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वीडियो- सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आने पर अयोध्या में क्या बदलने जा रहा?

अयोध्यावासियों के लिए ही नहीं पूरे भारत के लिए एक अहम खबर है। राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद पर 9 नवंबर सुबह 10:30 बजे सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ जाएगा। इस फैसले को लेकर बीजेपी घर-घर दीप जलाकर मनाने की तैयारी भी कर रही है। पहले अनुमान लगाया जा रहा था कि 7 नवंबर से 16 नवंबर के बीच फैसला आ सकता है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में राम जन्म भूमि विवाद की सुनवाई में शामिल मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई 17 नवंबर को रिटायर हो रहे हैं। बेंच ने 40 दिन तक हिंदू और मुस्लिम पक्ष की दलीलें सुनने के बाद 16 अक्टूबर को अंतिम सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ जाता है तो 9 नवंबर की तारीख एक ऐतिहासिक दिन साबित होगा। क्योंकि यह विवाद काफी लंबे समय से (करीब सौ साल से ज्यादा) चला आ रहा है। इस विवादित मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई में पांच जजों की संविधान पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। इस पीठ में जस्टिस रंजन गोगोई (चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया), जस्टिस शरद अरविंद बोबड़े (एसए बोबड़े), जस्टिस धनंजय यशवंत चंद्रचूड, जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस अब्दुल नज़ीर शामिल हैं। अब देखना ये है कि जजों का फैसला बहुमत के हिसाब से आ रहा है या फिर पांचों जजों की सहमति से होगा।

आदेश को देखते हुए पूरे देश में चाक चौबंद और सुरक्षा के कड़े इंतजाम

फैसले को देखते हुए 13 अक्टूबर को ही जिलाधिकारी अनुज झा ने अयोध्या में धारा 144 लगाई थी। हालांकि अयोध्या में आने वाले दर्शनार्थियों और दीपावली महोत्सव पर धारा 144 का कोई असर नहीं हुआ और अब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले सोमवार तक के लिए उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और कर्नाटक के गडग में सरकार ने सभी स्कूल और कॉलेज बंद रखने का फैसला लिया है। जम्मू-कश्मीर में भी धारा 144 लागू कर दी गई है।

9 नवंबर के लिए गृह मंत्री अमित शाह ने भी सारे सरकारी कार्यक्रम रद्द कर दिए हैं। साथ ही सोशल मीडिया पर 1600 वॉलेंटियर के जरिए निगरानी रखी जाएगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ट्वीट कर कहा है कि अयोध्या पर कल सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आ रहा है। पिछले कुछ महीनों से सुप्रीम कोर्ट में निरंतर इस विषय पर सुनवाई हो रही थी, पूरा देश उत्सुकता से देख रहा था। इस दौरान समाज के सभी वर्गों की तरफ से सद्भावना का वातावरण बनाए रखने के लिए किए गए प्रयास बहुत सराहनीय हैं।

अब अयोध्या में सुरक्षा के इंतज़ाम और भी बढ़ा दिये गये हैं। अभी वहां पर सुरक्षाकर्मी की 47 कंपनियां तैनात हैं। अयोध्या जिले को चार जोन- रेड, येलो, ग्रीन और ब्लू में बांटा गया है, जिनमें 48 सेक्टर बनाए गए हैं। विवादित परिसर, रेड जोन में स्थित है। अयोध्या पर फैसले को देखते हुए रेलवे पुलिस (आरपीएफ) ने सभी जोन कार्यालयों को प्लेटफॉर्म, स्टेशन और यार्ड पर खास निगरानी रखने को कहा है। भीड़भाड़ वाले 78 स्टेशनों पर सुरक्षा बढ़ाने को कहा गया है, जिनमें मुंबई, दिल्ली, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के स्टेशन शामिल हैं।

 

क्या है पूरा मामला

अयोध्या जोकि राम की जन्मभूमि मानी जाती है। कहा जाता है कि मुगल राजा बाबर के सेनापति मीर बाकी ने यहां मस्जिद बनवाई थी, जिसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता था। यह मस्जिद वर्ष 1528 से 1530 में बनाई गई।

1528 में मस्जिद का निर्माण करवाया गया, जिसे बाबरी मस्जिद का नाम दिया गया। हिंदू मान्यता के अनुसार इसी जगह पर भगवान राम का जन्म हुआ था।

1853 में हिंदुओं का आरोप कि भगवान राम के मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण हुआ। इस विवाद पर दोनों पक्षों के बीच हिंसा हुई।

1859 में ब्रिटिश सरकार ने तारों की एक बाड़ खड़ी करके विवादित भूमि के आंतरिक और बाहरी परिसर में मुस्लिमों और हिदुओं को अलग-अलग प्रार्थना करने की इजाजत दी।

1885 में मामला पहली बार अदालत पहुंचा। महंत रघुबर दास ने फैजाबाद कोर्ट से बाबरी मस्जिद के पास ही राम मंदिर निर्माण की इजाजत मांगी।

23 दिसंबर 1949 में करीब 50 हिंदुओं ने मस्जिद के केंद्रीय स्थल पर कथित तौर पर भगवान राम की मूर्ति रख दी। इसके बाद उस स्थान पर हिंदू नियमित पूजा करने लग गए और मुसलमानों ने नमाज पढ़ना बंद कर दिया।

16 जनवरी 1950 में गोपाल सिंह विशारद ने फैजाबाद अदालत में एक अपील दायर कर रामलला की पूजा-अर्चना की विशेष इजाजत मांगी।

5 दिसंबर 1950 में महंत परमहंस रामचंद्र दास ने हिंदू प्रार्थनाएं जारी रखने और बाबरी मस्जिद में राममूर्ति को रखने के लिए मुकदमा दायर किया। मस्जिद को ‘ढांचा’ नाम दिया गया।

17 दिसंबर 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने विवादित स्थल हस्तांतरित करने के लिए मुकदमा दायर किया।

18 दिसंबर 1961 में उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड ने ढांचे के मालिकाना हक के लिए मुकदमा दायर किया।

1984 में विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) ने बाबरी मस्जिद के ताले खोलने और राम जन्मस्थान को स्वतंत्र कराने व एक विशाल मंदिर के निर्माण के लिए अभियान शुरू किया। इसके लिए एक समिति का गठन किया गया।

1 फरवरी 1986 में फैजाबाद जिला न्यायाधीश ने विवादित स्थल पर हिदुओं को पूजा की इजाजत दी। ताले दोबारा खोले गए। नाराज मुस्लिमों ने विरोध में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन किया।

जून 1989 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने वीएचपी को औपचारिक समर्थन देना शुरू करके मंदिर आंदोलन को नया स्वरूप दिया।

1 जुलाई 1989 में भगवान रामलला विराजमान नाम से पांचवा मुकदमा दाखिल किया गया।

9 नवंबर 1989 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने बाबरी मस्जिद के नजदीक शिलान्यास की इजाजत दी।

25 सितंबर 1990 में बीजेपी अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक रथ यात्रा शुरू की, इस दौरान साम्प्रदायिक दंगे हुए।

नवंबर 1990 में आडवाणी को बिहार के समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया गया। बीजेपी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया।

अक्टूबर 1991 में उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह सरकार ने बाबरी मस्जिद के आस-पास की 2.77 एकड़ भूमि को अपने अधिकार में ले लिया।

6 दिसंबर 1992 में हजारों की संख्या में कारसेवकों ने अयोध्या पहुंचकर ढांचे को ढहा दिया। इसके बाद सांप्रदायिक दंगे हुए। जल्दबाजी में एक अस्थायी राम मंदिर बनाया गया।

16 दिसंबर 1992 में मस्जिद की तोड़-फोड़ की जिम्मेदार स्थितियों की जांच के लिए लिब्रहान आयोग का गठन हुआ।

जनवरी 2002 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने कार्यालय में एक अयोध्या विभाग शुरू किया, जिसका काम विवाद को सुलझाने के लिए हिंदुओं और मुसलमानों से बातचीत करना था।

अप्रैल 2002 में अयोध्या के विवादित स्थल पर मालिकाना हक को लेकर उच्च न्यायालय के तीन जजों की पीठ ने सुनवाई शुरू की।

मार्च-अगस्त 2003: इलाहबाद उच्च न्यायालय के निर्देशों पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अयोध्या में खुदाई की। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का दावा था कि मस्जिद के नीचे मंदिर के अवशेष होने के प्रमाण मिले हैं। मुस्लिमों में इसे लेकर अलग-अलग मत थे।

सितंबर 2003 में एक अदालत ने फैसला दिया कि मस्जिद के विध्वंस को उकसाने वाले सात हिंदू नेताओं को सुनवाई के लिए बुलाया जाए।

जुलाई 2009 में लिब्रहान आयोग ने गठन के 17 साल बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपनी रिपोर्ट सौंपी।

28 सितंबर 2010 में सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहबाद उच्च न्यायालय को विवादित मामले में फैसला देने से रोकने वाली याचिका खारिज करते हुए फैसले का मार्ग प्रशस्त किया।

30 सितंबर 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांटा जिसमें एक हिस्सा राम मंदिर, दूसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड और तीसरा निर्मोही अखाड़े को देने की बात कही गई।

9 मई 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी।

जुलाई 2016 में बाबरी मामले के सबसे उम्रदराज वादी हाशिम अंसारी का निधन।

21 मार्च 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने आपसी सहमति से विवाद सुलझाने की बात कही।

19 अप्रैल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती सहित बीजेपी और आरएसएस के कई नेताओं के खिलाफ आपराधिक केस चलाने का आदेश दिया।

6 अगस्त 2019 में मामले में मध्यस्थता से कोई नतीजा नहीं निकल सका। जिसके बाद 6 अगस्त से सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की रोजाना सुनवाई शुरू हुई।

किसका क्या कहना है?

निर्मोही अखाड़े का दावा

इसके तीन पक्ष है। पहला, निर्मोही अखाड़े ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि बाबर के सूबेदार मीर बाक़ी ने वहां पर राम मंदिर के बनाए क़िले को तोड़ कर मस्जिद बनवाई थी। वो भारत के पुरातत्व सर्वेक्षण की पड़ताल के हवाले से ये दावा करते हैं कि मस्जिद के नीचे मंदिर था। निर्मोही अखाड़े की तरफ़ से वरिष्ठ वकील सुशील कुमार जैन ने सर्वोच्च न्यायलय से निचली अदालत में पेश कुछ दस्तावेज़ों का हवाला देते हुए कहा था कि राम जन्मभूमि पर निर्मोही अखाड़े का हक़ है और ज़मीन उन्हें दी जानी चाहिए।

रामलला की दलील

रामलला की ओर से पैरवी कर रहे वकील ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि अयोध्या में भगवान राम का जन्मस्थल अपने आप में एक देवता है और कोई भी महज मस्जिद जैसा ढांचा खड़ा कर इस पर मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकता। उन्होंने प्रतिकूल कब्जे के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि हिन्दुओं ने राम जन्म स्थान पर हमेशा पूजा-अर्चना के अधिकार का दावा किया है और इसलिए यह प्रतिकूल कब्जे का मामला नहीं हो सकता। इसके अलावा उन्होंने विवादित भूमि पर मुस्लिम पक्ष और निर्मोही अखाड़ा के दावे को भी खारिज कर दिया।

मुस्लिम पक्ष की दलील

सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने कहा कि वैधानिक बेंच को दो पहलुओं को देखना है। पहला ये है कि विवादित स्थान पर मालिकाना हक किसका बनता है और दूसरा पहलू ये है कि क्या गलत ऐक्ट को लगातार जारी रखा जा सकता है या नहीं। 22 दिसंबर 1949 को मस्जिद के गुंबद के नीचे मूर्ति रख दी गई थी। ये गलत हरकत की गई जो अवैध ऐक्ट है लेकिन इसके बाद मैजिस्ट्रेट ने यथास्थिति बहाल रखने का ऑर्डर पासकर दिया। यानी गलती को लगातार जारी रखा गया। क्या ये किसी को अपना अधिकार बताने का आधार हो सकता है।

सुशील कुमार जैन ने कहा कि विवादित ज़मीन पर हमारा दावा 1934 में दायर किया गया था जबकि सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने विवादित ज़मीन पर हक़ जताने का अपना वाद 1961 में दायर किया था।

इलाहाबाद हाइकोर्ट का फैसला क्या था?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित जमीन को 3 हिस्सों में बांटने के लिए कहा था

2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि अयोध्या का 2.77 एकड़ का क्षेत्र तीन हिस्सों में समान बांट दिया जाए। एक हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड, दूसरा निर्मोही अखाड़ा और तीसरा रामलला विराजमान को मिले। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 14 याचिकाएं दाखिल की गई थीं।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला सर्वमान्य

सुप्रीम कोर्ट का जो भी निर्णय हो इस विवाद से जुड़े हर पक्ष को स्वीकार होगा। सभी को कोर्ट का फैसला सर्वमान्य होगा। जमीयत के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि अयोध्या मामले पर अदालत का फैसला मंजूर होगा। मुस्लिम पक्ष से इकबाल अंसारी ने भी कहा कि भाईचारे की भावना कायम रहेगी और वह  भी कोर्ट के फैसले का सम्मान करेंगे।

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