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अमेरिका में हो रहे रंगभेद के विरुद्ध आंदोलनों से लोहिया के सपनों का विश्व बनने का उम्मीद!

रंगभेद का इतिहास पुराना है। पश्चिमी जगत में अश्वेतों को एक लंबी सामाजिक- राजनीतिक लड़ाई लड़नी पड़ी। अभी हाल में एक अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड को गोरे पुलिस अधिकारी द्वारा मार डालने के फलस्वरूप अमेरिका रंगभेद/नस्लभेद के खिलाफ हो रहे आंदोलनों से सुलग रहा है। ऐसे में डॉ. लोहिया का रंगभेद के विरुद्ध संघर्ष और चिंतन याद आ जाना स्वाभाविक है। लोहिया ने 1964 में मिसीसिपी, अमेरिका के एक रेस्तरां में नस्लभेद के खिलाफ सत्याग्रह करके गिरफ्तारी दी थी।

वास्तव में डॉ. राममनोहर लोहिया का चिंतन बहुआयामी है जिसे संक्षेप में उनकी सप्तक्रांतियों की अवधारणा से समझा जा सकता है। वे सप्त क्रांतियों के जरिए समाज में व्याप्त सात विभेदों को समाप्त करने की बात करते हैं। उनकी सप्त क्रांतियाँ थी –

  1. नर-नारी की समानता के लिए।
  2. चमड़ी के रंग पर रची राजकीय, आर्थिक और दिमागी असमानता के विरुद्ध।
  3. संस्कारगत, जन्मजात जातिप्रथा के ख़िलाफ़ और पिछड़ों को विशेष अवसर के लिए।
  4. परदेसी ग़ुलामी के ख़िलाफ़ और स्वतन्त्रता तथा विश्व लोक-राज के लिए।
  5. निजी पूँजी की विषमताओं के ख़िलाफ़ और आर्थिक समानता के लिए तथा योजना द्वारा पैदावार बढ़ाने के लिए।
  6. निजी जीवन में अन्यायी हस्तक्षेप के ख़िलाफ़ और लोकतंत्री पद्धति के लिए।
  7. अस्त्र-शस्त्र के ख़िलाफ़ और सत्याग्रह के लिये।

लोहिया की उक्त सप्तक्रांतियों को देखने से स्पष्ट है कि वे लिंगभेद के विरुद्ध क्रांति के दूसरे ही बिंदु पर रंगभेद के विरुद्ध क्रांति का आह्वान करते हैं और उसके बाद जाति-भेद, वर्ग-भेद, भाषा-भेद और शस्त्र-भेद के विरूद्ध क्रांति की बात करते हैं।

यह भारतीय राजनीति की विडम्बना ही है कि लोहिया के निधन के बाद मुख्यधारा की राजनीति में जातिभेद का उन्मूलन और पिछड़ों का उत्थान मुख्य मुद्दे के रूप में उभरा और लोहिया चिंतन के अन्य पक्ष गौण होते गए। उत्तर-लोहियावादी राजनीति में जातिभेद के उन्मूलन का केंद्र में होना स्वाभाविक ही है क्योंकि भारतीय सामाजिक संरचना में जाति ऊपर से नीचे तक विद्यमान है और सर्वाधिक वंचना लिंग के बाद जाति आधारित ही है। यह देखना सुखद है कि लोहिया के राजनीतिक- वैचारिक वारिस अब जातिभेद उन्मूलन के साथ साथ लिंगभेद और रंगभेद के खात्में के लिए प्रतिबद्ध नजर आ रहे हैं। समाजवादी पार्टी के संस्थापक माननीय नेताजी श्री मुलायम सिंह यादव के नवीनतम भाषणों (पिछले दो वर्षों के) में बार बार अपने कार्यकर्ताओं को लिंगभेद और रंगभेद के खात्मे के लिए भी संघर्ष करने का आह्वान देखा जा सकता है।

भारत में रंगभेद और लिंगभेद, जातिभेद के जितना ही मजबूत है। और तो और रंगभेद जाति और वर्ग के अंदर भी अपनी जड़ें जमाए हुए है। भारतीयों को त्वचा की रंगत के आधार पर मुख्यतः चार कोटियों में विभाजित किया जा सकता है- व्हाइट/सफेद(अत्यधिक गोरे), भूरे/गेहुँए, साँवले, काले। इस भेद को विवाह और प्रेम संबंधों की निर्मित में स्पष्ट देखा जा सकता है। भारतीय समाचारपत्रों के वैवाहिक कॉलम में जातिभेद और रंगभेद की विद्रूपता को प्रत्येक दिन देखा जा सकता है। लोहिया का मानना था कि कृष्ण और कृष्णा (द्रौपदी) श्यामवर्णीय भारतीय चरित्रों के ऐसे उदाहरण है जो अपनी सुदंरता और सौरभ में बेजोड़ है। लोहिया अपनी पुस्तक ‘द्रौपदी तथा सावित्री’ में लिखते हैं- “शायद दो हजार वर्ष पूर्व साँवली स्त्री सुंदरता की अधिक प्रतीक थी, वनस्पति गोरी स्त्री के; मैं तो बारम्बार यही कहता हूँ- ‘तन्वी श्यामाय गरिमा..।’ अर्थात साँवली स्त्री माने नवजवान और खूबसूरत स्त्री। श्यामा नि:संदेह बड़ी होती हैं।”  लोहिया ने अपनी एक अन्य पुस्तक ‘इंटरवल ड्युरिंग पॉलीटिक्स’ में भी रंगभेद पर भारतीय संदर्भ में विचार किया है- “काले रंग की हमेशा उपेक्षा नहीं हुई है, कम से कम भारत में नहीं। संस्कृत साहित्य में श्यामा का अर्थ है सुंदर स्त्री। ईश्वर के पुरूष अवतार राम और कृष्ण भी श्यामवर्णीय है। भारतीय पुराण की सबसे महान स्त्री का रंग काला था। द्रौपदी ने, जिसे कृष्णा भी कहा जाता है, ने बहुत उपेक्षा सही क्योंकि वर्तमान पुरुष दंभ उसके पाँच पतियों या एक या दो दार्शनिक पुरुष प्रसंगों को स्वीकार नहीं कर पाया।” वास्तव में डॉ. लोहिया का श्यामवर्णीय द्रौपदी को इतना अधिक महत्व देने का, कि उसे भारतीय नारियों से आदर्श मानने का आह्वान करना, कारण यह है कि उन्हें चमचमाती गोरी त्वचा से अधिक स्वाभिमानी और बौद्धिक नारी आकृष्ट करती है। शायद इसीलिए लोहिया कहते हैं कि ‘आज के समय में भारतीय नारी की आदर्श सीता-सावित्री नहीं बल्कि द्रोपदी होनी चाहिए।’

डॉ. लोहिया अफ्रीका, अमेरिका और यूरोप में हो रहे अश्वेतों पर अत्याचार को भली-भाँति उद्घाटित करते हैं। लोहिया जी ने 1964 में मिसीसिपी, अमेरिका के एक रेस्तरां में नस्लभेद के खिलाफ सत्याग्रह करके गिरफ्तारी दी थी। लोहिया ने लिखा है- “आज संसार में अफ्रीका जैसे देशों में जिस प्रकार के अत्याचार तथा अन्याय वहाँ के अश्वेतों के साथ किया जा रहा है, वह सम्पूर्ण सभ्यता पर कलंक है। दक्षिण अमेरिका तथा अमेरिका में ऐसी आबादियाँ है, जहाँ गोरे लोगों के बीच काले लोगों का प्रवेश निषिद्ध माना जाता है। अश्वेतों को पूर्णरूपेण मानवाधिकारों से वंचित रखा गया है।” लोहिया जी के इस कथन से स्पष्ट है कि वे रंगभेद को न सिर्फ भारतीय बल्कि वैश्विक संदर्भों में देखा है। रंगभेद जिस रूप में लोहिया जी के समय था, वैसा ही आज भी विश्व में अपने आपको ढकता- छिपाता निर्लज्जतापूर्वक विद्यमान हैं। लोहिया के सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टिकोण को प्रचारित प्रसारित करने की जरूरत है जहाँ वे बौद्धिक सौंदर्य (इंटलेक्चुअल ब्यूटी) तथा आत्मनिर्भरता(सेल्फ डेपेन्डेन्सी) को त्वचा के रंग से अधिक महत्व देते हैं।

अमेरिका में हो रहे रंगभेद के विरुद्ध आंदोलनों से एक नयी उम्मीद बनी है कि अमेरिका ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व में रंगभेद के विभेदों की हर स्तर पर समाप्ति होगी और डॉ. लोहिया के सपनों का विश्व आकार ले सकेगा।

About the Author

पवन कुमार यादव
परास्नातक छात्र , दिल्ली विश्वविद्यालय

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