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कोरोना कहर किसी परंपरा को बढ़ावा देने की आहट तो नहीं?

तस्वीर-गूगल साभार

कोरोना वायरस से अब तक आपने यह सुना होगा कि इससे कई लोगों की जानें चली गईं। हर पल आपको यह खबर मिल रही होगी कि संक्रमित मामलों की संख्या कितनी बढ़ी। किन राज्यों में क्या हाल है? औऱ ऐसे समय में बेहद जरूरी है कि जनता कर्फ्यू का प्रयोग और उसके आगे लॉकडाउन करने का प्रयोग। अगर आप जिंदगी से प्रेम करते होंगे तो सकारात्मक खोजकर और सरकार के हर फैसले का पालन करेंगे। खासकर ऐसे समय में जब देश में कोहराम मचा हो। नकारात्मकता हावी हो। लोग कोरोना दंश को झेलने के लिए अपनी सारी चीजों को जोखिम में डालकर घर में बैठे हैं या फिर अपने कर्तव्यों का पालन कर रहा हों। इसलिए हम कोरोना में सकारात्मकता ढूंढ़ने के लिए आपको कुछ चीजों से परिचित कराने जा रहे हैं।

थाली बजाना, ताली बजाना

प्रधानमंत्री के जनता कर्फ्यू वाले दिन 5 बजे थाली बजाने की अपील जिससे लोग जग सकें और एक दूसरे को ढांढस दे सके। निश्चित ही तमाम आलोचनाओं के बाद भी बेहद सटीक और अच्छा फैसला है। लेकिन जब इसका पालन कर रही प्रजा इसे गंभीरता से लेते हुए इसके नियमों का पालन करे तब। अब तो यह थाली बजाने वाला दिन खत्म हो गया। लेकिन इसके बाद यह जानना जरूरी भी है कि हम ऐसी स्थिति में क्यों आए औऱ कैसे आए? किसी अपने मित्र के आसपास जाकर देखिए किसी अपने परिवार के उन सद्स्यों से मिलकर देखिए जब वे अत्यंत दुख की घड़ी में होते हैं। शायद इंसानियत के नाते वह संकट की घड़ी में अपने दुश्मन तक के पास सहानुभूति प्रकट करने पहुंच जाता है। क्योंकि मृत्यु इस संसार का सत्य है और इससे बड़ी चीज क्या ही हो सकती है। इसलिए संकट की घड़ी में साथ होकर हम सब एक दूसरे का हाथ पकड़ लेते हैं और साथी की सारी बुराइयों को भूलकर साथ देने लग जाते हैं। संकट की घड़ी में चेतना जग जाती है। एकता का बोध होने लग जाता है। नफरतों का सफाया हो जाता है। हम सब हाथ पकड़ने को विवश हो जाते हैं।

और जब महामारी में प्रलय् और सुनामी पास में होती है तो निश्चित ही हम सब उस सुनामी के डर से अपने राजा के दिए आदेशों का पालन करना अपना धर्म समझते हैं। भले ही राजा मूर्ख हो। लेकिन उसके फैसले केवल उसके लिए नहीं होते वे सबके लिए होते हैं जिसके पीछे की मानसिकता को सचना जरूरी हो जाता है। इसलिए हमने देखा कि पीएम मोदी की अपील के बाद एक से बढ़कर एक तस्वीरें आईं। कहीं पर टिन सेड बजाया गया। महिलाएं थाली बजाते हुए गलियों में उतर आईं। अधिकारी अपने गुट के साथ भीड़ लेकर थाली बजाते देखे गए। भीड़ के साथ बिना मास्क के साधु संत मंदिरों से निकलकर सड़क पर घंटी बजाने निकले। कुछ लोग शंख बजाते हुए घर की बालकनी में दिखे तो कुछ भीड़ में गो कोरोना के नारे और तमाम तरह की क्रिएटिविटी के साथ म्यूजिक पर डांस करते भी दिखे। अब सवाल है कि कोरोना में भीड़ से बचना जरूरी है। एकता भी जरूरी है। लेकिन इन तमाम उदाहरणों से पता लगता है कि भीड़ के सिवा जो अलग -थलग थाली और ताली बजाते देखे गए या शंख बजाते देखे गए वो निश्चित रूप से सराहनीय काम है औऱ एकता की मिशाल कायाम करने का उदाहरण भी। सकारात्मकता का संचार करने का उदाहरण भी। मगर बाकी जो भी कुछ लोग ऐसी चीजों को इस बहाने अंजाम दिए जैसा कि ताली बजाने के लिए सड़कों पर भीड़ के साथ निकलकर आने का फिर थाली बजा बजाकर फोड़ने का वह कभी भी सुकून करने वाली खबर नहीं हो सकती। वह कभी भी सकारात्मकता का संचार नहीं करता। इसलिए आलोचना का विषय भी बना। सवाल प्रजा का है जिसने इस गंभीर अपील को मजाक में लिए, सवाल उस प्रजा का है जिसने इसे नासमझी बनाया। खैर कुल मिलाजुलाकर हमारा यही काम है कि हम उसमें सकारात्मक चीजों को ढ़ूढ़ें और तभी हम राजा के गलत से गलत निर्णयों को भी सही में ठहरा सकते हैं। अनर्थ होने से बचा सकते हैं।

अब जब थाली बजाने की बात रही हो तो बचपन के वे दिन भी याद आने स्वाभाविक हैं जिसे हम परंपरा के रूप में अभी भी कहीं-कहीं निभाकर उसी तरीके का एक संदेश समाज में दिया करते थे। मुझे याद है जब एकादशी वाले दिन हमारे बड़े बुजुर्ग गन्ने को दिन में रखते थे। और हम उस गन्ने से सूप जिसमें अनाज को छांटने के लिए फटकारने के काम में लाते हैं, को पीटने के लिए उत्सुक रहते थे। परंपरा के अनुसार ऐसे समय हम शरद ऋतु में प्रवेश करते हैं। और सुबह 4 बजे उठना होता है। मुझे याद है दादी जी सुबह 4 बजे उठती थीं। और सबसे पुराना करीब 3 साल का प्रयोग में लाया गया सूप को पीटने का काम इस दिन करती थीं। सूप पीटने के लिए नियम यह होता था कि उसे तब तक लगातार बिना रोके पीटा जाता था जब तक वह टूट-टूट कर बिखर न जाए। जब तक उसकी ध्वनि में परिवर्तन न हो जाए। हम सुबह शायद इसी दिन 4 बजे उठ पाते थे। क्योंकि इसे बजाने या पीटने में बहुत सुकून मिलता था। और हम दादी के हाथ से गन्ने का डंडा लेकर उस पर पीटते पीटते घर के कोनें कोनें में जाते थे। और कहते थे कि ‘ईश्वर आएं दलिद्दर जाएं’। यही रटना होता था इससे ईश्वर आएं या न आएं लेकिन पूरे गांव के लोग एक दूसरे के साथ मिलकर अपने अपने घरों में इस प्रयोग को दोहराते थे। ठीक उसी समय हर घर में एक सूप पीटा जाता था। उसकी ध्वनि से पता चलता था कि हर घर में लोग उठ गए हैं। सबके एक साथ इस तरह से ध्वनि पैदा करने से एकता के भाव का संचार होता था। साथ ही यह भी होता था कि लोग अपने आपको उस सकारात्मक माहौल में पाते थे जहां सुकून खूब मिलता था। और हम जैसे बच्चों के लिए वह एक खेल से कम नहीं होता था। सूप को पीटने के बाद जलाया जाता था। शायद दलिद्दरी यानी गरीबी मिट जाती थी। तभी हम दूसरा नया सूप अनाज फटकने के लिए प्रयोग में ले आते थे। तभी सूप को जलाकर उसकी आंच में खुद को उस शरद ऋतु के आगमन से अच्छा अनुभव करते थे।

कोरोना वायरस के संक्रमण समय से इस तरीके की प्रथा का चलन हो जाए औऱ नियमों के अनुरूप तो बच्चों के लिए उत्सुकता और हम सबके लिए निश्चित रूप से सकारात्मकता पैदा करने में सहयोग होगा।

वाहनों की आवाजाही बंद

लॉकडाउन की स्थिति में जब कर्फ्यू का माहौल हो देश और राज्यों की सीमाएं सील हों, रेलवे की आवाजाही बंद हो। सड़कों पर सन्नाटा हो और यातायात के हवा, जल आदि के साधनों पर रोक हो तो इससे जो कुछ मिलता है- वह है प्रदूषण मुक्त वायु, प्रकृति का अनुपम उपहार जहां चिड़ियों का बसेरा होता है। जहां संसार में प्रकृति का वास होता है। मैंने देखा कि रेल की पटरियां जहां पर चिड़ियों की चहचहाहट नहीं होती थी। वहाँ कोरोना से भीड़ की कमी के चलते उन्होंने अपने आनंद की अनुभूति को जाहिर कर दिया। जहां पर लोग चल नहीं सकते थे। वहां पर खाली जमीन देखकर एक अकेले व्यक्ति के अंदर बहुत सूकून की अनुभूति होगी। इस समय जब मेट्रों सेवाएं दिल्ली में बंद हो गई हैं तो जहां पर सफाऊ फीकी मिलती थी। वहां वहां सफाई भी हो जाएगी। जहां भी गंदगी मिलती थी। वहां साफ सफाई की वजह से वायु में ताजगी मिलेगी। वाहनों के चिल्ल पों के बीच लोगों को शांति मिलेगी। लोग इस शांति में मानसिक रूप से कुछ अच्छा सोचने का काम करेंगे। नफरतों से निकलकर साथ देने का काम करेंगे।

भले ही कम दिनों के लिए ही ऐसा प्रयोग हो रहा हो लेकिन यह सब कोरोना जैसे कहर से ही संभव हो पाया है कि वाहनों की आवाजाही रुकने से हम बैलगाड़ी और साइकिल के बारे में भी सोचने लगे हैं। हम सेहत का फैसला भी करने के लिए चलना उचित समझ रहे हैं वह भी केवल काम के अनुसार।

सामानों की खपत

ऐसे समय में जब कोरोना ने पैर पसार दिए हों तो सामानों की खरीदारी पर लगाम लगेगी। जो अन्नदाता है वहीं ऐसे समय में निपटने के लिए सक्षम हैं जो गाय और भैंस पालन में विश्वास रखता है उसे ही वायरस मुक्त दूध मिल सकता है। जो होम डिलीवरी और अन्य साधनों रेस्टोरेंट पर टिका हुआ है उसे कुकिंग करना या तो सीखना पड़ेगा या फिर वो संक्रमित होगा। इस समय जो पुरुष भी कुकिंग करते हैं उन्हें अब खुद कुकिंग करके अच्छा लगेगा। पशुपालन कितना जरूरी है इसका बोध होगा। सबसे बड़ी बात हम खुद से हर चीज करने की कोशिश में लगेंगे।

कोरोना वायरस की लड़ाई काफी लंबी है। पीएम मोदी ने ऐसा बोलकर बता दिया है कि अभी ऐसे हालात रहने के आसार हैं तो क्यों न आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ें और सोचें क्योंकि यही तो जरूरी है किसी राज्य की समृद्धि के लिए। लेकिन राज्य की समृद्धि के लिए और खुद के लिए सोचने और समझने का वक्त संकट का समय होता है। वैसे तो महापुरुषों ने बहुत कुछ इससे पहले भी कहा है लेकिन हम उनका ज्ञान बांटते हैं लेकिन पालन नहीं करते। संकट की घड़ी में हमें मजबूरन सब कुछ करना होता है। अच्छा यही है कि संकट खत्म होने के बाद भी इस दिशा में केवल सोचें न खुद को आत्मनिर्भर जरूर बनाएं।

सृजनात्मकता और मानसिक समृद्धि

अपनी सोच को विकसित करने और हर तरफ जालों में फंसने के बाद जब रफ्तार गाडियों की रुक जाए। जब भीड़भाड़ से अलग होकर खाली समय में बैठ जाएं। जब 24 घंटे मानसिक गुलामी से आजाद हो जाएं तो सृजनात्मकता जन्म लेती ही है। कोरोना वायरस के कहर के बाद लोग इस बारे में सोच रहे हैं औऱ सोचने लगे हैं। इसलिए उनमें कलात्मक जुड़ाव भी हो रहा है। सृजनात्मकता का संचार तो ऐसे समय में होगा भी। लोग नवाचार की ओर अच्छे से बढ़ते हैं। ऐसा हम देख भी रहे हैं कि लोगों ने कोरोना वायरस की वजह से घर बैठकर कलाकारी कर रहे हैं। पेटिंग्स बाना रहे हैं। जिन्हें गाना आता है वे गाना गा रहे हैं। परिवार में एक दूसरे के कामों में हाथ बंटा रहे हैं। सहयोग की भावना के साथ कुछ अच्छा करने की चाहत बढ़ रही है। जिसे जो आता है वो वही कर रहा है। कुछ लोग किताबों को पढ़ रहे हैं। कुछ लोग धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन कर रहे हैं। जिसको जो काम सूझ रहा वो उसी में लगा है।

पलायन करने की समझ

हमने देखा लोगों ने अफवाहों के चलते ही सही जल्दी-जल्दी घर की ओर जाना उचित समझा। हालांकि ये देर से लिया गया फैसला रहा। लेकिन शहरों से निकलकर गांव की ओर जाने का मतलब यही है कि असली समृद्धि तभी आती है जब लोग गांव की ओर पलायन करें। हालांकि यह अल्पकालिक हो सकता है लेकिन एक बड़ा संदेश भी है कि हमे कभी न कभी गांवों की ओर रुख करना ही होगा। हमें अपनी मिट्टी से खेतों से जुड़ना ही होगा। अपने घरों को साफ-सुथरा बनाकर रखना होगा। अपने परिवेश में गंदगी से बचाव करना होगा। हर किसी को जागरूक करने का प्रयास करना होगा। पशुपालन और खेती से आत्मनिर्भर भी बनना होगा।

खैर ऐसी तमाम चीजें हैं जो किसी वजह से परंपरा के रूप में बनी हैं। संकट की यह भी घड़ी किसी परंपरा को बढ़ाने में काम कर सकता है। हो सकता है हम आगे स्वच्छता के लिए केवल मास्क लगाना और सैनिटाइज करना ही सीख सकें पर यह आहट जरूर है कि हम इसके सकारात्मक चीजों की ओर बढ़ें और लोगों को जागरुक करें। लेकिन यह बहुत मुश्किल घड़ी तब जरूर होगी जब हम इससे उबरने के बाद इससे सीखे हर सवाल का उत्तर न खोज पाएं और इसे भाग्य पर छोड़ कर कुछ भी परंपरा का निर्वाह न करें।

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प्रभात
लेखक फोरम4 के संपादक हैं।

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