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नियंत्रण करने की प्रवृत्ति को नियंत्रित करने का पर्व है विजयादशमी

विजयादशमी, शक्ति का उत्सव। शक्ति भी कैसी, वह जो अन्याय का विरोध करे, जो कमजोर को सहारा दे। वह क्रूर न हो, बल्कि करुणा का सागर बने। पुरुषार्थ को आधार बनाकर मानवता का कल्याण करे ऐसी शक्ति। दरअसल शक्ति को सही दिशा देना ही विजयादशमी का पर्व है, उत्सव है और इसी में मंगल है। दरअसल शक्ति होना, सृष्टि की शुरुआत के साथ है। यह ऊर्जा के रूप में है मिली एक भौतिक इकाई है। यह वही प्रेरणा है जो बिगबैंग के जरिए ग्रहों-नक्षत्रों के बनने की वजह है। इसका दूसरा स्वरूप नियंत्रण का है। आदि काल से मनुष्य नियंत्रण की प्रवृत्ति रखता आया है। यही नियति किसी को देव बना देती है तो किसी को दानव। नियंत्रण की प्रवृत्ति को नियंत्रित कर लिया जाए तो व्यक्ति राम है, और इस प्रवृत्ति को खुला छोड़ कर खुद इसके अधीन हो जाना रावण होना है। राम-रावण युद्ध इन्हीं दो प्रवृत्तियों का युद्ध है। रावण का वध नियंत्रण से बाहर हो रही नियंत्रण की प्रवृत्ति को नियंत्रित करने का प्रतीक है। राम इस प्रवृत्ति के आधार हैं और विजयदशमी इसी आधार का पर्व है।
हर किसी में अच्छाई-बुराई होती है। इनका अनुपात अलग-अलग हो सकता है। भारत के सामान्य व्यक्ति की प्रश्नाकुलता के स्वर विजयादशमी में हैं जो हमारी धमनी और शिराओं में वास करते हैं। हमारी संकल्प-भावना के मूर्तिमंत रूप विजयादशमी में हैं। जब अन्याय हो तो उससे संघर्ष करने का भाव विजयादशमी में मिलता है। सामान्य को इकट्ठा करके संघर्ष करने की कला राम के पास है। सत्ता से दूर रहकर भी लोगों को अपना बना लेना कोई उनसे सीखे। इसे निभाना वह बखूबी जानते हैं। वह लंका पर राज नहीं करते। उनके विपरीत रावण एक ऐसा प्रतिनायक है, जो विद्वान है और प्रकृति पर ही नियंत्रण करने चला है। रावण से सीखने के लिए लक्ष्मण रावण की मृत्यु की घड़ी में सादर उसके पास जाते हैं। रावण विराट शक्ति और प्रतिभा का धनी था। उसकी शक्ति और प्रतिभा यदि स्त्री के आहरण में न खपती और मन विस्तार लिए होता तो शायद राम-रावण संघर्ष की दिशा कुछ और होती। खैर राम-रावण का एक अपराजेय समर आज भी जारी है। हमारे भीतर के प्रकाश और अंधकार का संघर्ष कभी खत्म ही नहीं होता। जैसे अंधकार में भी विशिष्ट क्षमताएं होती हैं वैसे ही रावण में भी बेहतरी कई बार देख सकते हैं। भारतीय मन किसी में केवल नकारात्मकता ही नहीं देखता, वह सकारात्मकता भी खोजता है या कहें कि खोज लेता है। शंबूक और सीता-निष्कासन के प्रसंग को भी लोक-समाज अपने नजरिये से देखता है।
महत्व यदि सत्ता, संपत्ति, कृत्रिम लोकप्रियता, धाक आदि के सहारे प्राप्त हुआ तो उसके कम हो जाने की संभावना अत्यधिक होती है। इसके उलट यदि अच्छाई मूल गुण-संपत्ति से बनी एवं बुनी हुई हो तो उसमें धुंधलापन आने की अधिक आशंका नहीं होती। राम का जो अर्जित गुण है, उसे मौलिक सृजनशीलता कह सकते हैं। आधुनिकतावाद ने औद्योगिक विकास, बुद्धिवाद एवं विज्ञान के वर्चस्व को प्रगति एवं सभ्यता के साथ जोड़ दिया था, जबकि उत्तर आधुनिकतावाद ने संस्कृति को एक के बजाय अनेक और केंद्रित के बजाय विकेंद्रित करार दिया। अभी देखें तो नए सिरे से अब संस्कृति विमर्श का मुद्दा बन रही है, जिसमें जड़ों की तलाश, अतीत एवं परंपरा के नए अवगाहन महत्वपूर्ण बनते जा रहे हैं। राम को भी नए सिरे से आविष्कृत करने के लिए उनको गहराई से समझना होगा जो ‘अन्य’ के रूप में रहे हैं और कई बार साहित्य एवं इतिहास से बाहर के माने जाते रहे हैं, जैसे-दस्यु, राक्षस एवं आदिजन। उनके साथ ही सीता, उर्मिला, मांडवी आदि को भी नए सिरे से देखना होगा। इतनी सारी अर्थ छवियों, दृष्टियों की संकुलता एवं बहुवचनात्मकता से सुसज्जित कथा हजारों साल से लोक-व्यवहार, आचार, स्मृति में रंगमयी ङिालमिलाहट से भारतीय समाज को रचती रही है। इसके अंदर ऐसी निरंतरता है जो जीवन का उत्सव बन जाए।
भारतीय संस्कृति में हमेशा से एक मध्यम या संतुलित सोच की मान्यता रही है। यहां अतिवाद को स्थान नहीं है। इसीलिए प्रतिपदा से दशमी तक के लिए ऐसी ऋतु चयनित है, जहां न शीत है न ग्रीष्म। जहां आंतरिक और बाहरी स्वच्छता पर बल है। यह रामकथा एक नहीं, सैकड़ों रूपों में है। रामायण में केवल एक पाठ नहीं, बल्कि सैकड़ों पाठ हैं। एक पाठ राम का तो अन्य पाठ सीता का। एक पाठ लक्ष्मण का तो अन्य पाठ उर्मिला का। राम, लक्ष्मण, भरत के अंतरसंबंध भी एक भिन्न कोटि का पाठ बनाते हैं।
रामायण, रामचरितमानस, अध्यात्म रामायण, साकेत, रामचंद्रिका, आनंद रामायण, बौद्ध रामायण आदि अनेक रामायण हैं। इन सभी में अलग-अलग दृष्टियां हैं। दृष्टियों की बहुलता वाली ऐसी विजयादशमी का विजय-पाठ अंतत: यदि सामान्य व्यक्ति की प्रेरक स्मृति की सुगंध से नहीं जुड़ा होता तो वह अर्थमय नहीं होता और हमारे भीतर-बाहर के चौक-चौबारे में मेला न बन जाता। एक ऐसा मेला, जहां हम स्वयं से मिलते हैं और लोक से भी। नायक से मिलते हैं और प्रतिनायक से भी। समय से मिलते हैं और भविष्य से भी। काव्य से मिलते हैं और महाकाव्य से भी। अंत से मिलते हैं और अनंत से भी। भाषा से मिलते हैं और भाषा से परे भी। हद से मिलते हैं और बेहद से भी।

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विकास पोरवाल
पत्रकार और लेखक

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