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लेखिका अनीता वर्मा का स्कूल में सरकारी नौकरी से लेकर विदेश में पढ़ाने तक का पूरा सफर 

दिल्ली में जन्मीं अनीता वर्मा का लगााव बचपन से ही साहित्य लेखन से रहा है। कविता लेखन के अलावा कहानी लेखन भी किया और दिल्ली दूरदर्शन केन्द्र में टेलीविजन कार्यक्रम के एंकर के तौर पर भी सक्रिय रही अनीता ने नवभारत टाइम्स, दैनिक हिंदुस्तान, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी में लंबे समय तक स्वतंत्र पत्रकारिता की।

प्रस्तुत है राजीव कुमार झा के साथ अनीता वर्मा की बातचीत का अंश-


प्रेम में तल्लीन स्त्री विलास नहीं थी
नहीं था उसका प्रेम सुख की चिरैया सा
कि कभी यहाँ तो कभी दूर गगन में
हरदम दमकते लुनाई से भरे चेहरे से
स्त्री बन गयी खजुराहो प्रेम में
पर फिर भी देह नहीं थी वो
रीतता नहीं था प्रेम उसका कभी
जाते जाते भी उसने कहा था उसको
बर्फ हो जाये देह तो भी महसूस करना मुझको
रोम-रोम में बसे प्रेम के हर अणु को
भरा था उसने तभी सासों में अपनी
बन गयी थी वो देह वल्लरी उसी क्षण
अमर कर दिया था प्रेम कणों से उसको…

लेखिका के जीवन के विभिन्न पड़ाव 

बाल्यकाल वो अवस्था होती है, जिसमें हमारे सम्पूर्ण जीवन की नींव डाली जाती है। हमारी पीढ़ी के अधिकतर बच्चों का बाल्यकाल पुस्तकें पढ़ने व खेलने में ही बीतता था। 1960 में दिल्ली के मध्यमवर्गीय सामान्य परिवार में जन्म हुआ। पिता ट्रांसपोर्ट में नौकरी करते थे। मैट्रिक पास थे पर कबीर, रहीम व बुल्ले शाह सब हर समय उनकी ज़ुबान पर रहता था। मॉं का जीवन में बहुत बड़ा योगदान रहा। मॉं बहुत ही सुघड़, सिलाई कढ़ाई व पाककला में प्रवीण महिला तो थी हीं, मैट्रिक के साथ-साथ हिन्दी में प्रभाकर भी थीं। तीन छोटे भाई और मैं सबसे बड़ी एक ही बेटी। पूरे परिवार की दुलारी। दिल्ली में प्रारंभिक शिक्षा हुई। घर के पास एक जैन स्थानक की लाईब्रेरी में पत्र पत्रिकाओं से पढ़ने की शुरूआत हुई तो बस फिर लत सी लग गई । उन्हीं दिनों पिता की नौकरी जाती रही तो काम की तलाश में हम सब कानपुर चले गए। वहाँ पर तो बस किताबों का जैसे चस्का सा लग गया। कॉमिक्स से लेकर कक्षा आठ तक पहुँचते पहुँचते हर किताब हर लिफ़ाफ़े को जिसमें सामान आता था पढ़ते ही थे। किराए पर कॉमिक्स, जासूसी नॉवल, गुलशन नन्दा, चन्दामामा, नंदन कोई भी पत्रिका उपलब्ध हो पढ़नी ही होती थी। अच्छे बुरे का कोई अंतर नहीं था। किसी के भी घर जाती तो ढूँढती कि कहीं कुछ पढ़ने को मिल जाये।

नौवीं कक्षा में फिर से एक बार कानपुर छोड़ कर लुधियाना जाना पड़ा। पंजाब का अलग तरह का परिवेश। उन्हीं दिनों पंजाब में पंजाबी (गुरमुखी) पढ़ना और लिखना सीखा। तब पंजाबी साहित्य को भी पढ़ना शुरू किया और तभी लिखना भी शुरू किया। अच्छे और बुरे का अन्तर भी समझ आने लगा। साहिर, अमृता प्रीतम, शिव कुमार बटालवी, शिवानी, शरतचन्द्र, रवीन्द्र नाथ टैगोर सभी को पढ़ना शुरू किया। पर रुझान कविता की तरफ़ ही रहा।

फिर से एक बार दिल्ली वापिस आना पड़ा। ये आपातकाल के बाद का साल था। पिता कई महीनों तक लापता रहे। जब वापिस आए तो बहुत बीमार थे। पता चला कि जेल में बंद थे। कहीं पर बैठे हुए अपने फक्कड़पन में कबीर और बुल्ले शाह को लोगों को सुना रहे थे और नज़रबंद कर दिये गये। यह दौर बहुत कठिनाई का दौर था। पंजाब में रहते हुए मैंने कविता भाषण प्रतियोगिताओं में भाग लेना शुरू कर दिया था। वो प्रेम कविताओं का दौर था। बाद में दिल्ली यूनिवर्सिटी में लक्ष्मीबाई कॉलेज से स्नातक की डिग्री हासिल की। बस तब खुल कर लिखना पढ़ना, बोलना और अपनी बात कहने का हुनर सीखा। नाटकों का सिलसिला भी जारी रहा।

उन्हीं दिनों अज्ञेय से बहुत प्रभावित हुईं और उनसे मुलाक़ातें भी हुई। दिन में कालेज, शाम को ट्यूशन और रात को कविताएँ पढ़ना और लिखना। बस यही जीवन था। बीस साल की उम्र में शादी और शादी से पहले पिता का देहान्त। दुख और सुख दोनों के समानान्तर चलते हुए आगे की पढ़ाई शादी के बाद भी चलती रही। पहले बेटा, फिर बेटी, उनकी पढ़ाई, अपना अध्ययन और फिर साथ ही ट्यूशन पढ़ाना और इन सब के बीच लिखना। पता नहीं कैसा जज़्बा था। जीवन में थोड़ा संघर्ष तब कम हुआ जब स्कूल में सरकारी अध्यापिका की नौकरी मिल गई। अब जीवन थोड़ा पटरी पर आ गया था। तब तक मैंने एमए, एमएड व पत्रकारिता में डिग्री भी ले ली थी। रेडियो व दूरदर्शन के कई कार्यक्रम भी मिलने शुरू हो गये।

समाचार पत्रों में कई कालम मिल गये। कई पुस्तकें भी प्रकाशित हो गई। बाद में कुछ वर्षों बाद भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद ने दो बार विदेशों में भी पढ़ाने भेजा। मेरी कविताओं का अनुवाद अंग्रेज़ी, पंजाबी, रशियन, अरमीनीयन में हुआ। उन दिनों की दिल्ली की बात करें तो दिल्ली यूनिवर्सिटी का वो दौर ऐसा था जिसमें सभी तरह की साहित्यिक गतिविधियाँ अपने चरम पर थी। नुक्कड़ नाटक, जनआंदोलन, रैलियाँ, परिवर्तन व जनसंवाद सब कुछ तो तभी शुरू हुआ था। सीधा सादा जीवन और परिवार, समाज व देश के अलावा कुछ भी और नहीं सूझता था। ये वो समय भी था जब दहेज विरोधी कई आन्दोलन शुरू हुए। तभी मेरी शादी की बात चली तो मैंने तब भी अपनी बात रखी और बिना किसी फ़िज़ूल खर्ची के लगभग पैंतीस लोगों की उपस्थिति में दिन का शादी बिना दहेज के हुई। पति व ससुराल वालों ने ना केवल उस समय मेरा साथ दिया बल्कि बाद में जब मैंने पढ़ाई पूरी करने की बात कही तो किसी ने नहीं रोका।

हालाँकि बच्चों की देखभाल में मेरी मॉं और भाइयों ने पूरा सहयोग दिया। उस समय पंसदीदा साहित्यकारों में शिवानी, अमृता प्रीतम , साहिर लुधियानवी व पंजाबी में बलवंत गार्गी थे। पर धीरे धीरे समय के साथ अज्ञेय, धूमिल, केदारनाथ सिंह, जगदीश चतुर्वेदी पसंदीदा कवि बन गये। मेरी बाद की कविता संग्रह में इनका प्रभाव भी पड़ा।

कविता सृजन में कवि विभिन्न तरह के रचनाकर्म से गुजरता है। कभी संघर्ष के दौर में जीवन जीने की ज़िद्द वाली कविताओं का सृजन तो कभी प्रेम में डूबे हुए क्षणों की वो कविता जो प्रेम के संसार में सदैव कुछ नवीन सा तलाशती। कभी स्वयं से जुड़ना तो कभी घर परिवार पति पत्नी के सम्बन्ध पर लिखना। लिखते वक़्त कभी यह नहीं सोचा कि सब क्या लिख रहें हैं या कैसी कविताओं का दौर चल रहा है। रचनात्मक समय के साथ बदलती रहती है। ऐसा ही मेरे साथ भी हुआ। आरंभिक दौर की कविताएँ स्वानुभूति की कविताओं का दौर था। बाद में स्वर बदलने लगा। बीच बीच में विद्रोह के स्वर भी मुखर हुए। एक दौर वो भी था जब कुछ समाचार पत्रों के लिये साहित्यकारों का साक्षात्कार किया। उन्हीं दिनों डॉ नामवर सिंह, जगदीश चतुर्वेदी, राजेंद्र यादव, कन्हैया लाल नंदन, बलदेव वंशी, डॉ महीप सिंह, कमलेश्वर, उद्भ्रांत जैसे लेखकों के साथ कई मुलाक़ातें हुई। उनके साक्षात्कार बहुत पसन्द किये गये। आम लोगों ने भी उनके बारे में जाना। ये तब हुआ जब लगभग सभी समाचार पत्र व्यवसायिक हो चुके थे और किसी को भी साहित्यकारों में रुचि नहीं थी। बाद में मैंने उन सभी साक्षात्कारों को पुस्तक रूप में उनके रेखाचित्रों के साथ संकलित करके पुस्तक रूप में प्रकाशित किया। बातें-मुलाक़ातें बहुत चर्चा में आया। लोकार्पण डॉ नामवर सिंह , पद्मा सचदेव व कन्हैयालाल नंदन ने किया।

तब से अब तक लेखन का स्वरूप निरंतर बदल रहा है। समय के साथ बदलता भी है पर अब लेखन व्यावसायिक हो रहा है। पुरस्कार की स्पर्धा, बिकने और दिखने की दौड़ में लेखन के आधारभूत तत्व पीछे छूटते जा रहे हैं। सब कुछ ख़रीदने और बेचने के सिद्धान्त पर आधारित है। पैसे लेकर पुस्तक प्रकाशित की जाती है। इन सब के बीच यह भी सुखद है कि इंटरनेट की क्रांति के रहते कई और माध्यमों से भी साहित्य सामने आ रहा है। साहित्य लेखन से इतर मंच संचालन से लम्बे समय से जुड़ी हूँ। कई बड़े कार्यक्रमों का संचालन, रेडियो व टेलीविजन पर कई सालों तक कार्यक्रम संचालन किया है। कई डॉक्यूमेंटरी फ़िल्मों में वॉइसओवर भी किया है। कुछ जनचेतना की फ़िल्मों का निर्देशन व अभिनय भी किया है।

विदेश में अध्यापन के दौरान कई नए अनुभव हुए। अंग्रेज़ी के माध्यम से हिन्दी पढ़ाना अपने आप में कठिन कार्य था। पर कुल मिलाकर वहाँ भी सृजन क्रम चलता रहा। भारत और भारतीयता के लिये विदेशों के मन में एक विशेष सम्मान को ना केवल अनुभव किया बल्कि अपने लेखन में उसे हर पल महसूस करते हुए लिखा जो गंगनाचल पत्रिका में क्रमवार प्रकाशित भी हुए। अरमीनिया प्रवास जहां सुखद स्मृतियों से जुड़ा हुआ था वहीं रोमानिया में वीज़ा और यूरोपीय देश की पीड़ादायक सरकारी औपचारिकताओं से गुजरना पड़ा। छात्राओं के साथ सभी अनुभव सुखद व रोचक रहे। भारत व हिन्दी के प्रति उनका प्रेम, उनके साथ साहित्य चर्चा, कार्यक्रम व नाटकों का लेखन मंचन चिर स्मरणीय है। प्रवास के दौरान दो कविता संग्रह आए। भारत में आकर एक कहानी संग्रह भी आया। आजकल लघुकथाओं के लेखन में व्यस्त हूँ। कई वेबसाइटों पर और समाचारपत्रों में लघुकथाएं छप रही हैं। लॉक – अनलॉक नाम से एक लघुकथाओं की पुस्तक प्रकाशित होने वाली है।

फिलहाल आप अनीता वर्मा की यह रचना पढ़ सकते हैं। 

कमल खिलता रहेगा
बढ़ती ही जा रही है नदी में तादाद मगर मच्छों की
सांस ले सकते है तो बिच्छु सांप और केकड़े
जो जानते हैं चुभना चिपकना और डसना
बढ़ता ही जा रहा है नदी में कीचड़
हर दिन हर रोज़ दंभ और सक्ता के नशे का
जी सकते हैं वही जो रहना जानते हैं
नदी के भीतर भी और बाहर भी
पर उस नन्ही मछली का क्या
जो एक पल है भी और नहीं भी
और उस नन्हे मेंढक का क्या
जिसकी आवाज़ गूंजती है
नक्कारखाने में तूती की तरह
इस सब के बीच कमल का खिलना ही
सच है इस कीचड़ से भरी नदी का

About the Author

राजीव कुमार झा
बिहार के लखीसराय जिले के बड़हिया के इंदुपुर के रहने वाले राजीव कुमार झा स्कूल अध्यापक हैं। हिंदी और मास कॉम से एमए कर चुके राजीव लेखक, कवि और समीक्षाकार भी हैं।

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