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आजाद भारत में आदिवासियों की स्थिति

तस्वीर- गूगल साभार

आज के भारत में आदिवासियों की जो स्थिति है उसे देखने का लोगों का अपना अलग-अलग नजरिया है। वर्तमान में भारत के अन्दर लगभग आठ-नौ या उससे भी ज्यादा आदिवासी समुदाय/समाज निवास करता है, जो कि यहां युगों-युगों से निवास करता चला आ रहा है माना तो यह भी जाता है कि आदिवासी ही भारत के मूल निवासी हैं।

भारत में आदिवासियों की विभिन्न जनजातियाँ एवं उनकी उपजातियाँ या समुदाय निवास करती हैं, देश के अलग-अलग क्षेत्रों में इन जनजातियों की अपनी एक अलग पहचान है, ये सभी जनजातियाँ ज्यादातर पहाड़ी इलाकों में तथा अपने मूल स्थान को छोड़कर वर्तमान में मैदानी इलाकों में भी निवास करती हैं। भारत में आदिवासियों समूह की संख्या सात सौ से अधिक है। ब्रिट्रिश भारत में 1871 से लेकर 1941 तक हुई जनगणनाओं में आदिवासियों की अन्य धर्मों में गिनती की गई थी। जैसे- Other Religions 1871। Aboriginal 1881, Forest Tribes 1891, Animist 1901, Animist 1911, Primitives 1921, Tribes religions 1931, Tribes 1941 इत्यादि नामों से वर्णित किया गया है। हालांकि आजाद भारत में सन् 1951 की जनगणना के बाद से आदिवासियों को अलग धर्म में गिनती करना बंद कर दिया है।

भारत की जनगणना 1951 के अनुसार आदिवासियों की संख्या 1,91,11,498 थी जो 2001 की जनगणना के अनुसार 8,43,26,240 हो गई है। तब यह देश की जनसंख्या का 8.2 प्रतिशत था। आज के भारत में आदिवासियों की संस्कृति उनके रीति-रिवाज, प्रथा, परम्परा प्रभावों की दृष्टि से आदिवासियों के चार प्रमुख वर्ग देख सकते हैं। प्रथम वर्ग में परसंस्कृति प्रभावहीन समूह हैं, दूसरे पर परसंस्कृतियों द्वारा अल्प प्रवाहित समूह, तीसरे परसंस्कृति द्वारा प्रभावित, किन्तु स्वतंत्र साँस्कृतिक अस्तित्व वाले समूह और चौथे वर्ग में ऐसे आदिवासी समूह आते हैं जिन्होंने परसंस्कृतियों का स्वीकरण इस मात्रा में कर लिया है कि अब वे केवल नाम मात्र के आदिवासी रह गये हैं।

वर्तमान में भारत में आदिवासियों की सामाजिक एवं शैक्षिक दोनों की स्थिति बेहद दयनीय है, आधुनिक युग में आदिवासी समाज को एक हेय दृष्टि से देखा जाता है, उनकी पहचान एक बहिस्कृति  समाज के रूप में मानी जाती है, हमारे समाज के पढ़े-लिखे लोग जो कि समाज की मुख्य धारा से जुड़े हुए होते है वही लोग आदिवासी समाज को घिनौंनी नजर से देखेगें तो अन्य लोगों की मानसिकता पर इसका गहरा दुष्प्रभाव पहुँचेगा, हमें आदिवासी समाज को समाज की मुख्य धारा से जोड़ने का प्रयास करना चाहिए न कि उनका विरोध।

आदिवासियों का प्रकृति से बहुत गहरा सम्बन्ध है जो उन्हें एक अलग दृष्टिकोण देता है प्रकृति पूजक आदिवासी मौजूदा शैक्षिणक, आर्थिक, सामाजिक, साँस्कृतिक गतिविधियों एवं क्रियाकलापों के साथ सामजस्य नहीं बैठा पा रहे हैं क्योंकि विकास योजनाएं तथा नीतियाँ आदिवासियों के मूल स्वभाव तथा अस्मिता के विपरीत बनाये जा रहे हैं विकास योजनाएं एवं नीतियाँ कुछ वर्ग विशेष को ध्यान में रखकर बनाये जा रहे हैं जो कि एक सामाजिक असुन्तलन का कारण बना हुआ है।

व्यक्ति के व्यक्तित्व के निर्माण में शिक्षा की अपनी एक विशिष्ठ भूमिका होती है, आदिवासी समाज साक्षरता, आधुनिक शिक्षा की दृष्टि से बहुत पिछड़ी हुई हैं। आदिवासी क्षेत्रों में अन्य सामाजिक आर्थिक पक्षों की भाँति शिक्षा की कमी एक महत्वपूर्ण समस्या रही है सन् 1931 की जनगणना के अनुसार केवल 0.7 प्रतिशत ही आदिवासी शिक्षित थे। सन् 1950 के पूर्व आदिवासियों की शिक्षित करने हेतु भारत सरकार के पास कोई प्रत्यक्ष योजना नहीं थी लेकिन, सन् 1947 में देश के स्वंतत्र होने एवं सन् 1950 में भारतीय संविधान लागू होने के बाद विभिन्न संवैधानिक प्रावधानों के द्वारा आदिवासियों की शिक्षा स्तर वृद्धि कर राज्य तथा केन्द्र दोनों सरकारों का उत्तरदायित्व हो गया है।

यही वजह है कि संविधान लागू होने के पश्चात आदिवासियों की साक्षरता दर का प्रतिशत देश में औसत रूप से 29.60 प्रतिशत हो गया है, जोकि सन् 2001 में लगभग 45 प्रतिशत तक पहुँच गया था, लेकिन इसके बावजूद लगभग आज भी कई दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी अभी भी शिक्षा से वंचित हैं, आदिवासियों में शिक्षा की स्थिति को अभी संतोषजनक नहीं कहा जा सकता है हमें इसे बेहतर बनाने हेतु निरन्तर प्रयास करना जरूरी है।

हमारे भारतीय संविधान में आदिवासी समाज को एक विशेष दर्जा उनकी पहिचान संस्कृति रीति रिवाज परम्परों को बनाये रखने के लिए दिया गया है, आदिवासियों के लिए संविधान में 5वीं अनुसूची बनायी गई हैं क्योंकि आदिवासी इलाके आजादी के पहले से ही स्वतंत्र थे वहाँ अंग्रेजो का शासन प्रशासन नहीं था, मतलब यह कि हम आदिवासियों को भारतीय संविधान की व्यवस्था के अनुसार सुरक्षा तो देगें ही साथ ही उनकी संस्कृति का संरक्षण भी करेंगे जिससे उनकी बोली, भाषा, रीति रिवाज, रूढ़ी प्रथा परम्परा आदि को समय के साथ समाप्त न किया जा सके।

आज भी हमें भारत के आदिवासियों को समाज/राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए निरन्तर प्रयास में रहते रहना चाहिए देश के समग्र विकास हेतु आदिवासी का विकास भी महत्वपूर्ण है।

About the Author

आशीष सिंह
छात्र (एमए) इंदिरा गाँधी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बागरमऊ, उन्नाव (उ0प्र0)

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