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उत्तराखंड में फेरबदल के बाद अब बंगाल में ममता बनर्जी की कुर्सी कैसे बच पायेगी?

राजनीति भी एक जुआ है। कुर्सी की आदत और लत की बात है। देश के केंद्र की मोदी सरकार अपना सारा दांव खेल रही है कि कैसे पूरे भारत में बीजेपी का कब्जा बना रहे। लेकिन विधानसभा चुनाव और उसके परिणाम उसे हताश कर रहे हैं। अब जबकि बंगाल चुनाव में मोदी की हार हो ही गई है और यूपी चुनाव सामने है तो सियासत में दिन प्रतिदिन उथल मच रहा है। उत्तराखंड के सीएम तीरथ सिंह रावत के इस्तीफा देने और पुष्कर सिंह धामी के मुख्यमंत्री बनने के बाद सवाल उठ रहे हैं। और यह सवाल सबके मन को झकझोर देने वाला है। काफी बड़ा सवाल है कि क्या बंगाल में भी कुछ ऐसा होने वाला है? सीएम ममता बनर्जी को भी इस्तीफा देना पड़ सकता है? आखिर इस्तीफा देने के बाद ममता बनर्जी की सरकार रह पायेगी? बंगाल में विधान परिषद के गठन होने में क्या अड़चन है? और फिर अगले साल हो रहे विधानसभा चुनावों में यूपी को किस तरह से बीजेपी जीतना चाहती है? केंद्र में कैबिनेट विस्तार के क्य़ा मायने हैं? इन सब पर हम आज बात करने वाले हैं।

मोदी कैबिनेट में बदलाव और मायने

मोदी कैबिनेट में इसी हफ्ते बदलाव होने की उम्मीद है। इस बार चुनावी राज्यों के साथ-साथ बिहार (Bihar) और महाराष्ट्र (Maharashtra) पर भी फोकस किया जा सकता है।  सरकार के दूसरे कार्यकाल में होने जा रहा ये पहला कैबिनेट विस्तार (Cabinet Expansion) है, ऐसे में माना जा रहा है कि ये कोई छोटा नहीं, बल्कि एक बड़ा फेरबदल होगा.
बताया जा रहा है कि इस बार मोदी कैबिनेट (Modi Cabinet) में करीब 20 नए चेहरों को जगह मिल सकती है।
कैबिनेट विस्तार में मुख्य रूप से फोकस पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश पर किया जा सकता है. यहां के नेताओं को मंत्री पद मिल सकता है. वहीं, बिहार में जनता दल (यूनाइटेड) और लोक जनशक्ति पार्टी के पशुपति पारस गुट को केंद्रीय कैबिनेट में जगह मिल सकती है।
आपको पता है कि यूपी का विधानसभा चुनाव नजदीक है ऐसे में
ऐसे में यहां पर भी खास नज़र रहेगी। उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के सहयोगी अपना दल और निषाद पार्टी को केंद्रीय कैबिनेट में जगह मिल सकती है।

कांग्रेस छोड़ भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को मोदी कैबिनेट में जगह मिल सकती है. मंगलवार को ज्योतिरादित्य सिंधिया को नई दिल्ली बुलाया गया है, वह अपना MP दौरा बीच में छोड़कर ही दिल्ली आ रहे हैं।

यह सब तो हो ही रहा है। उधर रविवार को 45 साल के पुष्कर सिंह धामी ने उत्तराखंड के 11वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ले ली। शुक्रवार को तीरथ सिंह रावत ने ‘संवैधानिक संकट’ का हवाला देते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था।

नौ नवम्बर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड अस्तित्व में आया था। और इस 21 साल में 11 मुख्समंत्री बन चुके हैं।

अब बात पते की यह है कि

उत्तराखंड में तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा। संवैधानिक संकट की वजह से उन्होंने राज्यपाल को इस्तीफा सौंप दिया। दरअसल तीरथ सिंह रावत विधानसभा के सदस्य नहीं थे और वर्तमान हालात में उपचुनाव होना भी मुश्किल था। ऐसे में उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। इस बीच तीरथ सिंह रावत के बाद अब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए भी मुश्किल हो सकती है।

कैसे यह मुश्किल ममता बनर्जी को हो सकती है, इसके लिए पहले उत्तराखंड का ही यह मामला समझिये

10 मार्च 2021 को तीरथ सिंह रावत ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री की शपथ ली थी। ऐसे में 10 सितंबर से पहले उन्हें किसी सदन का सदस्य होना जरूरी थी। तीरथ ने संवैधानिक संकट और अनुच्छेद 164 का हवाला देते हुए इस्तीफे की बात कही है। अनुच्छेद 164(4) के अनुसार, कोई मंत्री अगर 6 माह की अवधि तक राज्य के विधानमंडल (विधानसभा या विधान परिषद) का सदस्य नहीं होता है तो उस समयसीमा के खत्म होने के बाद मंत्री का कार्यकाल भी समाप्त हो जाएगा। इस लिहाज से पश्चिम बंगाल की स्थिति भी उत्तराखंड जैसी ही दिख रही है। यहां सीएम ममता बनर्जी अभी विधानसभा की सदस्य नहीं हैं। 

ममता ने सीट तो खाली करा ली लेकिन चुनाव कब?
ममता बनर्जी ने 4 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। ऐसे में उन्हें शपथ लेने के दिन से छह महीने के अंदर यानी 4 नवंबर तक विधानसभा का सदस्य बनना जरूरी है और यह संवैधानिक बाध्यता है। उन्होंने अपने लिए एक सीट (भवानीपुर) खाली भी करा ली है लेकिन वह विधानसभा की सदस्य तभी बन पाएंगी जब तय अवधि के अंदर चुनाव हो सके। कोरोना की वजह से केंद्रीय निर्वाचन आयोग ने सभी चुनाव स्थगित किए हुए हैं। चुनाव प्रक्रिया कब से शुरू होगी, इस बारे में अभी कुछ कहा नहीं जा सकता। ऐसे में अगर नवंबर तक भवानीपुर उपचुनाव के बारे में चुनाव आयोग फैसला नहीं लेता है तो ममता की गद्दी के लिए भी खतरा हो सकता है।

विधान परिषद का सदस्य ममता बनर्जी बन नहीं सकतीं क्योंकि इसके लिए पहले बंगाल में विधान परिषद का गठन होना चाहिये। अभी 6 राज्यों

आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, महाराष्ट्र, बिहार और उत्तर प्रदेश में विधान परिषद् है। इस परिषद को उच्च सदन भी कहते हैं. इससे पहले जम्मू कश्मीर में  विधान परिषद थी लेकिन केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद इसकी मान्यता खत्म हो गई

बंगाल में पहले थी विधान परिषद

बंगाल में 5 दशक पहले विधान परिषद थी, लेकिन बाद में इसे खत्म कर दिया गया था. आजादी के बाद 5 जून 1952 को बंगाल में 51 सदस्यों वाली विधान परिषद का गठन किया गया था. बाद में 21 मार्च 1969 को इसे खत्म कर दिया गया था. 2011 में ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की सत्ता में आते ही विधान परिषद के गठन का वादा किया था.

एक बात यह भी समझना जरूरी है कि ममता का विधान परिषद वाला दांव कितना सफल होगा
बंगाल में जब आयोग चुनाव करा रहा था तब कई राजनीतिक दलों ने आयोग पर लोगों की जान से खेलने के आरोप लगाए थे। ऐसे में अब जब तक यह सुनिश्चित नहीं हो जाता कि चुनाव कराने से किसी की जान को खतरा नहीं है तो चुनाव होने की सूरत बनती नहीं दिख रही है। ममता ने हालात को समझते हुए, विधान परिषद वाला रास्ता निकालने की कोशिश की थी। उन्होंने विधानसभा के जरिए प्रस्ताव पास कराया कि राज्य में विधान परिषद का गठन हो लेकिन बगैर लोकसभा की मंजूरी के यह संभव नहीं है। केंद्र सरकार के साथ उनके रिश्ते जगजाहिर हैं। ऐसे में विधान परिषद वाला रास्ता भी मुमकिन नहीं है।

हालांकि बंगाल में 2 जुलाई से विधानसभा का सत्र शुरू हुआ है। जानकारी के मुताबिक, ममता बनर्जी विधानसभा में विधान परिषद के गठन का प्रस्ताव पेश कर सकती हैं. बंगाल में विधानसभा की 294 सीटें हैं और अगर विधान परिषद का गठन होता है तो उसमें 98 सीटें हो सकती हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि विधान परिषद की सीटों के संख्या विधान सभा की सीटों की संख्या से एक तिहाई से ज्यादा नहीं हो सकती.

इससे पहले महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की कुर्सी पर मंडराया था संकट
उन्होंने 28 नवंबर 2019 को जब मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी तो किसी सदन के सदस्य नहीं थे। उन्हें 27 मई 2020 तक किसी सदन का सदस्य बनना था। उनके लिए तसल्ली की बात यह थी कि महाराष्ट्र में विधान परिषद है और उसकी सात सीटों के लिए अप्रैल 2020 में चुनाव होने थे।

इस मुद्दे पर भाजपा भी ममता को घेरने की तैयारी शुरू कर दी है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने कहा है कि ममता बनर्जी विधायक नहीं हैं लेकिन मुख्यमंत्री के पद पर आसीन हैं। लिहाजा नैतिकता के आधार पर उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे देना चाहिए।

दूसरी ओर तृणमूल के राज्यसभा सदस्य सुखेंदुशेखर रॉय ने कहा कि दोनों राज्यों के हालात की तुलना नहीं की जा सकती। उत्तराखंड में अगले साल की शुरुआत में मतदान है। इसलिए कोरोना के इस माहौल में इतने कम समय के लिए उपचुनाव कराने में आनाकानी हो सकती है। लेकिन मई में ही ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल भारी बहुमत के साथ सत्ता में आई है। इसलिए उपचुनाव न कराने का कोई कारण नहीं है।

अब देखना यह होगा कि बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की कुर्सी का कैसे हल संभव होगा जब भाजपा कोई कोर कसर इस कुर्सी को हथियाने के लिए नहीं छोड़ रही है। इस पर आगे चर्चा भी करेंगे।

Disclaimer: इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं। किसी भी विवाद के लिए फोरम4 उत्तरदायी नहीं होगा।

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प्रभात
लेखक FORUM4 के संपादक हैं।

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