तो राज्‍यपाल और विपक्ष के नेताओं को नहीं बुलाया गया था।’
इस घटना के कुछ देर बाद ही यानी 28 मई को केंद्र ने पत्र लिखकर मुख्य सचिव अलपन बंदोपाध्याय को डेपुटेशन पर 31 मई को दिल्ली पहुंचकर कार्यभार संभालने का निर्देश दिया।

ममता बनर्जी की सरकार ने अब प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर कहा है कि अलपन बंदोपाध्याय पश्चिम बंगाल में ही रहेंगे और कोविड 19 के दौरान अपनी सेवाएं जारी रखेंगे। यानी कि राज्य सरकार ने उनको रिलीज नहीं करने का फैसला किया है। इसके बाद अब राज्य सरकार और केंद्र सरकार एक तरीके से मुख्य सचिव के तबादले को लेकर अब आमने सामने है। ममता दीदी केंद्र सरकार के मुख्य सचिव के तबादले को बदले की भावना से देख रही है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजे पत्र में साफ़ कर दिया है कि मौजूदा परिस्थिति में मुख्य सचिव को रिलीज़ करना संभव नहीं है. उन्होंने इस फ़ैसले को वापस लेने, पुनर्विचार करने और आदेश को रद्द करने का भी अनुरोध किया।

इस बीच, कई पूर्व नौकरशाहों ने भी मुख्य सचिव के औचक तबादले को ग़ैर-क़ानूनी बताते हुए राज्य सरकार के रुख़ का समर्थन किया है।

इससे पहले बीते साल दिसंबर में भाजपा प्रमुख जे.पी. नड्डा के काफ़िले पर हुए हमले के बाद भी केंद्र ने अचानक तीन संबंधित आईपीएस अधिकारियों को डेपुटेशन पर दिल्ली पहुंचने का निर्देश दिया था।

लेकिन राज्य सरकार और ममता बनर्जी के अड़ जाने की वजह से वह मामला दब गया था. उस समय भी केंद्र और राज्य आमने-सामने आ गए थे।

वैसे भी चूंकि राज्य के मुख्य सचिव की नियुक्ति मुख्यमंत्री करता है, न कि उस राज्य का राज्यपाल। इसलिए मोदी सरकार के इस फैसले की आलोचना होना लाजमी था। थोड़ी देर में ही यह खबर आ गई कि पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव ने पद और सिविल सेवा से इस्तीफा दे दिया है और वे ‘टीम ममता’ से जुड़ गए हैं।  ममता बनर्जी  ने बंदोपाध्याय को तीन साल के लिए अपना मुख्य सलाहकार नियुक्त किया है। ममता ने इस फैसले के साथ साफ संकेत दिया कि वे इस सियासी टकराव के बीच झुकने वाली नहीं हैं।

हालांकि केंद्र के रुख से संकेत मिलता है कि तूफान यास को लेकर पश्चिम बंगाल में हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बैठक से ममता बनर्जी की गैरहाजिरी का मसला अभी ठंडा नहीं पड़ा है. केंद्र सरकार के सूत्रों ने कहा है कि आदेश का उल्लंघन करने के कारण बंदोपाध्याय को चार्जशीट का सामना करना पड़ेगा। एचके द्विवेदी अब बंगाल के नए मुख्य सचिव नियुक्त किए गए हैं।

ममता ने तो कहा कि यह प्रतिशोध की राजनीति है। और यह दिख भी रहा है, इसके पीछे की वजह बंगाल चुनाव ही है। इसकी भी बात सुन लीजिये।

चुनाव हारने से बीजेपी को लगा धक्का

पश्चिम बंगाल पर पीएम मोदी और उनके सरकार के सभी मंत्री, पार्टी के मुख्यमंत्री की नजर ठीक वैसे ही थी जैसे शिकार करने वाले शिकारी की हो। हर बार की तरह पार्टी ने बंगाल में हिंदुत्व की राजनीति को लेकर उतरी और हिंदू मुस्लिम सब कुछ हुआ। लगभग दिल्ली विधानसभा चुनाव की तरह बीजेपी ने अपनी रणनीति बनाई और उसी को आगे इस कदर ले गई कि मोदी अपने भाषणों में महिला के सम्मान की बातें भूल बैठे। ममता बनर्जी को ओ दीदी दीदी कहकर मोदी ने खूब मजे लिए। योगी तक ने भाषणों में बंगाल को यूपी बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। कोरोना की लहर के आने की आहट के बाद बिना मास्क के रैलियों पर रैलियां होती गईं.। बीजेपी ने टीएमसी के कई नेताओं को अपनी पार्टी में मिलाया और उन्ही में से एक सुभेंदु अधिकारी को ममता बनर्जी के खिलाफ नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र से लड़ने को छोड़ दिया। 8 चरणों के चुनाव में से लगभग हर चरणों में टीएमसी और बीजेपी कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक घटनाएं भी हुई, लोग मरे भी। । तमाम आरोप प्रत्यारोप की राजनीति के बाद चुनाव का परिणाम बीजेपी को दिल्ली विधानसभा चुनाव की तरह कुछ खास हासिल न हो सका। और किसी तरह बस ममता बनर्जी की सीट पर मुकाबला में लगभग कुछेक वोटों से बीजेपी जात गई। हालांकि यह भी विवाद का विषय है।

अब चूंकि बीजेपी को बंगाल चुनाव हारने से काफी बड़ा झटका लगा। और सबसे बड़ा झटका तो इश बात का लगा कि मोदी के नाम का लहर और सारी जोर आजमाईश यहां काम नहीं आई। लिहाजा अब तक इस तरह 10 में 4 ही विधानसभा चुनावों में बीजेपी किसी तरह से जीत सकी। और इससे बीजेपी पार्टी का पूरे देश के कोने कोने में अपनी हिंदुत्व की राजनीति को चमकाने का सपना चकनाचूर हो गया। मोदी जी ममता के तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद घबरा गये हैं। ऐसा लगता है। और यही कारण है कि आज भी बंगाल चुनाव और उसके बाद के प्रसंग बढ़ते चले जा रहे हैं।

Disclaimer: इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं। किसी भी विवाद के लिए फोरम4 उत्तरदायी नहीं होगा।

About the Author

कोमल कश्यप
कोमल स्वतंत्र रूप से पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य कर रही हैं।

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