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इतने भी क्यों अंधविश्वासी हों

तस्वीरः गूगल साभार

क्या मैं अंधविश्वासी हूं? हां अगर मैं अपने अतीत में झाकूं तो कह सकता हूं कि, मैं अंधविश्वासी था, बचपन में। जिस तरह से बीते कल और आज में काफी बदलाव हो चुका है, ठीक उसी तरह अंधविश्वास से पर्दा भी धीरे-धीरे खुल रहा है। मैं तो इसे काफी हद तक समझ चुका हूँ और दूसरों को भी समझाता हूं, लेकिन आश्चर्य तब होता है, जब पढ़े-लिखे शहरों वाले लोग कई छोटे-छोटे, अतार्किक क्रियाओं में अंधविश्वास रखते हैं। हालांकि यही मानसिकता अगर ग्रामीण क्षेत्रों के लोग रखते हैं, तो मुझे उतना आश्चर्य नहीं होता, क्योंकि वो आधुनिकता व विज्ञान से परे अपने पुरातन रीत, संस्कृति, परंपराओं का अनुसरण करते आ रहे हैं, जिसमें अंधविश्वास की जड़ भी काफी गहराई से विद्यमान है। इसी कारण ग्रामीण लोग अंधविश्वास की जड़ता से घिरे हुए हैं, हालांकि मेरे कहने का मतलब यह कतई नहीं है कि आप अपनी संस्कृति, रीत, परम्पराओं को न मानें। अरे बिलकुल मानें, लेकिन इन परंपराओं के साथ जो अंधविश्वास का डोज आपको पीढ़ी दर पीढ़ी मिल रही है, उसे जरा तर्क के आधार पर तौल कर, उसका अच्छे से समालोचना करें। तब आप किसी निर्णय पर पहुंचे। लगता है मैने कुछ लम्बी चौड़ी भूमिका बांध दी है। चलिए कोई नहीं।

मैं २१ नवंबर की घटना पर आता हूं। मैं घर से निकलकर नरेला की तरफ जा रहा था, कि रेलवे स्टेशन के पास एक गली में मेरे विपरीत दिशा से आने वाली एक महिला रास्ते पर चलते-चलते एक बिल्ली के दाहिने तरफ से बाई ओर रास्ते पार करने के कारण रुक जाती है और फिर थोड़ा पीछे हट जाती है और इंतजार करती है की मैं जैसे ही उस अंधविश्वासी रेखा को पार करूं तो वो जाए और हुआ भी वैसा ही। मेरे उस अंधविश्वासी रेखा को पार करने के बाद वो अपने गंतव्य की ओर चल पड़ी। वास्तव में मुझे उसके इस तरह की हरकत पर मन ही मन काफी हंसी भी आ रही थी और उनकी इस ओछी मानसिकता पर तरस भी आ रहा था। मैं मन ही मन सोच पड़ा की इस अत्याधुनिक जमाने में भी लोग ऐसी मानसिकता अपने जेहन में पाले जी रहे हैं…। एक बिल्ली के राह के एक तरफ से दूसरी ओर जाने पर लोग रुक जाते हैं। ऐसा क्यों…? जिस तरह हम और आप एक प्राणी हैं, जीव हैं, इसी तरह वो भी तो एक जीव ही है। हमें भी तो एक तरफ से दूसरी तरफ किसी न किसी काम या जरूरत होने पर जाना ही पड़ता है। कभी दाएं से बायीं ओर तो कभी बाएं से दायीं ओर, ठीक इसी तरह उस जीव को भी तो किसी न किसी कारण दाएं-बाएं, बाएं-दाएं जाना ही पड़ता है। या फिर उसे इन सब से मुक्त रहने के लिए एक जगह से दूसरी जगह पर छलांग मारकर ही जाना चाहिए। इस जीव का हमारे सामने से रास्ता पार कर जाने को लोगों ने बुरी घटना का प्रतीक मान लिया है और ऐसा अभी तक इसलिए है, क्योंकि वो अंधविश्वास के रूप में हमें बचपन से ही बड़ों द्वारा एक नियमित डोज के रूप में दिया जा रहा है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी इसके शिकार हैं। आप अगर ये सोच रहे हैं कि मैं सिर्फ इसी अंधविश्वास के पीछे पड़ा हुआ हूं, तो ये बिल्कुल गलत है।

सिर्फ यही नहीं, इसमें कई तरह के ऐसी क्रियाएं शामिल हैं जैसें – किसी काम पर निकलने पर टोकना बुरा है, बिस्तर या खटिया पर बैठकर नीचे की ओर पैरों को हिलाना अच्छा नहीं होता, रात को घर में झाड़ू लगाना गलत बात है, सुबह – सुबह किसी अप्रिय व्यक्ति का मुंह देखकर यह कहना की आज का दिन बेकार जाएगा, किसी बिन बच्चे वाली महिला की बुरा छाया अपशगुन कहना आदि ऐसे ढेरों उदाहरणों से भरे हुए अंधविश्वासों ने लोगों के जेहन में इस हद तक अपनी पैठ बना ली है, कि वो इनके आगे कुछ और न समझते हुए, अपने काम को टालना ही पसंद करता है। अंधविश्वास की जड़ें भले ही कितनी ही मजबूत क्यों न हो, लेकिन इनसे लड़ने का यही एक मात्र उपाय हैं कि हम सभी तार्किक रूप से इसे समझने की कौशिश करें, तभी हम सब इस जड़ता से मुक्त हो पाएंगे।

Disclaimer: इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं। किसी भी विवाद के लिए फोरम4 उत्तरदायी नहीं होगा।

About the Author

संजय बर्मन
अभी लेखक के रूप में स्वतंत्र रूप से कार्य कर रहे हैं। इसके पहले वह प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान में सेवाएं दे चुके हैं।

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