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डीयू के हिंदी विभाग में विभागाध्यक्ष दलित प्रोफेसर न हों, इसलिए विभागाध्यक्ष की कुर्सी खाली!

दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के हिंदी विभाग में तीन सप्ताह से विभागाध्यक्ष की कुर्सी को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। 12 सितम्बर को विभागाध्यक्ष का कार्यकाल समाप्त हो चुका है और समकुलपति ने 12 सितम्बर को ही आने वाले अध्यक्ष और पूर्व अध्यक्ष को बुलाकर प्रशासनिक औपचारिकताएं पूरी कराई, लेकिन 13 तारीख से लेकर आज तक कोई भी आदेश विश्वविद्यालय की ओर से जारी नहीं हुए जबकि पूर्व में 70 सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ।

फोरम ऑफ एकेडेमिक फ़ॉर सोशल जस्टिस (दिल्ली विश्वविद्यालय) के अध्यक्ष प्रो. केपी सिंह ने हिंदी विभाग के अध्यक्ष को कार्यभार संभालने में की जा रही देरी पर डीयू के कुलपति को इस संदर्भ में पत्र भी लिखा है और जानना चाहा है कि वरिष्ठता क्रम में प्रो. श्योराज सिंह ‘बेचैन’ हैं और उन्हें ही बुलाकर सारी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद भी अभी तक उन्हें कार्यभार संभालने संबंधी निर्देश जारी क्यों नहीं किए?

प्रो. सिंह ने आगे बताया है कि विभाग द्वारा जारी वरिष्ठता क्रम सूची में प्रो. श्योराज सिंह ‘बेचैन’ का नाम आता है। फरवरी-2010 में तीन प्रोफेसरों की सीधे पदों पर नियुक्ति हुई थी जिसमें क्रमश प्रो. प्रेम सिंह, प्रो. श्योराज सिंह बैचेन और प्रो. अपूर्वानंद का क्रम है। इनमें प्रो. प्रेम सिंह सेवानिवृत्त हो चुके हैं।

प्रो. केपी सिंह ने बताया है कि विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि इस पद पर दावा करने वाले, प्रोफेसर पद पर लगभग एक साल कनिष्ठ किसी प्रोफेसर ने अपना दावा कर रखा है और पता चला है कि उनका दावा खारिज भी हो चुका है, लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन अभी तक कोई निर्णय नहीं ले पा रहा है। बताया जाता है कि इसमें जाति समीकरण भी काम कर रहा है क्योंकि प्रोफेसर बेचैन घोषित रूप से दलित समाज से आते हैं और आज वे दलित साहित्य में एक प्रतिष्ठित लेखक भी है। उन्होंने यह भी बताया है कि हाल ही में उन्हें हिंदी अकादमी पुरस्कार दिया गया है। साथ ही अनेक विश्वविद्यालयों के हिंदी पाठ्यक्रमों में उनकी आत्मकथा व उनकी कविताएं पढ़ाई जा रही है। वे योग्यता के मामले में किसी सामान्य वर्ग के प्रोफेसर से कहीं ज्यादा ही है।

फोरम के चेयरमैन व पूर्व डीयू विद्वत परिषद सदस्य हंसराज ‘सुमन’ ने बताया है कि हिंदी विभाग में अध्यक्ष की कुर्सी पर विगत 70 वर्षों से कोई भी दलित नहीं बना है। ऐसा माना जा रहा है कि 70 वर्षो से जब कोई अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठा ही नहीं है तो अब कैसे? इस स्थिति पर शिक्षकों में काफी असंतोष है और सभी की नजर विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर टिकी हुई है कि डीयू के कुलपति क्या निर्णय लेते हैं। उन्होंने यह भी बताया है कि विगत 4 वर्षों में अध्यक्ष/डीन की अनुपस्थिति में अगले अध्यक्ष के रूप में प्रो. श्योराज सिंह बेचैन कार्यभार संभालतें रहे हैं, उन्होंने लगभग 70 दिनों तक विभागाध्यक्ष की अनुपस्थिति में कार्य संभाला है। इतना ही नहीं उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए स्क्रीनिंग कमेटी में सदस्य के रूप में कार्य किया है और भविष्य के अध्यक्ष के रूप में भी काम कर रहे हैं।

सुमन ने चिंता जताई है कि हिंदी विभाग में अध्यक्ष के ना होने से विभाग में होने वाले एमफिल/पीएचडी के एडमिशन और पीएचडी शोधार्थियों के आलेख पाठ आदि का काम रुका हुआ है। पिछले कुछ सालों से हिंदी विभाग में प्रवेश प्रक्रिया विलंब से शुरू हो रही है जिससे शोधार्थियों का काफी नुकसान होता है। उन्होंने बताया है कि विभाग के कुछ शिक्षक नहीं चाहते कि अध्यक्ष पद पर किसी दलित प्रोफेसर को कुर्सी पर बैठाया जाए। यह इसलिए भी किया जा रहा है कि पिछले कई वर्षों से विभाग और कॉलेजों में नियुक्तियां नहीं हुई है। इन नियुक्तियों में अध्यक्ष की अहम भूमिका रहती है इसलिए कुछ जातिवादी लोग नहीं चाहते कि दलित समाज का कोई प्रोफेसर हिंदी विभाग का अध्यक्ष बने। उन्होंने पूरे मामले की जांच करने के लिए कुलपति से मांग करते हुए कहा कि जल्द से जल्द विभाग के वरिष्ठता सूची में प्रो. श्योराज सिंह बेचैन को अध्यक्ष बनाया जाए ताकि उच्च शिक्षण संस्थानों में दलित समाज के व्यक्तियों को वास्तविक सामाजिक न्याय मिल सके।

2 Comments on "डीयू के हिंदी विभाग में विभागाध्यक्ष दलित प्रोफेसर न हों, इसलिए विभागाध्यक्ष की कुर्सी खाली!"

  1. यह झगड़ा नहीं है।

    कुर्सी बड़ी है। दलित ना बैठे, इसलिए यह सब हो रहा है।

  2. दिशा वाल्मीकि | October 5, 2019 at 11:46 AM | Reply

    जात-पात की राजनीति बंद कीजिये, दलितों के मसीहा बनने वालों। जाटव-जाटव भाई भाई की राजनीती करने वालों को शर्म आसानी चाहिए। सामाजिक विज्ञान में डीन दलित भाई बनने जा रहे थे, तब आप लोग क्यों सोये हुए थे। नतीजन, इकोनॉमिक्स के ब्राह्मण को डीन बना दिया। विश्विद्यालय प्रशासन को पता है आपकी दलित राजनीति के हथकंडे। इसीलिए दलित नेताओं बटें रहें अपनी जात की राजनीती में, और सैकतें रहें अपनी पुलाव।

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