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जब महापर्व छठ पर पूरे परिवार में जश्न का माहौल हो जाता है!

बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश का महापर्व छठ के आते ही बाहर काम करने वाले बेटे, पति काम से छुट्टी ले ट्रेनों में बोरे की तरह कसकर आते हैं। विदेश रहने वाले परिवार के लोगों के लिए भी छठ घर आने का सुनहरा मौका होता है। हर तरफ कानों में ” कॉच ही बॉस के बहँगीय, बहंगी लचकत जाये” सुनाई दे रहा होता है और घरों में खूब चहल पहल हो रही होती है। महिलाएं नाक तक पीला सिंदूर पहने एक दूसरे से बतिया रही होती हैं” का हो एतना गुड़वा ठीक बा कि औरु जाई”।

आदमी लोग तैयार खड़े होते हैं कुछ घट तो नहीं गया जो बाजार से लाना है। लड़के माँ से पूछ रहे होते हैं कि और कुछ चाहिए और माता जी कहती हैं “दिया बतिया त बा, सेब केलवा आ गइल ऊँख आइल ह, दुगो नीबूआ ले आवा और लल्लू के अम्मा से कह दिहा, साथे चले के उनकर छठ न होखेला”

लड़किया कभी पूजा के काम में हाथ बटा रही होती हैं और कभी परिवार के लोगों, छोटे बच्चों को खिला रही होती हैं।

फिर शाम को सब सज संवर कर निकलते हैं व्रती और जो दौरा (पूजन सामग्री, फल, प्रसाद रखने की बॉस की टोकरी) ले जाता है वो नंगे पांव चलता है।

रंग बिरंगी रोशनी सज धज कर माताएं बहने लचकते ऊँख आपके नजरों को मोहित कर लेंगे। अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देकर वापस लौटने के बाद इंतजार होता है भोर का जब 2 बजे उठ कर तैयारियां शुरू हो जाती हैं। छोटे बच्चों को ऊनी वस्त्र पहनाए जाते हैं और 4 बजे तक निकल चलते हैं घाट की तरफ। सज धज के निकलती हैं बच्चियां, बहने और कुर्ता पैजामा, जीन्स कुर्ता पहने लड़के, सोलह श्रृंगार की हुई माताएं, भाभियां, नई शादी हुई विवाहिता एकदम दुल्हन की तरह सजी होती हैं। बड़े-बड़े हार, मांग का टीका, भरी हाथ चूड़ियां। सूर्य देवता के आगमन होते ही एक नई ऊर्जा का प्रवाह होता है सभी व्रती अर्घ्य देती हैं। फिर आता है समय प्रसाद पाने का जो आँचल में मिलता है, घी में बना गुड़ का ठेकुआ। इसे प्राप्त कर सभी तृप्त हो जाते हैं और छठी मैया का गीत गाते हुए लौट आते हैं।

बोलिये छठी मइया की जय!

About the Author

पूजा वर्मा
कविताएं लिखने का शौक है, कई काव्य संग्रह किताबें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। समसामयिक विषयों पर लेख भी लिखती हैं।

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