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मेरे आंगन में बुलबुल का बसेरा- (संस्मरण)        

जिस दिन से बुलबुल ने मेरे आंगन में खड़े आम की डाली पर घोंसला बनाया, उसी दिन से सुबह शाम जब तब मेरी निगाहें उस डाली पर लगी रहती। आम का पेड़ रसोई की खिड़की के पास ही है। डाली पर बना घोंसला खिड़की से साफ नजर आता था। जब भी रसोई में जाती घोंसले को देख लेती। आसपास रखे कुंडों में जब भी पानी डालती, घोंसले पर नजर कर लेती। एक सुबह मैंने पाया कि घोंसले में तीन अंडे रखे हैं । बुलबुल ने अपने अंडे बड़ी तरकीब से छोटे से घोंसले में रखे थे। देखकर मुझे बहुत खुशी हुई। मैंने कई फोटो क्लिक कर पुणे में रहते अपने बच्चों के साथ शेयर किये। फोटोज देख कर बच्चे बहुत खुश हुए। जैसे ही मैं अंडों के पास जाती बुलबुल घबरा कर चूं चूं चीं करने लगती। मुझे चूजों के निकलने का इंतजार लगा रहता। फिर एक सुबह अंडों से नन्हें नन्हें चूजे निकल आये। एक दूजे से सटे हुए, मुंह दबाये लेटे थे। मादा बुलबुल अब अपना अधिकतर समय घोंसले में ही बिताने लगी। नर बुलबुल चोंच में दाना लाता और पास की डाली पर बैठ कर चौकसी करता रहता। चूजे धीरे-धीरे बड़े होने लगे, आंखें खोलने लगे, पर निकलने लगे। दिन में अनेक बार मैं उन्हें देखती। एक सुबह मैंने देखा चूजे अपने पर फड़फड़ा रहे हैं। ये देख कर बहुत अच्छा लगा। अब वे आहट का एहसास भी करने लगे थे। पास जाने पर चूं चूं चीं चीं करने लगे थे। मैंने बहुत जतन से चूजों के फोटो लिए , बच्चों एवं दोस्तों के संग शेयर किये।

एक महीने से जैसे घर में उत्सव लगा था। आज उत्सव का खास दिन था। बच्चे उड़ने के काबिल हो चले थे। खुशी भी थी और थोड़ा मलाल भी था कि बच्चे उड़ जायेंगे। बुलबुल भी उड़ जायेंगी। डाल सूनी हो जायेगी। मेरे आंगन में गूँजती चहचहाट बंद हो जायेगी। मुझे जैसे उन सबको देखने की आदत सी हो गई थी। ये तो पंछी थे। थोड़े दिन के लिए ही आये थे और मुझे उनके उड़ जाने से कष्ट हो रहा थ। जब अपने बच्चे घर आंगन छोड़ कर कहीं दूर चले जाते हैं तो माँ पिता को कितना कष्ट होता होगा ।

हमारे घर में एक प्यारा सा कोना है, आहते का किचन गार्डन। जिसमें फलों, फूलों के पेड़ पौधे लगे हैं। जिन में आम, चीकू, अमरूद, सीताफल, फालसे व केले हैं। मेरी सुबह इनके साथ ही खुशगवार होती है। सुबह उठते ही मैं भजन लगा देती हूं। ये मेरे साथ भजन सुनते हैं। सुबह की चाय पीते पीते ही मैं इन्हें पानी पिलाती हूँ। इनकी देखरेख करना, इनमें लगे फूल व फलों को देखना मुझे आनंद देता है। दिन की अच्छी शुरुआत हो जाती है। यहाँ पक्षियों के लिए दाना पानी भी रखा जाता है। दिन भर तरह-तरह के पंछियों गौरैया, चिड़िया, बुलबुल, कोयल, डव, रॉबिन का आना जाना लगा रहता है। ये सब दिन भर चुगते हैं चहकते हैं। इनकी चहचहाट से मेरा घर खुशनुमा बना रहता है। गिलहरी भी ट्विट ट्विट कर मन बहलाती है। जंगल बैवलर झुंड में आती हैं और मिलकर चैं चैंचैं चैं गा कर आंगन को गुंजायमान कर देती हैं। कोयल की मधुर वाणी भी यदा कदा सुनने को मिल जाती है  ये सब मेरे दोस्त बन गए हैं।

उस सुबह मैं बहुत खुश थी, बुलबुल के बच्चे उड़ने के काबिल हो चले थे। गरदन ऊपर उठा रहे थे, चहचहा रहे थे। आसमान की तरफ देख ईश्वर का शुक्रिया कर रहे थे। बुलबुल अपनी चोंच में कुछ कुछ लाकर खिला रही थी। बच्चों की सुरक्षा के लिए आसपास ही मंडरा रही थी। घर में रौनक लगी थी। उसी दिन दोपहर जब मैं रसोई में पानी पीने आई तो बुलबुल और बच्चों का करुण क्रंदन सुनाई दिया। मदद मांगने वाली चहचहाट थी। जो किसी खतरे का संकेत दे रही थी। मैं भाग कर बाहर आई। देखा बिल्ली खड़ी थी। मैंने बिल्ली को भगाया। बुलबुल भी उस पर झपटी। बिल्ली भाग गई। किंतु खतरे की चेतावनी जरूर दे गई। मुझे चिंता थी रात को बिल्ली बच्चों को नुकसान पहुंचा सकती है। किंतु रात जैसे तैसे निकल गई। सुबह मैंने बच्चों को घोंसले सहित बांस की टोकरी में रखा और घने पत्तों के बीच ऊपर की डाली पर शिफ्ट कर दिया। बुलबुल मुझे कृतज्ञता भरी नजरों से देख रही थी। जैसे कह रही हो मदद के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद। ममता सिर्फ इंसान में ही नहीं होती पशु, पक्षी, जीव, जंतु सब में होती है। बुलबुल का बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंतित होना स्वाभाविक था। माँ की ममता अनमोल है ।हर माँ अपने बच्चे पर ममता लुटाती है। और फिर एक दिन बुलबुल के बच्चे उड़ गये। बुलबुल भी चली गई। मैं अब यदा कदा मेरे मोबाइल में स्टोर फोटो में अंडे, चूजे व डाली पर बैठी बुलबुल को देख लेती हूँ। डालियों पर नजर रखती हूँ। और दुआ करती हूँ, फिर कोई नया घोंसला बने और मेरे आंगन में फिर से किसी नये जीवन का आविर्भाव हो।

About the Author

डॉ. मीरा रामनिवास
लेखिका भारतीय पुलिस सेवा की अधिकारी रही हैं। साहित्य की तमाम विधाओं में लेखन किया है।

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